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मानसून बिना, सब सून / हास्य-व्यंग्य / अमित शर्मा

आजकल हर कोई मानसून आने का इंतज़ार कर रहा है , लेकिन मानसून तो पेट्रोल और डीज़ल की तरह भाव खा रहा हैं। लोग तरस रहे हैं पर बादल बरस नहीं रहे हैं, लगता है उन्होंने भी कमेंट्री करते सिद्धू जी के मुँह से ये मुहावरा सुन लिया है कि "  गुरु ,जो गरजते हैं वो बरसते नहीं "। पिछले कुछ सालों से,  मानसून आने में जितनी देरी करता है उस हिसाब से उसका नाम मानसून से बदलकर "सरकारी बाबू" रख देना चाहिए। मानसून के तेवर और नखरे देखकर लगता है कि वो भी "उड़ता पंजाब" को सेंसर किये जाने से नाराज़ हैं और जब तक उसे अपने तरीके से "रिलीज़"  होने का आश्वासन नहीं मिलता वो नहीं आएगा। कई मानसून एक्सपर्ट्स का मानना हैं की मानसून जल्दी आये इसके लिए मौसम विभाग को मानसून को लाने के लिए किसी मँहगी एयरलाइन के "बिज़नेस- क्लास" के टिकट भेजने चाहिए। कुछ लोग तो मानसून के तत्काल टिकट के लिए "प्रभु" से भी गुहार लगाने की माँग कर रहे हैं।

मानसून को समझना चाहिए की वो कोई "काला -धन" या "अच्छे दिन" नहीं है जो अगर नहीं आया तो लोग चुनावी जुमला समझकर मान जाएंगे। सूरज चाचू भी इतना जल रहे हैं मानो बिहार बोर्ड की परीक्षा देकर टॉप करने से चूक गए हों. कुछ लोग तो मानसून को लेकर इतने उतावले हो रहे हैं मानो उनका बस चले तो मानसून को लेने के लिए अपना "टू-व्हीलर" भेज दे और उसके ठहरने के लिए अपने मेहमानों का कमरा साफ-सफाई करके तैयार रखे। अच्छे दिनों और काले धन का इंतज़ार करके थक चुके लोग अब पलक -पांवड़े बिछाकर मानसून का इंतज़ार कर रहे हैं
जो सरकार के लिए "मन की बात" के बाद दूसरी राहत की बात है।

विपक्ष ने सरकार पर मानसून के साथ मिलीभगत कर मुद्दों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया है। विपक्ष का कहना है कि , "अगर सरकार मानसून को लेकर इतनी ही गम्भीर होती तो प्रधानमंत्री से कहकर मानसून को अभी तक बुलवा लेती क्योंकि प्रधानमंत्री का विमान तो अधिकतर समय आसमान में ही रहता और प्रधानमंत्री चाहते तो उसे अपने निजी विमान में बिठाकर उसकी आसानी से "घर -वापसी" करवा सकते थे।"

मानसून और बारिश के बारे में हमारे देश के मौसम विभाग को उतनी ही जानकारी होती है जितनी जानकारी आतंकवादी हमलों के बारे में देश की गुप्तचर एजेंसियों को होती है.  जब- जब मौसम विभाग की भविष्यवाणी गलत निकलती है तो देश के लोगों का मौसम विभाग पर भरोसा और मजबूत होता जाता है और मौसम विभाग भी पूरी कोशिश करता है कि लोगों का भरोसा ना टूटे  , लेकिन अगर गलती से कोई भविष्यवाणी सही निकल जाए तो इसे मौसम विभाग की अकुशलता के बदले मौसम की धोखाधड़ी माना जाना चाहिए।

मानसून और बारिश की जितनी जानकारी लोगों को मौसम विभाग से नहीं मिलती है उतनी जानकारी तो नुक्कड़ , चौराहों और चाय की दुकानों से मिल जाती है , जिन लोगों को रबी और खरीफ की फसल का अंतर तक नहीं पता वो लोग भी मानसून के दौरान कृषि वैज्ञानिक बने घूमते फिरते हैं, जो लोग घर पर एक "मनीप्लांट" तक ठीक से नहीं उगा पाते वो घर पर एसी में बैठकर बीजों की गुणवत्ता और मिटटी की उर्वरता पर चर्चा करते हैं , जिन लोगों को मोहल्ले का बनिया 100 ग्राम शक्कर भी उधार नहीं देता वो भी 4 लोगों को इकठ्ठा करके चर्चा करने लगते हैं कि अगर मानसून समय पर नहीं आया तो कैसे मँहगाई और मुद्रा स्फीति की दर बढ़ेगी जिसके फलस्वरूप राजकोषीय घाटा और बढ़ेगा, रोज़ मोटर-पंप चला कर अपनी कार धोने वाले लोग भी "वाटर हार्वेस्टिंग" के महत्त्व पर चर्चा करने लगते हैं। कुछ लोगों को तो लगता है कि मानसून के बारे में बात करना उनका "संवैधानिक दायित्व"  है और उन्होंने अगर मानसून के बारे में कोई सार्वजनिक चर्चा या टिप्पणी नहीं की तो किसी भी समय नजदीकी पुलिस स्टेशन से पुलिस इंस्पेक्टर आकर उन्हें गिरफ्तार कर लेगा।

"भारत एक कृषि प्रधान देश है। "  ,"कृषि मानसून का जुआ हैं।"...   ये दो "ब्रह्मवाक्य" ही केवल किसी भी सरकार को किसानों के प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियों से "बाई डिफ़ॉल्ट"  मुक्त कर देते हैं। फिर भी सरकार किसानों पर उपकार करते हुए बारिश ना होने या कम होने पर फसल नष्ट होने की दशा में मुआवजा तो देती हैं जो भले ही  "ऊंट के मुँह ज़ीरा" हो लेकिन उससे एक समय का " ज़ीरा राइस" तो बन ही सकता है। सरकार ने किसानों के लिए अलग चैनल चालू किया है, हेल्पलाइन नंबर शुरू किया है फिर भी अगर किसान, वेबसाइट और हेल्पलाइन नंबर का उपयोग किये बिना आत्महत्या कर ले तो इसमें सरकार का क्या दोष। आखिर सरकारें भी कितना और क्या क्या देखें और संभालें। लोगों की मनोरंजन की प्यास भी बड़ी है , उसे मिटाने के लिए आईपीएल कराना भी ज़रूरी है। भले ही पीने और सिचाई के लिए पानी हो या ना हो लेकिन मैदानों के रखरखाव के लिए पानी ज़रूरी है. मनोरंजन की प्यास बुझाने के लिए कुछ "तूफानी" करना पड़ता है क्योंकि ये मनोरंजन की प्यास है , किसी गरीब अन्नदाता किसान की ज़िन्दगी की लौ नहीं जो आसानी से बुझ जाएगी।

बारिश आते ही आशिक मिज़ाज़ लोग मौसम को बेईमान बताना चालू कर देते हैं, उस समय एक मजबूत लोकपाल की कमी सबसे ज़्यादा सताती है जो अपने अधिकारों का प्रयोग कर मौसम के बेईमान होने या ना होने की जाँच कर सच्चाई सामने ला सके । सावन का महीने आने पर "पवन" शोर करने लगता है  , इसे विपक्ष ने सरकार की विफलता बताया है , विपक्ष का कहना है कि ,"हमारी सरकार के समय पवन (बंसल) के शोर करने पर हमने उसे मंत्री पद से हटा दिया था लेकिन वर्तमान सरकार पवन के शोर के सामने बेबस नज़र आती हैं.

अच्छा मानसून होने पर पूरा शहर पानी पानी हो जाता है , घरों में पानी घुस जाता है फिर भी लापरवाह लोग उस पानी को "स्टोर" नहीं करते है और अगले साल बारिश कम होने और पानी की कमी होने पर सरकार को जिम्मेदार ठहरा देते हैं । बारिश होने पर जगह जगह कीचड़ हो जाता है लेकिन लोग समझ नहीं पाते की ये बारिश की वजह से फैला कीचड़ है या फिर नेताओं के द्वारा अपने बयानों से फैलाया गया कीचड़।

बारिश होने पर प्यार भी परवान चढ़ता है , पहले प्यार परवान चढ़ने पर प्रेमी, प्रेमिका के घर का पाइप चढ़ कर उससे मिलने पहुँच जाता था लेकिन आजकल "डिजिटल इंडिया" का युग है इसलिए पाईप पर चढ़ने के बजाय अपनी फेसबुक वाल पर चढ़कर   "ऑसम- मौसम,  एन्जॉयिंग विथ एंजेल स्वीटी , कूल बॉय अंकित एंड  60 अदर्स" का स्टेटस डाल कर अपनी  "वाल" पर प्रेम की इबारत लिख देता है।

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