झबरी / लघुकथा / लक्ष्मी यादव

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झबरी (लघुकथा)

सितम्बर की मूसलाधार बरसात ,आज रात पता नहीं क्यूँ झबरी उदास है। झबरी यूँ तो एक सड़कछाप आवारा कुतिया है लेकिन जब से उसे मेरे घर में रोटी के दो टुकड़े मिलने लगे हैं तब से वो यही की होकर रह रही है। दिनभर कही भी रहे रात होने पर पहरा देने चौखट पर आ ही जाती है। अभी कुछ दिन पहले झबरी के नवजात बच्चे पता नहीं कैसे मर गये। तब से झबरी बहुत उदास रहती हैं। आज भी उसकी उदासी की वजह शायद यही होगी। रोटी के टुकड़े मेरे हाथ में देखकर वो घर के भीतर आ गई ...बहुत कहने पर भी उसने आज फिर आधी रोटी छोड़ दी जिसको मैंने बाहर फेंक दिया ये सोचकर की कोई और जानवर उसे खा लेगा। झबरी चौखट पर जाकर बैठ गई मैंने दरवाज़ा बाद कर दिया ...

दिनभर की थकी थी इसलिए बिस्तर पर पड़ते ही सुस्ती सी होने लगी। रात के 11 बज चुके थे और कस्बों में तो 8 बजे के बाद ही इलाका सुनसान हो जाता है। मैंने आँख झपकी ही थी, तभी झबरी के रोने – चिल्लाने की आवाज़ सुनाई थी ..अम्मा ने कहा रात को कुत्ते बिल्ली का रोना अच्छा नहीं होता.. माँ की बात सुन ,मैं उठी और झबरी को देखने बाहर चल दी ये सोचकर की शायद कुछ देखकर रो रही हो झबरी। बाहर आकर देखा तो कोई नहीं था...झबरी भीगी हुई थी और कांप रही थी,जाने से होकर आई थी। मैंने उसको डाटा उसको कांपते देखकर उसको टाट की बोरी ओढ़ा दी और पुचकारते हुए वही बिठा दिया। दूर कही कुछ और कुत्तों का भौंकना मेरे कानों में गूंजा पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया जब झबरी पर दोबारा ध्यान दिया तो लगा जैसे झबरी की भीगी कांपती और उदास आँखें मुझसे कुछ कहना चाहती हों|उसने सिसकियों के साथ मुझे पंजों से रोकने की कोशिश की लेकिन मैं कुछ नहीं समझी ... मैं भीतर चली आई ..मेरी आँखों पर नींद सवार थी इसलिए मैं कुछ भी ठीक से नहीं देख पाई थी शायद ...रातभर झबरी रोटी रही और हम सबने उसे डाटते ,चिल्लाते ,पुचकारते रात गुज़र दी।

सवेरा हुआ .. बारिश थम चुकी थी ...बारिश का पानी कीचड़ बनकर सबके घरों तक आ लगा था। कीचड़ में पड़ती धूप से पानी में मिली गंदगी अलग ही निखर रही थी। मैं जब घर के बाहर आई तो देखा की हमारे घर से पास ,कूड़ेदान के पास लोगों की भीड़ जमा थी। मैं और अम्मा जब भीड़ के पास पहुंचे तो जो देखा उसको देखकर हम दोनों सन्न रह गये ...मैंने पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। मांस के महीन टुकड़े और हड्डियों की जूठन ... हड्डियाँ कुत्ते बिल्लियों ने चूसकर यूँ फैलाई होंगी जैसे रातभर खूब दावत उड़ाई हो ... लोग बात कर रहे थे ..कोई नवजात बच्चा छोड़ गया था शायद वहां ...जिसका ये हाल हुआ था ... ये दृश्य देखकर मै समझ गई थी की रात झबरी क्यूँ रोई होगी .... सिसकियों की आवाज़ सुन जब मै पीछे मुड़ी तो देखा मेरे पैरों के पास खड़ी सिसक रही थी। उसे सिसकता देख मेरी आँखों में भरे आंसू आँखों से बह गये। झबरी को देखकर बार बार ख्याल आता रहा की इस बेजुबान माँ की ममता उस बच्चे को तड़पता देख उठी होगी ..जिससे उसका कोई नाता नहीं ..और उस माँ की ममता को क्या इलज़ाम दे जिसने जन्म तो दिया लेकिन माँ न बन सकी।

लक्ष्मी यादव

110092 दिल्ली ...

संपर्क 9711852463

कई पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं रेडियो और टेलीविज़न के लिए लेखन जारी है।

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2 टिप्पणियाँ "झबरी / लघुकथा / लक्ष्मी यादव"

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