व्यंग्य राग (१२) टप्पा गायिकी डा. सुरेन्द्र वर्मा

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

टप्पेबाजी है तो टप्पेबाज़ों का होना भी लाज़मी है. अखबार के पन्नों में अक्सर पढने को मिलता है कि एक टप्पेबाज़ ने देखते देखते माल पार कर दिया. लेकिन यह टप्पेबाजी होती क्या है. मैंने यह शब्द पहले कभी नहीं सुना था. कोश में देखा तो वहां भी यह शब्द गायब था. कोश भी टप्पेबाज़ निकला. अजीब मुश्किल है. मैनें अखबार की खबर दोबारा पढी. टप्पेबाज़ ने माल पार किया, यानी, धोखा दिया; और देखते-देखते पार कर दिया, यानी, अपना काम बड़ी फुर्ती से किया. अत: टप्पेबाजी ‘तुरत धोखा’ देना है. ध्यान बंटाया और चीज़ गायब कर दी. ज़ाहिर है ऐसी टप्पेबाजी के लिए कौशल चाहिए. बड़े हुनर की ज़रूरत है. जो आते आते ही आता होगा. कोई खेल या हंसी-मज़ाक नहीं है टप्पेबाजी.

राजनीति के टप्पेबाजों का तो कहना ही क्या? बड़े खिलाड़ी होते हैं. जब अपने को किसी असुविधाजनक स्थिति में फंसते देखते हैं, ध्यान बंटाने के लिए तुरंत टप्पा खाते हैं और एक नया मुद्दा खोल बैठते हैं. अपनी असुविधाजनक स्थिति से बच जाते हैं और सामने वाले को असुविधा में डाल देते हैं. इस तरह वे अपनी तुरत- बुद्धि से धोका देकर तु्रन्त अपना बचाव भी कर लेते हैं.

प्रजातंत्र में ज़रूरी नहीं कि हमारे नेता बड़े बड़े नगरों से आएं. ज्यादहतर वे छोटी छोटी तहसीलों और टप्पों से ही आते हैं. अपनी शुरूआती टप्पेबाजी से वे अपने नेतृत्व की चमक पहले अपने टप्पे में ही निखारते हैं. धीरे धीरे उनकी प्रसिद्धि फैलने लगती है. शोहरत टप्पे से कस्बे, और कस्बे से ज़िले तक आती है और देखते-देखते पूरे सूबे में फैल जाती है. किसी बड़े नेता की शरण में आकर ये छोटे-मोटे ‘छुट-भैये’ नेता बन जाते हैं और मौक़ा पाते ही एक टप्पा खाकर अपने ही नेता को फलांग जाते हैं. नेतृत्व के आकाश में नए सितारे का उदय होता है. जय-जयकार होने लगती है. विधायक बनते हैं, मंत्री बनते हैं, मुख्यमंत्री बन जाते है. प्रधानमंत्री के सपने देखने लगते हैं. कभी बन भी जाएं तो ताज्जुब नहीं. हमारे प्रजातंत्र में नेतृत्व के विकास का यह स्वाभाविक सोपान हैं.

खेल के मैदान में टप्पा वह ठिकाना है जहां उछलती हुई गेंद ज़मीन छूती है, अगर गेंद टप्पा खा गई और उसके बाद आप उसे लपक पाए तो क्रिकेट में यह ‘कैच’ नहीं माना जाएगा. यही कारण है कि कैच से बचने के लिए हर विधायक नेता, अपने कार्य-काल में देश भर में चाहे जितनी उछल कूद मचाए, पांच साल पूरा होने से पहले उस ठिकाने पर अपनी धरती छूने ज़रूर आता है जहां से उसने चुनाव जीता था. अन्यथा वह अगले चुनाव में ‘कैच-आउट’ हो सकता है – इसे वह अच्छी तरह जानता है.

यों तो टप्पा गायिकी आजकल बहुत चलन में नहीं है, लेकिन इसका विकास छोटे छोटे टप्पों में ही हुआ है. जैसे छोटे छोटे टप्पों ने हमें बड़े बड़े नेता दिए हैं वैसे ही टप्पा गायिकी की शुरूआत छोटे- छोटे टप्पों में ही हुई है. (शायद इसीलिए इस गायिकी को “टप्पा” कहा भी गया है). बाद में बड़े बड़े शास्त्रीय संगीतज्ञों ने भी इस गायिकी को अपना लिया. क्यों न अपनाते ? आखिर टप्पा भी अंतत: एक तरह का लोक-गीत ही तो है, और बिना लोक को रिझाए भला यश कैसे अर्जित हो! शास्त्रीय संगीतज्ञ भी, अन्य गायकों की तरह, यश-कामी तो होते ही हैं. लेकिन ध्यान रहे, टप्पा गायक टप्पेबाज़ नहीं होता. इस गायिकी में बेशक तान की प्रधानता होती है और हाँ, तान की इस उछाल के कारण आप भले ही इसमें टप्पेबाजी का आभास पा लें तो बात दूसरी है.

+++

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "व्यंग्य राग (१२) टप्पा गायिकी डा. सुरेन्द्र वर्मा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.