गुरुवार, 30 जून 2016

यों पाएं बीमारियों से मुक्ति - डॉ. दीपक आचार्य

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बीमारियों का मूल कारण बैक्टीरिया, कीटाणुओं का संक्रमण और अंग-उपांगों की किसी भी प्रकार की खामी होने से कहीं अधिक है मन और मस्तिष्क की हलचलें।

अधिकांश लोग साध्य-असाध्य बीमारियों से त्रस्त रहते हैं या शारीरिक अस्वस्थता के कारण परेशानी का अनुभव करते रहते हैं।  इनमें से कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश मामलों में बीमारियों के सारे ही मूल कारण हमारे दिल और दिमाग से जुड़े हुए हैं।

असंयम, जीवनचर्याहीन कर्म और मर्यादाहीनता के साथ ही इंसान के दिल और दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते और आकार पाने को उतावले बने रहने वाले विचार इंसान को उद्विग्न बना डालते हैं।

हम अपनी बीमारियों की तह में जाकर गंभीरता और ईमानदारी से सोचे तो साफ-साफ सामने आएगा कि जिन लोगों के जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य आदि षट् विकारों के साथ ही आधुनिक विकिरणदायी उपकरणों का अति प्रयोग होता है वे ही बीमार अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं।

कुछ लोग पूर्वजन्मार्जित पापों और किसी न किसी प्रारब्ध को भोगने के लिए जन्म लेते हैं और इनका क्षय हो जाने पर वापस चले जाते हैं। बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए औषधियों और परहेज के साथ ही यदि हम इन बीमारियों की जड़ों को समाप्त करने की कोशिश करें तो रोगों से जल्दी छुटकारा पाया जा सकता है। 

हमारा चित्त जितना अधिक स्थिर, शांत, निर्वेग और मस्त होता है उतनी इंसानी शक्तियां अधिक जागृत और नियमित रहती हैं तथा अपने-अपने काम आसानी से करती रहती हैं लेकिन जैसे ही शरीर, मन या मस्तिष्क अपनी मर्यादा रेखाओं को लांघ कर कुछ ऎसा करने की कोशिश करता है जो अमर्यादित आचरण की श्रेणी मेें आता है तब शरीर संचालन के सारे समीकरण गड़बड़ाने लगते हैं।

जो विषय या व्यवहार इंसान की मर्यादा या अनुशासन के उल्लंघन की श्रेणी में आते हैं,  संस्कारहीनता माने जाते हैं, उस अवस्था में अंग-उपांग और नाड़ी तंत्र इसका आरंभिक विरोध करते हुए शरीर-मन और मस्तिष्क को संतुलित बनाए रखने के प्रयत्न करते  हैं लेकिन जब इंसान अपनी मलीनताओं, स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए मर्यादा, संस्कार और अनुशासन को त्याग देता है, मलीन समझौते करने लग जाता है अथवा अपने दिमाग में फालतू के विचारों और आशंकाओं के भण्डार जमा करने की बुरी आदत पाल लेता है तब शरीर की ज्ञानेन्दि्रयां और कर्मेन्दि्रयां भी बगावत पर तुल आती हैं और विवश होकर अपना अनुशासन छोड़ देती हैं और यहीं से शुरू होता है इंसान की बीमारियों का खेल।

भगवान ने जो शरीर दिया है उसका हिसाब से उपयोग किया जाए, जगत के कल्याण में लगाया जाए तभी तक यह काम का बना रहता है अन्यथा शरीर इंसान का साथ छोड़ देना शुरू कर देता है।

शरीर चाहता है कि उसके सभी अवयवों का समुचित उपयोग होता रहे और कोई सा विचार या कर्म ऎसा विजातीय न हो जो इंसानी स्वभाव के अनुकूल न हो। इस दृष्टि  से जो लोग आत्मा की आवाज को गंभीरता से सुनते हैं और उसी के अनुरूप जीवन व्यवहार को ढाल लिया करते हैं वे दीर्घायु और यश दोनों ही प्राप्त करते हैं।

