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संदीप तोमर की कविताएँ

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कविता

1.

“सम्पूर्ण प्रेम”

सुनो प्रिये !
मैंने
अपने पूरे होश में
तुम्हारे नाम
वसीयत में लिख दिया

सम्पूर्ण प्रेम
सोचता हूँ
तुम्हारा संवेदनशून्य

मलीन-भावनाविहीन

ह्रदय

नहीं महसूस पायेगा

उस वसीयत की अहमियत

और

तुम्हारे जीवन की

उलझी शाम में
खुरदरे हुए हाथों के स्पर्श से
मेरी देह
नहीं ले पायेगी सुख स्पंदन का ही
बस तब तुम
होंठ बिचका कहोगी
तुम्हें प्रेम है मेरी देह से

तब तुम घृणा से

फिरा अपना मुख

सो जाने का अभिनय करोगी
फिर लेटी रहोगी
ऊष्मा काल तक

सजाते हुए सपने

प्रेम के अहसास के
और भोर होते

पुनः झोंक डालोगी
अपने दोनों बेडौल हाथ
दिन भर के जंजाल में
इसीलिए
मैंने
अपने पूरे होश में
तुम्हारे नाम
वसीयत में लिख दिया

सम्पूर्ण प्रेम

२.

“उसे इन्साफ चाहिए “

समाज की ठेकेदारी देखो
बेटी की इज्जत हुई तार तार
बाप बना हरदम लाचार
बलात्कारी बैठा सीना ठोक
दर दर फिरती बेटी बेचारी
गुंडे बैठे ताक में
अबला सहमी
और समाज लादे गलत फहमी
प्रेम किया तो सूली चढ़ी
यौवन आया, लूट ली गयी
इज्जत की खातिर ताले में कैद,
कदम कदम पर पहरे सहती
भाई बाप संग भी महफूज न रहती
हर पल देखती अत्याचार
माँ जैसा त्याग सीख
ससुराल गयी
तो तानो की तलवार सही ,
समाज की इस बिसात पर
न्याय करे कौन
जहाँ हर रिश्ता होता गौण
बिन गलती भी सब रहते मौन
खामोश रही इंसानियत
मनचलों की कैसी नीयत,
उसे इन्साफ चाहिए
उसे इन्साफ चाहिए

3.

“हालात”

दुपहरी में आँख से टपकता है लहू
समुद्र किनारे टहलता
बैशाखी लिए एक अपाहिज
और उसके पास ही
एक बच्चा चुपचाप
मिट्टी का घरोंदा बनता है
एक औरत इनोवा का शीशा उतारती
अपने अर्ध वस्त्रों से बहार उड़ेलती
अपना विक्षिप्त यौवन
एक बूढ़ा तलाश रहा
वृद्धाश्रम में आशियाना

दुपहरी में पसीना
करता है तर मेरा तार तार होता
बनियान
मैं अपने घर की टूटी दीवार पर
टिका अपना कन्धा
तुम्हारी यादों को संजोता
हवा से सुखा देना चाहता हूँ
अपनी आँख का लहू

तुम्हारा अट्टहास
कंपा देता है मेरी रूह
लहू बहता है अब नदी सा
सीलन भरी कोठरी में
कुनमुनाने लगता है
हमारा पांच साल का बेटा
मैं आगे बढ़
दरवाजा खोलता हूँ
आँख का लहू समेटते हुए

४.

आम इंसान

उसके लिए नहीं लिखा जाता ग्रन्थ
नहीं बनता वह खबर का हिस्सा ही
न ही पूरे होता उसके सपने(?)
ना ही मिलने आते उससे उसके अपने
उसके लिए नहीं निकलती शोभा यात्रा
ना ही उसकी मूर्ति को आभूषणों से लाद
निकलती झांकियां सरे राह...............
उसके लिए नहीं टिमटिमाती
स्ट्रीट लाईटें
उसके घायल होने पर
नहीं किया जाता अस्पताल
पहुँचाने का/ इंतजाम
कोई न्यूज चैनल अपने
२४ घंटे के तय शुदा कार्यक्रम (?)में
नहीं देता उसके मृत -मुख को
पनाह ही
बस उसके हिस्से आता है
एक अफ़सोस जनक मौन
वह जो आम इंसान(?) होता है

५.

