रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

व्यंग्य-राग (२२) भाव खाने लगा है प्याज़ / डा. सुरेंद्र वर्मा

बरसात आती है और हर साल प्याज़ का भाव कुछ अधिक ही बढ जाता है. उसके तो मानों दिन ही फिर जाते हैं. बाज़ार उसकी चमक से चौंधिया जाता है. न जाने प्याज में ऐसा क्या है कि इधर उसका दाम बढ़ता है और उधर राजनीति गरमाने लगती है. और भी सब्जियां हैं – आलू, भिन्डी, टमाटर, कद्दू, भाव सबके उठते गिरते कहते हैं लेकिन सरकार गिराने की कूबत सिर्फ प्याज में ही है. प्याज का दाम बढ़ते ही लोग सीधे प्रधान मंत्री और सरकार को कोसने लगते हैं. जब कि सरकार न तो प्याज बोती है और न ही काटती है. पर एकाधिक बार ऐसा हो चुका है कि प्याज़ ने सरकारें गिरा दीं. सामान्यत: उपेक्षित रहने वाला प्याज लुप्त होने की कगार पर अचानक जब उठता है तो सरकारों की नींव हिला देता है. भले ही उसकी तेज़ी का ज़िम्मेदार मौसम का ढुलमुल मिज़ाज ही क्यों न रहा हो. एक और मजेदार बात यह है कि जब जब कांग्रेस सत्ता में नहीं रहती गैर-कांग्रेसी सरकार को प्याज सताए बिना नहीं रहता. प्याज की यह राज्नीतिक हरकत कई बार देखने को मिल चुकी है.

जब पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी थी उस समय भी सत्ता से बेदखल हो चुकी कांग्रेस को प्याज की तेज़ी का ही वह मुद्दा मिला था जिसका नाटकीय तौर पर इस्तेमाल कर बाद वाला चुनाव कांग्रेस जीतने में सफल हुई थी. केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब भी यह सरकार प्याज का ही शिकार हुई थी. अब फिर प्याज की कीमतों के उछाल का सीज़न आ रहा है. और इस समय भी गैर-कांग्रेसी सरकार ही केंद्र में है. बस फर्क इतना ही है कि इस समय सामने कोई चुनाव नहीं है. फिर भी सरकार की नींदें तो हराम हो ही गईं हैं.

वैसे प्याज़ के लिए प्रसिद्ध है कि वह ग़रीब का खाना है. एक प्याज़ की गांठ मिल जाए तो ग़रीब भर पेट रोटी खा लेता है. लेकिन इन दिनों प्याज़ इतराता फिर रहा है. अच्छे-अच्छे रईस दाल में तड़के के लिए प्याज़ से मोहताज हो गए हैं. खूब रुला रहा है प्याज़. पहले भी गृहणियां इसे काटती थीं तो आंखों में आंसू आ जाते थे. अब तो सब्ज़ी में न डाल पाने की वजह से वे रो रही हैं. क्या तो मंहगाई है ! प्याज़, पैट्रोल और बीयर एक ही मूल्य पर बिक रहे हैं. प्याज़ की इस ऐंठ से दुःखी होकर रईस ज़ादे अपनी कारों में पैट्रोल डलवा कर बीयर पीने निकल पड़े हैं. प्याज़ को मारो गोली !

भई, अपनी तो औकात ही नहीं है कि उसे खरीद पाऊं. रसोइए तक कहने लगे हैं कि प्याज़ से लड़ने का बस एक ही तरीक़ा है कि अगर वह अपना रवैया नहीं बदलता तो उसे उपयोग में ही न लाया जाए. उससे असहयोग कर दिया जाए. प्याज़ के खिलाफ यह असहयोग आंदोलन यदि शुरू हो जाए तो प्याज़ को झक मार के नीचे उतरना ही पड़ेगा. प्याज़ के अनेकानेक विकल्प भी सुझाए जा रहे हैं. पर मुश्किल यह है कि प्याज़ लोगों के मुंह लग गया है. उन्हें तो बस प्याज़ ही होना.

यों प्याज़ है बड़े काम की चीज़. गोल गांठ वाले इस कंद को मसाले की तरह सब्ज़ियों में तो डाला ही जाता है, अलग से हरे प्याज़ की तरकारी भी बनाई जाती है. लोगों का यह विश्वास है कि शहद मिलाकर यदि आंखों में इसे सुरमे की तरह डाला जाए तो आंखों की रोशनी बढती है. बेहोश को सुंघा कर तो देखिए, होश में आ जाएगा. बेशक इसके और भी अनेक चिकत्सकीय प्रयोग होंगे. हकीमों से पूंछ देखिए. पता चल जाएगा.

कुछ लोगों को तीव्र महक वाले इस कंद की उत्कट गंध सहन नहीं हो पाती और वे प्याज़ से परहेज़ करते हैं. वे इसे मुख-दूषण कहते हैं. (तुलना करें, पान से जो मुख-भूषण कहलाता है.) न जाने कितनी नायिकाओं ने अपने रोने-धोने के अभिनय में दर्शकों की दाद बटोरी है. लेकिन इसके पीछे प्याज़ का ही वरद् ह्स्त रहा है. कभी रोना आ रहा हो तो प्याज़ काटिए. प्याज़ की किल्लत ने इधर अच्छे-भले लोगों को लेखक और कवि बना दिया है. प्याज़ की विरदावलियां वे फेस-बुक पर लिखने लगे हैं और उसे गरियाने भी ख़ूब लगे हैं. ट्वीट करते हैं, पैरोडियां बनाते हैं. वैसे भी आलोचक और व्यंग्यकार प्याज़ के छिलकों की तरह बात की खाल निकालने के लिए प्रसिद्ध हैं हीं. प्याज़ तुझे प्रणाम !

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget