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अतुलनीय है ईश्वर - डॉ. दीपक आचार्य

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भगवान सर्वोपरि सत्ता है जिसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती। वह शुचिता से लेकर धर्म, सत्य, न्याय, सदाचार और सभी आदर्शों मेंं सर्वश्रेष्ठ है।

प्रकृति और परमेश्वर की तुलना करना या उनके समकक्ष किसी को मानना, रखना और पूजना सर्वथा वर्जित है।  हमारे ऋषि-मुनियों ने ब्रह्माण्ड भर के अणु-परमाणु और परिवेश को खंगाल कर वैज्ञानिक रहस्यों का जो प्रकटीकरण किया है वह अपने आपमें विलक्षण है और सत्य एवं वास्तविकता की हर कसौटी पर खरा उतरा हुआ है।

इसका अवलम्बन मात्र करना ही हमारा फर्ज है लेकिन हम धर्म और ईश्वर के मामले में अंधविश्वासों और मूर्खताओं के जंजाल में इतने भटके हुए हैं कि हमें ईश्वरीय सत्ता का पता तक नहीं है।

आजकल धर्म के नाम पर ढोंग, धूर्तता, पाखण्ड, आडम्बर और धंधों की भरमार है। धर्म एक ऎसा ब्रह्मास्त्र हो चला है कि जिसे थाम पर कोई कुछ भी करने को स्वतंत्र है, कुछ भी कहर ढा सकता है, कितने ही सारे अंधविश्वासों को पनपा सकता है और धर्म की कई परिभाषाएं गढ़ सकता है। 

प्राचीनकाल से ऋषि-मुनियों ने कभी अपने आपको पूजने-पूजवाने, नाम कमाने और खुद को स्वयंभू घोषित करने का काम नहीं किया। उन्होंने जीव मात्र को परम सत्ता की राह दिखायी। अपने पास किसी को न रोके रखा, न किसी को अपने मोहपाश में बांधे रखा।

जो उनके पास आया उसे जीवन्मुक्ति का मार्ग दिखाया और ईश्वर से साक्षात्कार या दैवीय कृपा पाने के रास्तों से अवगत कराया। ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं, मठाधीशों और गुरुओं ने कभी खुद को ईश्वर तुल्य मानकर प्रचारित नहीं किया बल्कि इन्होंने सर्वशक्तिमान की आराधना और सामीप्य की ओर मोड़ा।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा में कहीं भी खुद को पूजने की बात नहीं है बल्कि कहीं निर्गुण और कहीं साकार परमात्मा को पाने के लिए विभिन्न मार्ग सुझाये गए।

असली मार्गद्रष्टा वही है जो कि जिज्ञासु भक्तजन को ईश्वर की राह दिखाए। आजकल गुरुओं के नाम पर छिपे हुए अपराधियों, ढोंगी बाबाओं, महंतों, गुरुओं से लेकर तथाकथित शंकराचार्यों और धर्माधिकारियों तक ने धर्म को धंधा बना दिया है और खुद को पूजने-पूजवाने, पब्लिसिटी पाने, पैसा बनाने, आश्रमों और मठों के नाम पर जमीन-जायदाद अपने नाम करने और चेले-चेलियों की संख्या बढ़ाओ अभियान में नॉन स्टॉप जुटे हुए हैं।

इन बाबाओं से कोई पूछे कि उन्होंने जब संसार को त्याग ही दिया है फिर उन्हें क्या जरूरत है भोग-विलास और आरामतलबी के संसाधनों की, क्यों चाहते हैं वे जमीन-जायदाद, पब्लिसिटी का मोह क्यों है इन्हें, किसके लिए पैसा जमा कर रहे हैं। वीआईपी लोगों के पीछे पागल होने और दुम हिलाते हुए उनके प्रशस्तिगान और स्वागत करते हुए इन धर्मचेताओं को शर्म नहीं आती।

जो कुछ ये कर रहे हैं वह किसी भी तरह से वैराग्य, भक्ति, धर्म और ज्ञान की परिभाषा में नहीं आता। जिन लोगों को भगवान का रास्ता दिखाना चाहिए उन लोगों को ये अपने मोहजाल में फांद कर रखने के आदी होते जा रहे हैं।

खुद की तस्वीरें मन्दिरों में रखवा रहे हैं, घरों में अपनी तस्वीरें पूजवा रहे हैं। कई मन्दिरों में तो भगवान की मूर्तियों के साथ अथवा सभामण्डप में इन मरणधर्मा बाबाओं, महंतों, तथाकथित संत-महात्माओं के बड़े-बड़े फोटो लगवा रखे हुए हैं।

कई मन्दिरों में प्रधान देवता के मुकाबल साई तक को रख दिया गया है तो कई मन्दिरों में लोग अपने मृत माता-पिता और दूसरे पितरों को पूज रहे हैं। कई भागवत कथाओं में भी पितरों की तस्वीरें रखी हुई देखी जा सकती हैं।

कई मूर्ख लोग अपने घरों में देवताओं, पितरों और उनके तथाकथित गुरुओं के लिए अलग-अलग दीये जलाने लगे हैं। जबकि दीप जलाने का सीधा सा संबंध कर्म की साक्षी के लिए है।

आखिर धर्म के बारे में हम सभी अज्ञानी लोग कितनी नासमझी पर उतर आए हैं। भगवान सर्वोपरि है इस बात का ख्याल रखें और ईश्वर को पाना चाहें तो बीच में आने वाले धूर्तों, ढोंगियों और पाखण्डियों के मोह जाल मेंं न फंसे अन्यथा धन भी जाने वाला है और धरम तो जाएगा ही। धर्म और ईश्वर के मूल मर्म को समझें और धर्मानुकूल -शास्त्रानुकूल जीवन व्यवहार अपनाएं।

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