"राष्ट्रवाद का चाबुक"
आज कल हवा ने नया रुख पाया है
एक ही चेहरा चहुं ओर छाया है
प्रदूषित विचार
हर मस्तिष्क में खोंपे जा रहे हैं
घृणा के बीच
दिलों में रोपे जा रहे हैं.
फिजा निराले रूप दिखा रही है
जीने के सलीके सिखा रही है
सीधे रास्ते चलना और
अधर पर चुप्पी
देखो गलत तो विरोध न करना
पूर्वाग्रह से ग्रसित करार दे दिए जाओगे
देश निकाले के कगार तक आ जाओगे
जिन्दगी चुप रहना सिखा रही है
अफ़सोस और वेदना से मिला रही है
राष्ट्रवाद का चाबुक
कमर पर पड़ने दो
अपने जज्बात को दिल में
आजीवन सड़ने दो
समाजवाद का नारा लगाने वालों
किस उन्माद में घूमते हो
मौसम का हाल क्यों नहीं समझते
जून में बसंत आया है
फूलों का रस चूसने वालों का
प्रकोप सबको रुलाया है..
बहुत भरे है पाप के घड़े
एक और भर जाने दो
पतझड़ के इस फूल को
और निचुड़ जाने दो
मत करो अफ़सोस ही
राष्ट्रवाद का चाबुक
कमर पर पड़ जाने दो ...

 

कुछ और कवितायेँ.

1.

“नेरुदा के मानिंद”

जब तुम्हारा चेहरा
गुस्से से तमतमा रहा होगा
मैं तुम्हें सलाह दूंगा
एक गिलास पानी पीकर
शांत हो जाने की
या फिर तुम दस तक गिनती गिनकर
शांत हो जाओगे
उस शांति में हम
खोजेंगे वह जगह जहाँ
जहाँ उस शांति को कायम रखा जा सके,
कम से कम एक जगह
हम खोजें जहाँ मशीनों का शोर न हो
जहाँ भाषा में विचारों का
आदान प्रदान न हो
मात्र चंद पलों के लिए
हम अख्तियार कर लें
मौन की भाषा
वो बेहतरीन पल
जब भीड़ न होगी
न जहन की जादूगरी होगी,
हम सब एक साथ
मौन अख्तियार कर लेंगे
एक ऐसा संसार जहाँ
किसी हिरन को इंसान या शेर से
शिकार होने का भय न हो
और मछलियाँ घूम सकें
तालाब-समुन्दर-नदीं में
न पकड़ें जाने के भय से
गाय-भैंस-बकरियां हो जाएँ
बेफिक्र अपना दूध दुहे जाने से
इंसान भी हो जाएँ बेख़ौफ़
एटमी शक्ति के विनाश से
आओ हम चलें उस सुनसान में,
जब आदमजात हो जाये शांत
देशों की सीमायें हो जाएँ मुक्त
बन्दूक की नोंक से
समुन्दर से नमक बनाता मजदूर
न देख पाये हाथों का यूँ गलना
युद्ध की आशंका से घिरा
सीमा पर तैनात जवान न देखें भय
घर पर राह देख रहे
अपने मासूम बच्चों की आँखों में ,
आओ हम पहन लें वो पोशाकें जो
हो जाएँ मुक्त हर एक भेदभाव से ,

जो सब मैं कह रहा हूँ
हो सकता है इसे आप समझ लें कोई बकवास
या बासी हुई तमाम संकल्पनाएँ
लेकिन सच कहता हूँ दोस्तों
ये सब जीवन का फलसफा है
जिसका मृत्यु से कोई लेना-देना नहीं,
दोस्तों ओशो कहता था- मैं मृत्यु सिखाता हूँ
हम पहले सही से जीवन जीना
सीख लें , मृत्यु को तो एक दिन धरती ने
सिखा ही देना है,

हाँ तो मैं वही कह रहा था
जो एक दिन नेरुदा कह रहा था
उसने कहा था- काश हम इतने मन से
जिंदगी की भाग दौड़ में शामिल होकर
कभी रूककर कुछ नहीं करते
तब शायद एक चुप्पी
हमारे इस दुःख को थाम लेती
ठीक वही बात मैं कह रहा हूँ
ध्यान से सुनो
काश हमने समझा होता
शिद्दत से साथ, विकास का हर पैमाना
और उतने ही मन से
इस्तेमाल किया होता मानव मन को
तो धरती ने ये रूप न धरा होता
इसीलिए दस तक गिनती गिनो और
शांत हो जाओ

"खंडित आज़ादी"

तुम कहते हो आज़ादी पाई
लगती मुझको जग हंसाई
जिनके बल पर ये दिन आया
विरासत में आज़ाद भारत पाया
जिन्होंने नहीं सीखा अत्याचार सहना
क्या पहन सकते हो उनसा तुम गहना
जिनकी क़ुरबानी की गाथा हम गाते है
बोलो उनके जैसे क्या हम बन पाते है
दिल्ली की सडकों पर जो हाथ फैलाते है
पूछो उनसे वो सरकारों को क्या कहते हैं
हमने जो आधुनिक भारत है बनाया
कितनों ने है भर पेट भोजन खाया
जहाँ नारी और बच्चे बेचे जाते है
वहां कौन कब सभ्य कहलाते हैं
राष्ट्र के नाम पर छद्म सिखाया जाता है
क्या वो ही मित्रों विश्व गुरु कहलाता है
झूठी मुठभेड़ में मासूम मार गिराए जाते है
जय श्रीराम के नारे फिर लगवाए जाते है
भूखों नंगों को हथियार थमा दिए जाते है
और जेहादी नारे जोर से लगवाए जाते है
फिर तुम कहते हो आज़ादी पायी है
सच ही तो कहता हूँ ये जग हंसाई है
वो दिन दूर नहीं जब समाजवाद आएगा
बच्चा बच्चा अमन की तालीम पायेगा
नहीं चाहिए मात्र राजनीतिक आज़ादी
ले-लेंगे सामाजिक और आर्थिक आज़ादी
एक और आज़ादी की अब पुकार हो
क्रांति का जुनून मेरे युवा में सवार हो

3

“खो जाने दो”
इस लोलुपता से दूर
किसी सुनसान में ..
आओ चले जंगल की ओर
कर आलिंगन मेरा
जलते रेगिस्तान को
चंद बूँदें प्यार की पिला
मुझे कहीं खो जाने दो
आओ आज मैं
अपने स्पर्श से
तुम्हारे विशाल वक्ष को
भर दूँ उमंगों से
और तुम्हारे आगोश में रह
अपने यौवन को अमरत्व तक
पहुंचा दूँ.......
मुझे आज डूब जाने दो
प्यार के उस पोखर में
जहाँ पहुँच कोई इच्छा
न रहे शेष ......
हवा की मर्मर ध्वनि
हृदय को कर जाए स्पंदित
और उसकी गहराई में भी
मह्सुसूं तुम्हारे अहसास की
अदृश्य दीवारें
हो अहसास तुम्हारे
मुझसे लिपट जाने का
जैसे लता हो कोई
लिपटी किसी दरख्त से
बीत जाएँ यूँ ही सदियाँ
सहस्त्राब्दियाँ
मुझे आज अपने आप में

खो जाने दो...

४.

“आतंकी “

आतंकी कोई मानव नहीं
मानवता का हन्ता होता है
वहशी पैदा होता है वहशी ही जाना है
सच कहता हूँ दोस्त
ईश्वर अल्लाह गॉड वहम की बात है
वो गर होता तो क्या यूँ सोता
अताततायी के खेल रोकने न आता
क्या उसका दिल मासूम की चीख से न रोता
लोग कहते है वो कण कण में है
फिर अमन के दुश्मनों से क्यों घबराता है
'क्यों नहीं सामने आता है
बच्चे मासूम होते है
उसकी कसम में सच को खोजते है
सच के बारे में कितना सोचते हैं
एक वो जो अमन छीनने वाले है
अन्दर तक से काले के काले हैं
किसको नहीं लूटते, बच्चे बूढ़े महिलायें
कौन इनकी गिरफ्त से बचते है
क्या क्या परपंच ये रचते हैं.
हत्या चोरी डकैती इनका नित्य कर्म है
वहशियाना इनका धर्म है
इनसे अच्छा तो होगा शैतान
रखता होगा कोई दीन-ईमान
लेकिन दोस्तों इनसे बदला लेने
इन्हें सबक सिखाने कोई
ईश्वर अल्लाह गॉड नहीं आता
इसीलिए सच कहता हूँ
ईश्वर अल्लाह गॉड वहम की बात है
वो गर होता तो क्या अब भी नहीं आता..

५.

