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उछलकूदिया न बनें इधर रहें या उधर - डॉ. दीपक आचार्य

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हम सभी चाहते हैं कि हम जो कुछ पाना चाहते हैं वह प्राप्त करने में कोई अड़चन न आए और सहजता से प्राप्त हो जाए। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि हम लाभ-हानि के अनुरूप अपनी भूमिकाएं रंगमंचीय पात्रों या बहुरूपियों की तरह बदलते रहें, चाहे जिसके पीछे-पीछे चलने लगें, अनुकरण करते रहें और उन सारे कामों में रस लेने लगे जिनसे हमारे स्वार्थ सधते हैं।

बहुत से लोग हैं जो जीवन में हर तरह के कुकर्मों, दुव्र्यवहारों के लिए जाने जाते हैं लेकिन इतने मीठे रहेंगे कि जैसे इनके मुकाबले कोई परमहंस न हो। बहुत सारे अपने आपको सर्वप्रिय और अजातशत्रु साबित करने के लिए व्यवहार में कृत्रिम माधुर्य ले आते हैं और सारे पाप कर्मों और दुराचारों के बावजूद मीठे ठगों के गुरु बने रहते हैं। 

समाज में जो लोग असामाजिक, अमर्यादित और मानवताहीन हैं उनके बारे में सभी को साफ-साफ पता होता है कि ये लोग समाजहन्ता हैं और बने रहेंगे। इसी प्रकार बहुत कम संख्या में ऎसे लोग हैं जिन्हें सदाचारी और ईमानदार  माना जाता है और वे अपने ईमान-धरम से डिगते नहीं चाहे लाख प्रलोभन सामने क्यों न दिखा दिए जाएं।

अच्छे और सच्चे आदमी को अपने अच्छे होने का कोई सबूत नहीं देना पड़ता। उनके काम और व्यवहार ही उनके कामों को दर्शाने के लिए काफी होते हैं। लेकिन बुरे लोगों के लिए यह जरूरी होता है कि वे अपनी बुराइयों को ढंके रखने के लिए इस तरह कुछ कृत्रिमता अपनाये रखें कि जिससे उनके कुकर्मो, पाप कर्मों और नालायकियों पर परदा ढंका रहे और किसी को उनकी असलियत का पता न चले।

लेकिन समझदार और जानकार लोगों के लिए इनकी थाह पाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। अच्छों और बुरों की साफ पहचान हो जाती है लेकिन एक बीच का इंसानी भण्डार ऎसा भी है जो अच्छे-बुरे सभी कर्मों में लिप्त रहता है।

हालांकि इस श्रेणी में शामिल लोगों को अच्छे-बुरे सभी की पहचान होती है लेकिन इनके स्वार्थ और ऎषणाएं इन पर इतनी हावी रहती हैं कि वे अपने आपको इससे बाहर नहीं निकाल पाते। इन लोगों की पहचान दोनों ही खेमों से जानी जा सकती है।

दुनिया में बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनके लिए न अपने कोई सिद्धान्त हैं, न मर्यादा और अनुशासन। इन लोगों के लिए अपने स्वार्थ और अपने काम ही महत्वपूर्ण हैं इसके सिवा इनका कुछ नहीं होता। इस तरह के ढुलमुल लोगों से पूरा जहाँ भरा पड़ा है।

हमारी सारी समस्याओं की जड़ में ये ही लोग हैं जिनके अपने कोई सिद्धान्त नहीं हैं बल्कि जिधर चुग्गा, मुद्रा या मखमली चादर बिछी हुई दिख जाए, उसी तरफ भागते नज़र आते हैं और जिन्दगी भर इधर-उधर लपकते रहते हैं। हालांकि ये लोग अपने कामों को करने - कराने में सिद्ध जरूर हो जाते हैं किन्तु इन पर कोई विश्वास नहीं करता है।

बुरे लोग तो और भी किसी काम से इनके पास जरूर आते-जाते रहते हैं मगर अच्छे, सच्चे और सज्जन लोग इनके पास कभी नहीं फटकते। इन लोगों की स्थिति ठीक उसी होटल की तरह होती है जिसके साईन बोर्ड पर लिखा हो कि वेजीटेरियन एण्ड नोन वेजिटेरियन।

इन होटलों पर नोन वेज के शौकीन लोग तो जाते ही हैं मगर कोई भी शाकाहारी फटकता तक नहीं।  इस स्थिति में ये होटले भले ही अपने आप को नोन वेज के साथ वेजिटेरियन भी घोषित क्यों न करती रहें, वेजिटेरियन इनसे दूर ही रहते हैं।

बहुत से लोग आजकल इसी किस्म के हैं। इन लोगों के स्वार्थों और कुकमार्ें के आगे कोई मर्यादा या वर्जना नहीं होती। ये किसी स्पष्ट सोच, तट या किनारे के नहीं होते। ऎसे लोग अपनी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता खो देते हैं। इन पर कोई भरोसा नहीं करता।

अपने प्रभुत्व, प्रभाव और दबाव के आगे हालांकि कोई कुछ बोल कर आफत मोल लेना नहीं चाहता है लेकिन इतना जरूर है कि इस किस्म के लोग अपनी साख खो बैठते हैं। हम सभी को चाहिए कि अपने आप को जानें, जीवन की सुस्पष्ट दशा और दिशा को अपनाएं, सिद्धान्तों पर अड़िग रहें और अपने जीवन लक्ष्य पर दृढ़ रहें।

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