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सुटेबुल कैरेक्टर / व्यंग्य / शशिकांत सिंह ’शशि’

हमारे रामभरोसे जी सबको प्रिय हैं। कल हमारे यहां उन्होंने चाय पी। चाय के दौरान बातें होती रहीं।

-’’ अभी तो साहब तीन साल बचे हैं। देश का भगवाकरण होकर रहेगा। ’’

हमने जिज्ञासा से उनको ताका। दो शब्द कहे-

-’’ और संविधान........।’’

-’’ संविधान का तो जी प्रभु की मूरत की तरह हाल है। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत तिन निरखही तैसी।’’

हम घनघोर चिंतन में डूब गये। देश को रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता। हमारा मन उस दिन काम पर जाने का भी नहीं था लेकिन जाना तो था ही। रामभरोसे जी लंच के समय भुपाली जी के घर पर बिरियानी खा रहे थे। उनके विचार काफी मोहक थे-

-’’ दो सालों में देश का जो विकास हुआ है वह सत्तर सालों में नहीं हुआ। मैं पूछता हूं कभी अमेरिका ने आपको पाकिस्तान पर तरजीह दी थी। नहीं न। फिर। पूरे विश्व में मोदी जी की जय-जयकार हो रही है। मोदी जी मतलब देश की जय-जयकार। रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। और तो और मुस्लिम तुष्टिकरण को भी समाप्त किया जा रहा है। ये जो सुडो प्रगतिशील हैं। उनकी तो ऐसी की तैसी हो जायेगी। ’’

बिरियानी के साथ शब्दों को चबाने का अगल ही स्वाद है। यह रामभरोसे जानते हैं। शाम के समय बाजार में दुकानदार से लड़ रहे थे-

-’’ यह क्या गुंडागर्दी है। किसान से बीस रुपये किलों टमाटर खरीदकर साठ की बेच रहे हो। लूट मचा रखी है। ’’

दुकानदार सफाई दे रहा था।

-’’ ऐसा नहीं है साब जी। हम तो पचास का किलो ही लाते हैं। हम किसानों के पास नहीं जाते हमें तो मंडी से माल लेना होता है।’’

रामभरोसे जी महंगाई को लेकर आंसू बहाते रहे। उनकी श्रीमती जी ने आगे की शापिंग स्थगित की और घरवापसी कर ली। रामभरोसे जी घर आते ही फेसबुक पर जा विराजे । सुबह से एक सेल्फी नहीं। न ही कोई पोस्ट। तुरंत एक पोस्ट टांक दिया-’ भर पेट दाल की पुड़ी और टमाटर की चटनी खाकर लोग महंगाई का रोना फेसबुक पर रोने लगते हैं।’’ लाईक और काॅमेंट की बरसात होने लगी। रामभरोसे का चोला मगन हो गया।

यानी रामभरोसे जी जो हैं वह एक सुटेबुल कैरेक्टर हैं। उनको कष्ट नहीं होने वाला। उपाध्याय जी के यहां बैठे हैं तो उनकी तारीफ कर रहे हैं।-’ सर, आपके मुकाबले में तो आधुनिक युग को कोई लेखक टिकता नहीं दिखता। आपने जिस बारीकी से मानवीय गुत्थियों का चित्रण अपनी कहानियों में किया है। वह अद्भुत है। प्रेमचंद के बाद हिन्दी साहित्य में ऐसा सूक्ष्म लेखन किसी का नहीं है।’’ उपाध्याय जी समझ रहे हैं कि बंदा दून की हांक रहा है। खजूर पर चढ़ाकर गिरायेगा। लेकिन मजबूर हैं। प्रशंसा में नशा होता है। वह तरी हो रहा है। गदगदायमान हो रहे हैं। उपाध्याय तनिक संकोच से कहते हैं-’ नहीं ऐसा नहीं है दुबे जी रचनाएं भी कमाल की होती हैं।’’ रामभरोसे चाश्नी में डुबकी लगाते हैं-’ सर, यही महानता तो आपको युग में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करती है। सबको पता है कि आप कहां और दुबे जी कहां।’’

अगले दिन रामभरोसे जी दुबे जी के घर एक गोष्ठी में पहुंचे हैं। सेल्फी दुबे जी के साथ हो गई है। उसके बाद जब साहित्य की बातें हो रही हैं तो उन्होंने क्या कहा होगा। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

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शशिकांत सिंह ’शशि’

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736

मोबाइल-7387311701

इमेल- skantsingh28@gmail.com

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