रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

शबनम शर्मा की कविताएँ

image

वो


ज़िन्दगी के हर पहर में,
वो जुझती सी औरत,
कौन?
मुँह अंधेरे उठकर,
काम में लगती,
कभी बच्चों, तो कभी पति को तकती,
हर दम दबी-घुटी,
सबकी फरमाईशें पूरी करती,
फिर भी सवालों के घेरे में घिरी,
एक साथ कई काम निबटाती,
बिंदी माथे से उतर कर
कभी कोहनी पर या गाल पर आ जाती,
बाल संवर नहीं पाते,
पर काम पूरे ही नहीं होते,
बैठकर ठहाके लगाता
आँगन में पूरा परिवार,
लाँघते ही आँगन तिरछी सी
मुस्कान बिखेर जाती,
फिर जुट जाती, इस हिसाब में,
कौन मेहमान आने वाले हैं?
किसको क्या लेना-देना है,
सत्तो ताई बीमार है पूछने जाना है,
पटवारी के घर पोता हुआ, बधाई देनी है,
मशीन से हाथ चला
कोशिश करती पूरे काम,
ये कौन, इक मालकिन, उस बड़े घर की,
जो कहलाती महज़ इक सकुशल,
घरेलू महिला।
- ----------


 

वो नन्हा


पहन के बस्ता,
टाँग के बोतल,
स्कूल की चमकीली वर्दी में,
ठुमक-ठुमक कर वो पग भरता,
आया घर से पहली बार,
बहुत समझाया सबने उसको,
जा रहा वो भी शाला आज,
उतर गोद से पहन रहा वो,
ज़िम्मेदारी का है ताज।
जैसे ही स्कूल वो आया,
हमने उसे कमरा दिखलाया,
मैडम को था, हाथ थमाया,
नन्हें ने फिर शोर मचाया।
जोर से पकड़ा उसने मुझको,
नहीं रहूँगा, मैं कभी यहाँ,
ये सब तो घर में नहीं हैं
जाऊँ हो मौज मस्ती जहाँ,
उसके रुदन से, डब-डब आँखों से,
मेरा मन भी था भर आया,
छुड़ा कर हाथ, थमा शिक्षा के
मन्दिर में, मैं छोड़ के आया।
----------

 

माँ की वो संदूकड़ी


साल भर इन्तज़ार रहता,
मायके जाने का,
छुट्टियाँ होते ही, कुछ दिन
घर के काम-काज से चुराकर,
और भाई-बहनों संग प्रोग्राम
बनाकर, पहुँच ही जाते,
हम माँ के घर,
अपने गाँव में।

घर का कोना-कोना निहारती
दिखती माँ
समेटती छोटी-छोटी चीजें
हम सबको देने के लिये।
बटोरती कुछ सिक्के भी
बाँध लेती चुन्नी के कोने में,
आते ही गली से कोई भी आवाज़,
पुकारती बच्चों को, देती
अंटी से खोल कुछ पैसे, भागते
बच्चे, लाते सामान, खाते और
खिलखिलाते।

दिन बीत जाते, हम भी सामान बांधते,
देख हमें, माँ निकालती अपनी बरसों
पुरानी संदूकड़ी, जिसमें बाँधकर रखे हैं
हम सबके जोड़े, पुड़ियों में बंधे पैसे
मुन्ने के कंगन, गुड़िया की पायल।

एक-एक को पुकार कर देती,
खुश होती, बस दुआएँ देती,
मिलने जाते हम भी दूसरे कमरों में
वहाँ रहती है हमारी भाभियाँ

सामने वाले घर में दो चाचियाँ,
देखते ही हमको इक बनावटी मुस्कान,
पर्स से निकाल वो एक आध शगुन,
का नोट, कितना भारी लगता उन्हें,
दस बार अलमारी खोलती-बंद करतीं,
फिर कह देतीं, ‘‘तेरे लायक कोई कपड़ा
ही नहीं अलमारी में, सब..............’’

सोचती मैं कितनी अमीर है मेरी
माँ की वो जंग खाई पुरानी संदूकड़ी,
इन चमचमाती अलमारियों से
जिनमें से इक रूमाल भी नहीं
झाँकता लड़की को देने के लिए।

- शबनम शर्मा
अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर,
हि.प्र. - 173021

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget