विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

व्यंग्य-राग (११) हाँ जी, जी हाँ जी / डा. सुरेन्द्र वर्मा

एक लोकगीत में एक स्त्री जब-जब बाजरा फटकने, बीनने, कूटने, पीसने, गूँथने या बेलने बैठती है तो जी हल्का करने के लिए वह अपनी पड़ोसन से कहती है –

हाय पड़ोसन बाजरा अल्ला कसम बाजरा जी का जंजाल मुआ बाजरा

भले ही वह पकाने के लिए जी का जंजाल ही क्यों न हो, जाड़ों में बाजरे की रोटी लगती बड़ी स्वादिष्ट है. किन्तु इस समय, मेरे प्यारे पाठको, मैं बाजरे और उसकी रोटी की बात न करके ‘जी’के जंजाल की बात कर रहा हूँ.

पुराने ख्याल का आदनी हूँ. पत्नी का नाम नहीं लेता. सबके सामने उसका नाम लेकर पुकारना अच्छा नहीं लगता. ऐसा भी नहीं है कि पत्नी ऊंचा सुनती हो. फिर भी ‘अजी, सुनती हो,’ कहता हूँ काम चला लेता हूँ. ज़ाहिर है, ‘अजी सुनती हो’ का सुन पाने से कोई सम्बन्ध नहीं है. हमारी संस्कृति में पत्नी को संबोधित करने का यह, या ऐसा सा ही कुछ और, केवल एक मुहावरा है. जी हाँ, “अजी सुनती हो” में जो ‘जी’ लगा है, उसी की बात कर रहा हूँ. ज़ाहिर है, यह एक सम्मानसूचक ‘जी’ है.

किसी नाम या पद को संबोधित करते हुए उसके आगे जब “जी” लगाते हैं, जैसे, मनसुख लाल जी, आचार्य जी आदि, तो हम व्यक्ति को आदर दे रहे होते हैं. हम तो कभी कभी अपनी पवित्र नदियों तक को भी जी लगाकर ही पुकारते हैं. गंगा जी, नर्मदा जी इत्यादि. और तो और हम हिन्दी-भाषी अंग्रेज़ी के शब्दों में भी जी लगाने से नहीं चूकते - टीचर जी. पापा जी, मम्मी जी. हम जिसे अपनी बड़ी बहन मानते हैं उसे तो दुगनी इज्ज़त देते हुए दुहरे जी से पुकारते हैं – जीजी.

जीजी का पुलिंग क्या है? हमारी अपनी भाषा हिन्दी में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का निर्णय कर पाना बड़ा मुश्किल है. लेकिन मुझे लगता है की ‘जीजी’ का पुल्लिंग यदि ‘जीजा’ किया गया है तो ठीक ही होगा. सिर्फ जीजा कहने में भला क्या इज्ज़त ? इसलिए सभी सालियाँ जीजा न कहकर जीजाजी कहती हैं. क्या बात है! जीजाजी बेचारे आगे पीछे दोनों तरफ से ‘जी जी’ से जकडे हुए हैं. ‘जा’ओगे कहाँ बच्चू! फिर भी सालियाँ तो सालियाँ ठहरीं. बराबर उकसाती रहती हैं –जा, जी-जा.

‘जी’ कभी कभी बड़ी दुर्गति कर बैठता है. मराठी में बड़े और छोटे में भेद भाव ज़रा कम ही है. वहां नौकरानी को भी बाई पुकारते हैं और बाई भी अपनी मालकिन को बाई ही कहती है. मालकिन को अतिरिक्त आदर प्रदर्शित करने हेतु वह उन्हें बाई न कहकर ‘बाई-साहब’ कह देती है. ‘बाई’ के साथ ‘साहब’ संबोधन बड़ा अजीब लगता है. बाई स्त्रीलिंग और साहब पुल्लिंग. यह अगर गलत है तो गलत ही सही. हमारी बाई, ‘बाई साहब’ भले हो जाएं ज़ाहिर है, ‘बाई जी’ कहकर उनकी दुर्गति नहीं की जा सकती. पंजाबी भाषा में तो और भी कमाल है. वैसे तो पापा के साथ ‘जी’ लगाना ही गलत ही लगता है, -अंग्रेज़ी के साथ गैर अंगरेजी संबोधन- लेकिन पंजाबी में तो पापाजी न कहकर संक्षेप में “पाजी” ही कह दिया जाता है! यह बड़ा प्यारा शब्द है. पाजी में दुत्कार भी है और दुलार भी. जी हाँ, हमारे अधिकतर रिश्तों में यही उभय-भाव (एम्बीवलैंस) साफ़ देखा जा सकता है.

‘जी’ सम्मान-सूचक तो है ही, ‘जी’ स्वीकार भी है. जी-हुजीरिया लोग इसी ‘जी’ से आपकी बात की हामी भरते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं. वे कभी ‘न’ नहीं कहते. उनकी ज़बान जी कहते कभी थकती भी नहीं –

बन जाती हैं शब्दों से भी रेवड़ियां और इसी में बरक्कत है, बड़े मियाँ जी हाँ जी, जी हाँ जी, हांजी, जीहाँ

जी में जीवट है, हिम्मत है, दम है. आदमी एक बार जी कर ले तो उसे कोई डिगा नहीं सकता. वह जी (जान) पर खेल जाता है. और जी भरकर मनमानी करता है. बस, जी में ठान लेने की ज़रूरत हैं. बड़ा मनमाना है जी. लाख मनाइए, मानता ही नहीं. अगर किसी पर आगया तो आगया. प्रतिउत्तर मिले न मिले. ‘कोई गल्ल नहीं जी’. जी छोटा नहीं करना. पर जी आ जाए तो न खाना सुहाता है, न पीना. सारी दुनिया से जी उचाट हो जाता है. जी है कि बस जी में समाए एक उसी की याद करता है.

जी का सम्मान करने वाले लोग कहते हैं की धर्म, जाति, लिंग. भाषा, वर्ण, रूप आदि कितने ही भेद क्यों न हों , जी और जी में कोई अंतर नहीं होता. आखिर जान तो सबकी एक ही है. अत: वास्तविक सम्मान का हकदार तो ‘जी’ ही है. जी है तो जहान है.

यों तो ‘जी’ अंगेजी वर्णमाला का सातवाँ सवार है, लेकिन उसे नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. उच्चारण की दृष्टि से वह “ग” भी है और “ज” भी है. अगर गांधी का जी “ग” है तो जीनिअस का “ज” है. यानी जी कोई छोटी-मोटी चीज़ नहीं है. भारी भरकम गज है, हाथी है. याद रखिए, यह “जी फार “गोट” नहीं है. ऐसा तो सिर्फ बच्चों को बहलाने के लिए कहा जाता है. बकरियां तो बेचारी कभी भी हलाल की जा सकती हैं. आतंक और हिंसा के आज के माहौल में अपने ‘जी’ को हर स्थिति में बचाना ही पडेगा.

एक ज़माना बीत गया. दूरदर्शन में एक ‘जी’ हुआ करते थे. सामने नहीं आते थे लेकिन उनकी प्रात:स्मरणीय उपस्थिति महसूस किए बिना दर्शक नहीं रहता था. उनके दर्शन किसी ने नहीं किए, बस, ‘जी’ नाम से ही जाने जाते थे. नाममात्र थे. पर जी के जंजाल से पूरी तरह मुक्त. उनका न कोई घर न द्वार, न देश-विदेश में कोई खाता, न कोई बैंक-बैलेंस. बस जी बहलाना भर उनका काम था. वे न तो किसी का जी दु:खाते थे न किसी का जी मारते थे. और वे जी-हुजीरिया तो कतई नहीं थे. लेकिन जी-जहान की फ़िक्र उन्हें सताती रहती थी. बस हमें उनकी यही अदा पसंद थी. काश! हमसब में वे प्रविष्ट हो जाते! सच तो यह है, हम सब में वे छिपे बैठे ही हुए हैं. सिर्फ जानने भर की देर है.

जी जीव है, जीवट है, सम्मान और स्वीकार है. लेकिन जी इतना शर्मीला और डरपोक है कि सामने नहीं आता. उसे अब सामने आ ही जाना चाहिए और अपना जीवट बताना ही चाहिए.

( डा. सुरेन्द्र वर्मा )

१०, एच आई जी /१, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१ (मो) ०९६२१२२२७७८

Blog (haiku) surendraverma@gmail.blogspot.in

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget