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स्वाधीनता की क़ीमत (लघुकथा)-प्रदीप कुमार साह

तोता अपने मित्र कौआ से मिलने आया. तोते का मित्र द्वारा यथोचित आदर-सत्कार हुआ. दोनों एक-दूसरे का कुशल-क्षेम पूछने लगे. इस बीच तोते ने महसूस किया कि मित्र कौआ के प्राकृतिक स्वभाव में कुछ बदलाव आ गये हैं. पक्षियों में कौआ अति चंचल, वाचाल और बेहद सतर्क माना जाता है. किंतु उसका मित्र बुझा-बुझा सा था. तोते ने कौआ के उदासी का कारण पूछा. कौआ बताया," इस पेड़ पर एक गिलहरी रहती थी. कल वह मारी गयी."
"गिलहरी किस तरह मारी गई?" तोते का जिज्ञासा बढ़ गया.
कौआ ने बताया,"भोजन के तलाश में गिलहरी जब पेड़ से नीचे आई तो पहले से घात लगाकर बैठी बिल्ली उसपर झपट पड़ी और वह शिकार बन गया."
"धत्त तेरी की! इसमें विशेष क्या है? वैसे तो कितने ही जीव दूसरे का भोजन बनते हैं." तोता झल्लाया.
कौआ बोला,"मैं उसके मारे जाने मात्र से चिंतित नहीं हूँ. मारे जाने से पहले वह कितने समय बिल्ली के कैद में बिल्कुल परतंत्र पड़ा रहा. उसके मरने तक बिल्ली उसके साथ कितना क्रूर खेल खेलती रही, वह सब सोचकर दु:खी हूँ."
"वह तो बिल्ली का स्वभाव है." तोता बोला.
इस पर कौआ कहने लगा,"बात इतनी ही नहीं है. गिलहरी भी हमारे तरह स्वच्छंद विचरण करने वाली, चंचल और स्वाधीन रहने के आदी प्राणी हैं. बिल्ली द्वारा मारे जाने से पहले वह परतंत्र हो गई थी. कितने कष्ट में था वह. उस वक्त शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा होगा. स्वाधीनता क्या चीज है, उसे समझ में आ रहा होगा."
"यह तुम क्या कह रहे हो? वह तो महज संयोग था." तोता नासमझी से बोला.
"मैं वैसा नहीं मानता. गिलहरी की वह दशा उसके असावधानी से हुई. अपनी स्वाधीनता हेतु सावधानी रखना क्या जरुरी नहीं है?" कौआ ने पूछा तो तोते से कोई जवाब न बना. आगे कौआ कहने लगा,"स्वाधीनता प्राणी मात्र को तब तक ही नसीब होते, वह जब तक उसे धारण -योग्य है. वह योग्यता तब आती है,जब जीव निरंतर प्रयत्नशील, सतर्क और नियम पालन हेतु सदैव तत्पर रहते हैं."
"कैसे नियम?" तोता अचंभित हुआ. कौआ तेज आवाज में कहने लगा,"हाँ, नियम! किसी देश या जीव के स्वयं हेतु कुछ नियम होते हैं. वह नियम उसके पूर्वज अपने कई पीढ़ी के अनुभव से तय करते हैं. वे नियम उसके स्वतंत्रता, सुरक्षा, चहुँमुखी विकास और जीवन जीने से संबंधित होते हैं. इसलिए समस्त जीव को सदैव सतर्क, प्रयत्नशील और नियम पालन हेतु तत्पर रहना चाहिये. वही स्वाधीनता की क़ीमत है.

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