शुक्रवार, 3 जून 2016

ये लोग तैयार रहें आकस्मिक महायात्रा के लिए - डॉ. दीपक आचार्य

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यों तो संसार में कोई अमर नहीं हो सकता, न अपनी वांछित आयु पा सकता है।

केवल वे ही अपनी पूर्ण आयु को प्राप्त कर सकते हैं जिनका आचार-विचार-व्यवहार और दैनिक जीवनचर्या संयमित और आयुर्विज्ञान के अनुकूल है।

इनके अलावा सारे के सारे लोग बीमार हैं या होने वाले हैं।

इनमें बीमारी का फर्क हो सकता है। आजकल हर इंसान बीमार है। कोई मानसिक है, कोई शारीरिक। और दूसरे सारे मानसिक और शारीरिक दोनों  ही प्रकार के। पूर्ण स्वस्थ कोई नहीं।

तभी तो आजकल अधिकांश रूप में देखा जा रहा है कि सबसे अधिक भीड़ अस्पतालों में है, सबसे ज्यादा मांग चिकित्सा के लिए पैसों की बनी रहती है और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य पर खूब सारा बजट खर्च हो रहा है।

सभी प्रकार के मीडिया पर स्वास्थ्य से जुडे़ समाचार, लेखों और अनुसंधानों का जखीरा बढ़ता जा रहा है और उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है डॉक्टरों, चमत्कारों से सेहत ठीेक करने वालों और सेहत से जुड़े संस्थानों का जमावड़ा। 

लगता है कि जैसे अब सब जगह बीमारों की मण्डियां सजी हुई हैं और यह धंधा खूब फल-फूल रहा है। दो तरह के लोग ही ज्यादा दिख रहे हैं-बीमार और बीमारों को किसी न किसी थैरेपी से ठीक करने का धंधा करने वाले। इनमें भौंपे-भल्ले, नीम-हकीम और झाड़-फूंक करने वाले तक सारे बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं।

सब जगह दवाइयों, जांचों और पैसों की बात है। कोई यह नहीं सोच रहा कि इस तरह का जीवन जीयें कि बीमारियां हमारे पास फटके ही नहीं। स्वस्थ इंसान को स्वस्थ कैसे रखा जाए, यह चिकित्सा विज्ञान का पहला सिद्धान्त है, बीमारियों का ईलाज उसके बाद की बात है।

लेकिन हम सारे के सारे दवाइयों, चश्मों, लाठियों, श्रवण यंत्रों और किसी न किसी सहारे के ही चल पा रहे हैं। हमें यह कह दिया जाए कि दवाइयां और बाहरी उपकरण सारे निकाल फेंको, तो शायद हम ढंग से जी तक न पाए। न देख-सुन पाएं, न सामान्य जीवन व्यतीत कर पाएं।

हम सब बीमार हैं, इस बात को स्वीकारने में हम भले ही हिचकते रहें, मगर हकीकत यही है।  शायद ही कोई ऎसा होगा जो दावे के साथ यह कह सके कि वह पूर्ण स्वस्थ है और उसे किसी भी प्रकार का कोई रोग नहीं है।

आज तरुणाई और जवानी के जोश में उछाले मार रहे लोग भले ही कुछ साल तक धींगामस्ती करते रहें मगर इन लोगों का भविष्य कुछ अच्छा नहीं कहा जा सकता।  इस मामले में प्रौढ़, अधेड़ और मौत के मुहाने तक जा पहुंचे सभी लोग कुछ न कुछ ऎसा कर ही रहे हैं जिससे कि हम बीमार हो जाएं और दवाओं पर जिन्दा रहने की मजबूरी सामने हो। और कुछ नहीं तो गुटखा, तम्बाकू, शराब और कोई न कोई नशा हमारे साथ जरूर रहने लगा है। 

हम असली खान-पान को ठुकरा कर इतना अधिक कचरा खा रहे हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। यह सारा हमारी जिन्दगी के लिए विजातीय द्रव्य से कम नहीं है। और यही कारण है कि जो लोग आहार-विहार और दिनचर्या का पालन नहीं कर रहे हैं उन सभी को चाहिए कि वे अपना मेडिक्लेम बीमा जरूर करा लें।

यों भी जो लोग देर तक बिना कारण जगते हैं, देर तक सोते रहते हैं, उनमें प्राण तत्व की कमी हो जाती है और ये लोग आईसीयू के भावी मरीज हुए बगैर नहीं रह सकते। या तो अपने आपको सुधारें और दिनचर्या को अनुकूल बनाएं या फिर आकस्मिक महायात्रा के लिए तैयार रहें।

शरीर के गुण्-धर्म और आयुर्वेद के परंपरागत शास्त्रीय ज्ञान के अनुरूप अपने जीवन को ढालें, जल्दी सोएं, जल्दी उठें और उन सभी सिद्धान्तों का पूरा-पूरा परिपालन करें जिनसे कि कम से कम शतायु प्राप्त हो सके।

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