पर आजकल इंसान के लिए न विचार प्रधान रहे हैं, न संस्कार या सिद्धान्त। इस स्थिति में  इंसान अब समझौतावादी होता चला जा रहा है। उसके लिए काम, पदार्थ और इच्छापूर्ति ही सब कुछ होती जा रही है, बाकी सब कुछ गौण या महत्वहीन। और यही कारण है कि इन मानसिक विकारों का स्थूल रूप हमारे शरीर का क्षरण करने लगा है।

शरीर की तमाम बीमारियां पहले विचार का धरातल पाती हैं। यह धरातल सकारात्मक और कल्याणकारी होने पर न कोई संशय होता है न भावी अनिष्ट की आशंका, बल्कि जो कुछ कर्म होता है या किया जाता है उसके फल के प्रति निश्चिन्त या उदासीन रहने के कारण कोई भी ऎसा अवसर उपस्थित नहीं होता कि जिसके कारण से चित्त में खिन्नता, अप्रसन्नता या उद्विग्नता का कोई भाव आए जो शरीर के किसी भी अंग की उत्तेजना को यकायक कम-ज्यादा कर डाले।

चित्त जब शांत हो, मस्तिष्क विकारों से मुक्त हो तभी शरीर अपनी सहज स्वाभाविक गति और ऊर्जा से काम करता है। इसमें जरा सी भी कमीबेशी आ जाने पर इसका सीधा असर हृदय की धड़कन से लेकर शरीर के तमाम अंगों पर पड़ता है और ऎसी तीव्र रसायनिक  क्रिया होती है जो अंगों को शिथिल या क्षति-विक्षत करने के लिए काफी होती है।

अनावश्यक विचारों, षड़यंत्रों, नकारात्मक भावों, राग-द्वेष, ईष्र्या, क्रोध, उद्विग्नता, अधीरता, अशांति और असन्तोष आदि के होते हुए कोई भी इंसान अपने आप को स्वस्थ बनाए नहीं रख सकता है चाहे वह अपनी शरीर रक्षा के लिए लाख उपाय क्यों न कर ले।

किसी भी तरह की बीमारी हो, उसे अपने शरीर से बाहर निकाल फेंकने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी आदतों, व्यवहार और सोच में बदलाव लाएं और ईमानदारी से इस बात का चिन्तन करें कि ऎसी कौनसी बातें, विषय या लोग हैं जिनके कारण से हमारा चित्त एकदम अशांत हो जाता है, हमारे भीतर असन्तोष का हवाई भँवर रह-रहकर हिलोरे लेने लगता है,  हमारी शांति गायब हो जाती है।

चित्त को उद्विग्न, अशांत और असंतोषी बनाने वाले सारे विषयों को एक-एक कर छोड़ते चले जाएं। इस तरह बीमारी की जड़ पर प्रहार करते जाएं। इससे हमारे शरीर की कोई सी बीमारी हो, वह आधार खो देगी।

यह भी शाश्वत सत्य है कि जिसकी बुनियाद खत्म हो जाती है उसका अस्तित्व भी समाप्त हो ही जाता है। अपने आपको दिव्य बनाने की कोशिश करें, विकारों को त्यागें, स्वभाव बदलें और सभी प्रकार की अपेक्षाओं व ऎषणाओं से मुक्ति पाने का प्रयास करें।

ज्यों-ज्यों हम सांसारिक विकारों को छोड़ते चले जाएंगे, त्यों-त्यों हम मानसिक और शारीरिक सभी प्रकार की बीमारियों से मुक्ति का अहसास करने लगेंगे। बीमारियों के सूक्ष्म विज्ञान को समझने की आवश्यकता है तभी हम पूर्ण आरोग्य का स्वप्न पूरा कर सकते हैं।

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