“सत्ता में भेडिये जमे बैठे हैं "
अपना मेमना अभी शर्मिला ..सजीला छोटा है
शेर भी बन जायेगा , सब दांव सीख ही जायेगा
वो जो भेड की खाल में सत्ता में भेडिये जमे बैठे हैं
भोली भाली जनता को ठग वो धन्नासेठ बने बैठे हैं
मौका देख झांसा दे वो अपने मेमने को फुसला लेंगे
अपने जैसे मौका परस्तों को मेमने की दावत देंगे
हम तो इस मौका परस्ती का आनंद नहीं उठा सकते
मेमने की रक्षा के लिए तीर भला भी नहीं चला सकते
बहुत हुआ यूँ अफ़सोस जताने से कुछ नहीं होना है
मेमने की खातिर हमें साथी क्रांति का बीज बोना है

६.

“जुमले”

वो रोज गली में आता है
जुमलों की बोली लगता है
लाल गुलाबी हरे पीले संतरी
खरीदो तो बन जाओ मंत्री
सस्ते टिकाऊ लोकलुभावन
चला सको जिसे तुम अगले सावन
लाया हूँ जी मैं जुमले
ले लो तुम छोटे बड़े या तुम अगले पिछले
यहाँ मुफ़्त में हर एक मिलेगा
बच्चों को हर सपना दिखेगा
मुफ़्त शिक्षा स्वास्थ्य गरीबी
हर ली जायेगी सब करीबी
काला धन काला धन चिल्लाकर
तुम्हारे अब कर्मों को पिघलाकर
हर सपना मौलिक दिखलाऊंगा
स्विस बैंक से सब वापिस लाऊंगा
100 दिन की तुम मोहलत दे दो
बस एक बार ये ताज तुम दे दो
बेरोजगारी को यूँ मिटा दूंगा
विपक्ष को तो खूब रुला दूंगा
तुम मुझको सत्ता दिलवा दो
और एक झोला सिलवा लो
15 लाख की सौगात मिलेगी
या पिछवाड़े पर लात मिलेगी
माँ बेटे ने देश को लूटा था
सब लोगों का सपना टूटा था
सपनों की मैं झड़ी लगा दूंगा
जुमले है जुमले देता हूँ
एक मांगो हजार मिलेंगे
देखो सच की तुम डिमांड न करना
मेरी बातों का यूँ विश्वास न करना
बाहुबलियों से खूब डरे हो
अब थोडा सा तो मुझे डरना
रोजगार क्यों मांगते हो
जुमलों से खूब पेट भरना
लाया हूँ जी मैं जुमले
हरे बैंगनी नीले पीले।
एक मांगो हजार मिलेंगे
अब जुमलों से ही पेट भरेंगे।

७.

“इतना बेजार भी नहीं हूँ”

तेरे पाक उसूल है तेरी रूह का आइना
अजब नजाकत लिए कुछ यूँ बढे
कि मौज़ जैसे आसमां को छूने चले
ताज्जुब कि फ़लक भी रो पड़ा मेरी वजूद देख
तेरे लबों पे उफ़्फ़ तक नहीं
अफ़सोस कि सूना ही रहा वो इश्क-ओ-हरम
तेरा जूनून भी मेरे इश्क के काबिल नहीं
मेरा वजूद तेरी नस्त में उलझा रहा
अब इस दिल को एक पल का करार नहीं
आबरू क्या उस परिंदे की जो कैद पिंजरे में
तेरी जुस्तजू से जो सर्द था बाजार ए- दोस्त
नज़ाकत के दौर से बढ़े आगे भी
तेरी फ़ितरत में वहशत ही सही
हर्फ़-ए-वफ़ा मिटने से क्या होगा
जो एक हया से परे जा सके
इंतज़ार भी कर लेता तेरा सब्र तक
तू मेरे रंज-ओ-गम तक जो सुनता
क्यूँ एक बुत में रखूं तमाम जिन्दगी
वो जो किसी गैर की खातिर दगा कर गए
क्यूंकर अब गुफ़्तगू और कि जाये
जिन्दगी में रंज तो मिले हज़ार
तेरे सजदे में क्यों उलझे रहें
जहाँ सर झुकाने को माने कुबूल-ए-गुनाह
तेरी सोहबत में क्या नहीं पाया
जो आज मलाल भी देख शरमाया
दिया है गर जिगर तुझे तो समझ ले
इतना बेजार भी नहीं हूँ मैं ...

८.

