गुरुवार, 30 जून 2016

अनुभव / कहानी / जयश्री जाजू

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अनुभव
आज ही मुझे अपनी नौकरी के लिए जाना था। मैं बड़ी उत्साहित थी क्योंकि मैं घर के साथ बाहर की दुनिया में भी कदम रखने वाली थी। बचपन से ही मैं ऐसी महिलाओं के प्रति आकर्षित थी जिन्होंने अपने घर-परिवार के साथ-साथ घर के बाहर भी अपनी एक पहचान बनाई| उनके बारे में पढ़कर-सुनकर न जाने मेरे मन में भी ऐसी भावना कब जाग गई मुझे पता ही न चला। पुरुष सत्ता में स्त्री का वर्चस्व भला क्या मायने रखता। मेरी ससुराल में मेरे साथ भी यही रवैया था| धीरे-धीरे ही सहीं लेकिन मैंने अपने ससुराल के लोगों की सोच को बदला और इस शर्त के साथ कि नौकरी के साथ-साथ घर की जो जिम्मेदारियां मेरी है उसका निर्वाह मुझे करना है| मुझे तो एक पहचान बनानी थी या यूँ कहूँ कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना और चुनौतियों से रूबरू होने हेतु मैं शर्तों को स्वीकार कर खुले आसमान में निकल पड़ी।
आज मेरा मेरे कार्यालय में पहला दिन| हम सारे लगभग २० -२५ लोग। सभी ने मेरा बहुत अच्छे से स्वागत किया मुझे भी बड़ा अच्छा लगा जैसे ये सारे लोग मुझसे बहुत प्रेम करते है। मेरा व्याहारिक ज्ञान शून्य था। मैं अपने भावों को जो मैं महसूस करती बता देती थी। काफी दिनों तक मुझे ये पता ही नहीं चला कि मैं इन सारे लोगों में अकेली हूँ, क्योंकि इन २०-२५ लोगों के आपस में समूह बने हुए थे और वे मेरे पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते थे। मैं अपने दिए काम को बढ़िया तरीके से समाप्त करती किन्तु इसका सेहरा कोई और अपने सर पर बांध लेता। मजेदार बात तो यह होती कि इन बातों से मैं अनभिज्ञ रहती।
खैर मैं काम को ज्यादा महत्त्व देती थी। ये सारी बातें कि "काम मेरा और शाबाशी किसी और को" मिल रही है, मुझे इन बातों से फर्क नहीं पड़ता था। मेरा मानना है यदि फूल में खुश्बू है तो वह फैलेगी ही। मेरा भ्रम तो बादमे टूटा कि आज का जमाना तो नकली फूलों का है खुश्बू फैलाने के लिए इन नकली फूलों पर सुगंध का छिड़काव करना पड़ेगा।
अपने मुँह से अपनी प्रशंसा करें मुझमें इसकी बड़ी कमी है। मेरे लिए काम ही पूजा है चाहे मुझे कोई देखे या न देखे मैं अपना काम निबटाने में विश्वास रखती थी, और मेरे सहकर्मी काम कम और अपनी प्रशंसा करने में बड़े माहिर थे। समय आगे सरकता और मैं सिर्फ़ अपने काम में डूबी रहती। बढ़ोतरी होती लेकिन मुझे मेरे परिश्रम से कम ही आँका जाता।
घर में इस अतिरिक्त आय के आने से घर में जरूरतें बढ़ चुकी थी। इन आवश्यकताओं को समेटना कठिन था। नौकरी छोड़ना भी मुश्किल था। कई बार प्रयत्न किया कि इस नौकरी से त्यागपत्र देकर कोई नई नौकरी में जाऊं, किन्तु इस नौकरी से छूटना मुश्किल था क्योंकि नौकरी की शर्तें थी और और इन शर्तों को पूरा कर सोचती कि अब नौकरी बदल लूँगी यहाँ तब तक कोई और जाल बुन जाता। धीरे-धीरे मैं भी आदि होने लगी। किन्तु मेरा व्यवहारिक ज्ञान वही का वही था। इस व्यवहारिक ज्ञान के न होने से मैं हमेशा खिन्न रहने लगी। इसका प्रभाव मेरे काम पर और मेरी सेहत दोनों पर हो रहा था। मुझे अपने आपको खुश रखने के लिए कुछ करना था, लेकिन क्या ? कैसे ?

मैंने सोचा बहुत सोचा आखिर फैसला ये लिया कि मुझे भी अपनी प्रशंसा करना सीखना होगा। किन्तु किसी भी आदत को आप यूँ ही नहीं अपना सकते इसके लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है। मुझे इस आदत को अपने में शामिल करना बहुत कठिन लगा लेकिन मैं कोशिश करने लगी। आदत न होने के कारण जब कभी मैं ऐसा कृत्य करती अन्दर से मैं खुश न हो पाती और ये भाव मेरे चेहरे पर आ जाते मेरी जबान मेरा साथ न देती। ये स्थिति मेरे लिए और दुष्कर हो जाती। चारों ओर से लोग मेरी खिल्ली उड़ाने लगे। वे समूह मेरे सामने ही मेरी नक़ल करते मैं कुछ न कर पाती। खैर मैंने स्वयं को पहले की भांति कर लिया। लेकिन बीच-बीच में कुछ सहकर्मियों के साथ मुझे काम दिया जाता था। वे मेरे सहकर्मी काम तो मुझसे करवाते थे किन्तु उसका जिक्र नहीं करते थे और यही कारण था कि मेरी छवि और भी धूमिल होती जा रही थी और तरक्की तो नहीं के बराबर। कई बार मैं सोचती थी कि "बॉस" को मेरी मेहनत दिखाई नहीं देती। क्या वो भी सिर्फ़ अपनी तारीफ का भूखा,जो उसकी चापलूसी करता वो अच्छा और जिसमें चापलूसी का गुण न हो उसकी कोई कद्र या तरक्की नहीं।
जब मैं कोई कविता,कहानी या कोई सुविचार सुनती या पढ़ती जहाँ ये कह जाता है कि "लगन व् परिश्रम करने पर आपकी तरक्की निश्चित होगी "| मैं यहाँ इस बात को बदलना चाहूंगी कि "यदि आप चापलूसी कर सकते हो तो आप तरक्की पर तरक्की करते चले जाओगे।" ये मेरा अनुभव है कि बहुत कम भाग्यशाली होते है जिसे अपनी मेहनत का फल मिलता है। यदि आप झूठ नहीं बोल सकते,आप में दया है, दूसरों के दुःख से आप दुखी हो जाते हो तो ............ भगवान ही आपका रखवाला होगा क्योंकि आज के जमाने में यदि ये नैतिक गुण है तो आप का इस दुनिया में भावनात्मक शोषण होता रहेगा और आप अकेलेपन के शिकार हो जाओगे। आज की माँग है व्यवहारिक ज्ञान। इस ज्ञान से आप तरक्की प्राप्त कर सकते हो,आपके सामाजिक संबंध बढ़ते है भले ही झूठे हो किन्तु कार्यालयों में कार्य करते हुए आपको इस ज्ञान की आवश्यकता होती है।
मैंने इस बार पक्का निर्णय ले लिया। मैं अब अपने आपको और धोखा नहीं दूंगी। मैंने घर के बढे हुए खर्चों का अवलोकन किया। बाहर जानकारी ली| यहाँ पर मैं काफी शालीन से कार्य कर रही थी इसलिए वेतन यहाँ का हर साल की बढ़ोतरी से थोडा-थोडा कर बढ़ गया था। इतना वेतन मुझे बाहर नहीं मिल रहा था। लेकिन निर्णय तो लेना था,पैसा या मन की शान्ति। मैंने शांति चुनना पसंद किया। मैंने अपने कार्यालय की शर्तों के मुताबिक मेरा काम व समय को ध्यान में रखकर त्यागपत्र दे दिया और अपने लिए एक स्वस्थ वातावरण वाला कार्य खोजने लगी।
समाप्त

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