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पाठकीय / एक पत्र रेल मंत्रालय के नाम / महेश सिंह

देश को आर्थिक विकास की चिंता के साथ-साथ पर्यावरण के बारे में भी चिंता की आवश्यकता है. अभी तक हम विज्ञान और तकनीकी के सहारे विकास के आर्थिक पक्ष पर ही नजर गड़ाए बैठे हैं, तो सरकार की नीति और योजनायें भी किसी न किसी रूप में विकास के आर्थिक पक्ष की ही पक्षधर रही हैं. नतीजतन आज हम उसका परिणाम देख रहे हैं. सूखा, बाढ़ और पीने के पानी का संकट जैसी समस्याएं निरंतर विकराल रूप धारण करती जा रही हैं.

आज हम एक ऐसी नगरीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं जिसमें लोग तेजी से गाँव से शहर की तरफ पलायन कर रहे हैं. इसका एक ही प्रमुख कारण हैं, वह है शहरों में आसानी से उपलब्ध भौतिक सुख-सुविधा. लेकिन इस सुख-सुविधा को प्राप्त करने की आपाधापी में हम यह निरंतर भूलते जा रहे हैं कि पर्यावरण बदल रहा है और यह बदलाव सिर्फ सामान्य बदलाव नहीं है. यह प्रकृति का इंसानों पर आक्रमण करने की बेचैनी है. जिसका परिणाम बहुत भयानक और त्रासदीपूर्ण होगा. अतः सरकार और विकास की रूप-रेखा तैयार करने वालों को यह सोचना होगा, कि भविष्य में कभी भी आने वाली भयानक त्रासदी से कैसे निपटा जाय. इसके लिए उन्हे विचार-विमर्श, राष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठी और पर्यावरणविदों तथा शोधार्थियों से सुझाव व संवाद स्थापित करने होंगे.

खैर ! यह जब होगा तब होगा, लेकिन इस समय मेरे पास एक ऐसा सुझाव है जिसपर विचार किया जा सकता है. हालांकि यह इस पर्यावरणिक समस्या के समाधान हेतु ऊंट के मुंह में जीरा जैसा ही है क्योंकि मैं यह सुझाव केवल रेल मंत्रालय के लिए दे रहा हूँ. जिसपर यदि इसपर अमल किया जाय तो रेल मंत्रालय एक बड़े व्यापक स्तर पर पर्यावरण की रक्षा करते हुए अपना आर्थिक विकास भी कर सकता है.

जैसाकि हम जानते हैं कि भारतीय रेल, भारतीय अर्थ-व्यस्था और परिवहन के लिए सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण साधन है. प्रतिदिन इसमें लाखों लोग एक जगह से दूसरे जगह तक जाने के लिए यात्रा करते हैं और अपनी यात्रा के दौरान खाना खाते हैं और पानी भी पीते हैं और खाने की पन्नी तथा पानी का बोतल खिड़कियों से रेल पटरी पर फेंक देते हैं. इन पन्नियों और पानी की बोतलों से पर्यावरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है. इस प्रकार प्रत्येक यात्री अपनी यात्रा के दौरान यदि वह दो सौ किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर रहा होता है तो निश्चित तौर पर कम से कम दो लीटर पानी पी ही लेता है. उसके इस दो लीटर पीने के पानी में प्लास्टिक की दो बोतलें निकलती हैं तथा उसका अपने जेब से तीस रुपया जाता है. यह तीस रुपया पानी की कम्पनी और उसे बेचने वाले की जेब में जाता है. दरअसल मुद्दा यह नहीं है मुद्दा यह है कि प्रकृति से फ्री में पानी लेने के बाद भी एक कम्पनी विशेष ने लाभ तो कमाया लेकिन पानी पीने वालों से पानी का बोतल इधर-उधर फेकवाकर प्रकृति को कुछ लौटाने के एवज में प्लास्टिक का कचरा लौटाया. यह आकड़ा सिर्फ एक यात्री का है जबकि रोज लाखों लोग यात्रा करते हैं बोतल का पानी पीते हैं और लाखों बोतल रेल पटरियों पर फेंक देते हैं. यह बोतल नदी, नालों और खेतों में जाता है. यह लाखों बोतल भी एक दिन का है. इस प्रकार एक महीने में कितना ? एक साल में कितना ? फिर सालों-साल में कितना ? आप जरा स्थिर मन से इसपर सोचेंगे तो माथा ठनक जायेगा कि सिर्फ रेलवे के माध्यम से पर्यावरण का कितना नुक्सान हो रहा है. सच में स्थिति बड़ी भयावह है. यह अलग बात है कि रेलवे इसको रोक भी नहीं सकता लेकिन यह भी नहीं है कि इसके लिए कुछ प्रयास और उपाय न किये जा सके.

यहाँ मैं यह बताना चाहता हूँ कि रेलवे को क्या करना चाहिये – इसे हम स्लीपर के एक डिब्बे के माध्यम से समझाते हैं. जैसाकि स्लीपर के एक डिब्बे में 72 सीटें होती हैं यानि की 72 यात्री, और इन 72 यात्रियों के लिए होता चार टॉयलेट जो आवश्यकता से अधिक है. अगर चार के जगह पर तीन टॉयलेट भी हो तो 72 यात्रियों का काम चल जायेगा. हमारा सुझाव है कि टायलेट वाले एक केबिन से टायलेट सीट को ख़तम करके उसमें एक वाटर फ़िल्टर और एक वाटर कूलर लगा दिया जाय साथ ही उसमे एक बड़ा डस्टबीन भी लगाया जाय. इस प्रकार इस समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है. क्योंकि प्रत्येक यात्री अपनी पूरी यात्रा के दौरान सिर्फ एक बोतल का उपयोग करेगा और खाने की पन्नी को उस डस्टबीन में डालेगा.

मैं व्यक्तिगत तौर पर इस सुविधा के लिए कोई भी सुविधा शुल्क लगाने के पक्ष में नहीं हूँ. लेकिन रेल मंत्रालय चाहे तो स्वच्छ पानी के नाम पर प्रत्येक यात्री से बीस रूपये का अतिरिक्त चार्ज ले सकता है. जिसका यात्रा- टिकट में स्पष्ट उल्लेख हो. यह चार्ज भी केवल स्लीपर और एसी वाले डिब्बे में ही लगे. साधारण डिब्बे में तो बिलकुल भी नहीं. इस तरह से यदि एक डिब्बे के बहत्तर यात्रियों से बीस रूपये लिए जाएँ तो 1440 रूपये की आमदनी होगी. यदि ट्रेन एक महीने में पंद्रह दिन भी चलती है तो एक डिब्बे से एक महीने में 2160 रूपये बनते हैं. इस प्रकार एक साल में सिर्फ एक डिब्बे से 259200 रूपये की आमदनी रेल मंत्रालय को होगी. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं की देश में सैकड़ों ट्रेनें चलती हैं अगर एक ट्रेन में दस डिब्बे हों तो सैकड़ों ट्रेनों के प्रत्येक डिब्बे से रेल मंत्रालय को एक साल में कितने की आमदनी होगी. इसके अलावा यदि हम इसके मेंटिनेंस की बात करें तो यह सबको पता ही होगा की वाटर कूलर और और वाटर फ़िल्टर बेचने वाली अधिकतर कम्पनियां कम से कम एक साल तक मेंटिनेंस सर्विस फ्री में करती हैं. अतः हम कह सकते हैं कि यह रेल मंत्रालय के लिए कम से कम एक साल तो आम के आम और गुठलियों के दाम जैसा होगा.

यह तो हुई केवल रेल मंत्रालय के फायदे की बात, लेकिन जब हम जनता के बारे में देखते है तो जरा सोचिये की पानी बेचने वाली कम्पनियां हमारे हक़ का पानी लेकर हमें ही बेच रही हैं और इससे हुए शुद्ध फायदे को केवल अपने जेब में रख रही हैं. न तो उनको पर्यावरण से कुछ लेना-देना है और न ही देश की जनता से. लेकिन इस तरह का कारगर उपाय जब सरकार द्वारा किया जायेगा तो इसका सीधा लाभ सरकार को होगा और सरकार का पैसा मतलब जनता का पैसा. इस प्रकार रेल मंत्रालय एक तीर से तीन निशाना लगा सकता है. पर्यावरण की रक्षा, यात्रियों को बेहतर सुविधा और आर्थिक पक्ष मजबूत करके देश का विकास.

संपर्क :

महेश सिंह

जूनियर रिसर्च फेलो, हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय पांडिचेरी

gguhindi@gmail.com

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