"तुम्हारा अकस्मात् जाना "
खिड़की से कोई झाँका
या फिर दरवाजे पर दस्तक दी
यूँ दरवाजे का खुला छोड़ चले जाना
अच्छा तो नहीं..
और वो अँधेरे और उजाले के बीच
इधर उधर दौड़ना
क्या साथ जीना दुश्वार था या फिर
अकेलेपन की आदत से सुमार
जाने कौन सा अँधेरा तुम
अंदर समेटे हुए थे
जाने से पहले तुमने
बताया तक नहीं
ऐसी जगह जाने की क्या सूझी
कि वापिस भी ना आ सको.
जाने कौन सी जल्दी थी यूँ चले जाने की
तुम्हारी कविता भी तो सूनी सूनी नहीं थी
तुम्हारी अंतिम यात्रा में भी तो नहीं जा पाया मैं.
तुम्हारी चलने की गति
कुछ समय से अधिक नहीं थी..
पृथ्वी आज भी घूम रही है..
अपनी धुरी पर भी और
सूर्य के गिर्द भी
चाँद भी पृथ्वी के संग चल रहा है अनवरत
दुनिया के सब कार्य अपनी गति से चल रहे हैं.
मानसून का भी अपना ढंग है
वही हवा वही पवन वही
वही वाहनों से निकलता धुआं
इंसानों के काम काज के तरीके
सब कुछ वही तो है
गर्मी भी वैसे ही है
वही बारिश के बाद की हुमस
गर कुछ नहीं है तो वो हो तुम
एक शब्द गूंजा है ..एक आह उठी है
एक साँस रुकसी गई है
तुम्हारा अट्टहास आज भी मेरे कानों में गूंजा है
तुम्हारी अंगुली के पोर
मेरी अंगुली में नहीं अटके हैं
वो भरा हुआ घड़ा फूटने की आवाज
अभी भी कानों में गूंज रही है
वो अन्न के दाने अभी भी
जमीन पर बिखरे पड़े है
पांच दिये टिमटिमा रहे हैं
पृथ्वी आज भी घूम रही है..

९.

***********************
"वो सपने जिनमे तुम हो"
***********************
(शालू मिताक्षरा की कविता पढ़ने पर उपजे भाव )
मैं शून्य सूखा गोबर हूँ
तुम गीली माटी सी
मैं पथरीला बेजान सा पर्वत
तुम जल से भरी बदली हो
प्रेम वर्षा करने को तत्पर
हर पल सींचा है तुमने
मेरे जीवन का जंगल वीराना सा
हर पल बंधाया ढाढस तुमने
मेरे अवसाद के मौसम में
पर सुनो, जब तुम चहकती हो
पर्वत के उस पार जाने को
और वापिस मांगती हो मुझसे
वो तमाम सपने प्रेम भरे
तब मैं
हो जाता हूँ जडवत
निराश ,परेशान,और बेबस भी
कैसे लौटा दूँ तुम्हें सपने
वो सपने जिनमें तुम हो,
तुम्हारी छवि है
और है मेरा अवसाद
बताओ कैसे लौटाऊँ,,
मेरी आँखों के दरमयान
आ जाता है एक धुंधलापन
वो आँखें ,जो कभी तुम्हें
बहुत प्यारी लगती थी..
और मेरी हंसी गायब हो जाती है ,
वो हंसी...जो...
तुम्हें लगती थी"जीवन संबल "
ऐसे पलों में मैं पाता हूँ खुद को
निस्सहाय
और निष्प्राण भी...
मेरा रोम रोम कांप उठता है
तुम्हारे खो जाने के भय से
........
बताओ कैसे लौटा दूँ
तुम्हें वो तमाम सपने
प्रेम भरे
जो तुमने ही जगाये थे जीवन में
कैसे गड़बड़ाऊँ प्रेम गणित
आखिर प्रेम गणना का
दायरा इतना छोटा भी तो नहीं......

१०.

"जानती हो"

जानती हो तुम्हारी आँखें
बहुत खूबसूरत और नशीली है..
एक दम डुबो देने वाली..
जैसे छलकता जाम हों
और भी बहुत सी खूबसूरती है
फिर कभी बताऊंगा ...मिलकर
सब कुछ टाइप नहीं करना चाहता
तुमने पूछा --बताओ ना और क्या ?
मैंने कहा था--
और जुल्फें..जैसे घटायें हो..
दिल की उमंगें बढ़ा देने वाली
उससे बढ़ और क्या वर्णन करूँ
तुम्हारे रूप का
तुम्हारे यौवन का?
तुमने और जिद्द की
मैंने कहा--
सब कुछ अभी पूछा लोगी तो
मिलने का खुमार जाता रहेगा.
और हाँ --
तुम्हें इतना कुछ बोल देता हूँ
सामने कुछ न बोल पाया तो
मैंने संशय जताया था
उस वक्त तुम्हारा जवाब
कुछ न बोले तो तुम
मार खाओगे
इश्क की दुनिया में
कमजोर कहलाओगे
या फिर मुझे बेवफा
कहलवाओगे...
हाँ तो तुम बता रहे थे --
मेरे सौन्दर्य के बारे में
तुमने फिर से पूछा था...
और मेरी नजरे तुम्हारे
तेलीय चित्र में उभरे
वक्ष पर टिक सी गयी थी..

११.

***************
"सुसभ्य पुत्री"
****************
तुम्हारा सान्निध्य जब मिला
बहुत तर्क करता मैं तुमसे /
तुम्हारे लेखन की असीमित
......................संभावनाएं ,
मुझे अक्सर निरुत्तर करती /
इस बीच ,जब जब टटोला
.....................तुम्हें .........
पाया हर पल उस नारी को
.....................तुममें ......
जो रही सदियों से ग्रसित , पीड़ित
और समाज की रुढियों में
.........................जकड़ी /
मैंने पूछा था तुमसे -
तुम , जो भी लिखती हो --
आदर्श प्रतिमानों की स्थापना मात्र
या जीवन जीने की कल्पना (भ्रमित सी )
कब निकल बाहर आओगी उन
तमाम वर्जनाओं से /
तुम बखूबी निभाती रही
एक सुसभ्य पुत्री होने का भ्रम
होकर प्रेम से विमुख
अक्सर तलाशती रही
स्व-विस्तार के नित् नए आयाम
और रोपती रही खुद ही
चरम सुख पाने की चाह के बीज/
आज -
एक लम्बी दूरी है
हम दोनों के दरम्यान
पर मैं हारा नहीं
और तुम भी परास्त नहीं हुई
...................जीवन से......
मैं लिखने की आदत से मजबूर
और तुम न पढ़ पाने को मशहूर
लिखने का हुनर भी तो तुमसे पाया
भले ही तुमको न दिल भुलाया
पुनश्च तलाश में ........./

१२.

***************************
किस्सा ए तमाम लिख दूँ
*****************************
चलो आज कोई कलाम लिख दूँ
कुछ न सही एक सलाम लिख दूँ /
तुम्हारे मेरे बीच पनपे रिश्ते का
ज्यों का त्यों ही कलाम लिख दूँ /
हर रोज़ ही रूबरू हुआ करो तुम
ऐसा ही कोई फरमान लिख दूँ /
बीते साल की हसीन सरगोशियाँ
सब कुछ तुम्हारी जुबान लिख दूँ
देख ले जमाना भी मेरा आज हुनर
ऐसी दास्तान ही मैं तमाम लिख दूँ

१३.

***************************
तुम्हारे अनगिनत चुम्बन
****************************
तारों की शीतल छाँव
होती गई जब आतुर / अंतिम सफ़र को
तब मैं, जागता हूँ / पर
करता हूँ बहाना / निद्रा के आगोश में
सामने का,
रवि किरण / चन्द्र आभा के
अंचल में खेलती
झरने की निर्मम / कल कल करती ध्वनि
बढाती हृद्य के स्पंदन
और मैं पता हूँ / तुम्हारा स्पर्श
कंपकंपाते होंठ /तुम्हारे अनगिनत चुम्बन से
हो जाते तरबतर
होंठों की नमी / बढ़ाती- होंसला
देर तक, तुम्हें / महसूसने का
उस वक़्त / देह मर्यादाओं की
अवहेलना कर
कुरेदती है / ह्रदय की गहराई तक
प्रेम के जख्म ,
तुम प्रतीत होती हो / सशरीर मुझमें समाती सी
मैंने पा लिया / वो पल / जब
तुम्हारा स्पर्श / रोमांच से भरपूर
मुझे करता मजबूर / बार बार
जागने को
मैं , अब सोना नहीं चाहता / जागना भी नहीं चाहता
मैं खो जाना चाहता हूँ
उन अनमोल पलों में
बंद कर लेना चाहता हूँ / मुट्ठी में
भोर का आगमन ,
मैं चाहता हूँ महसूसना / तुम्हारे अनगिनत चुम्बन !

१४.

**************************
देखता हूँ बहुत करीब से
**************************
चेहरे पर खामोशी
नयनों का सूनापन
अधरों को कम्पन्न
तुम दे गयी /
तुम अपनी ख़ामोशी से
मेरी चंचलता के रास्ते में
बिखेरती गयी / नागफनी के नन्हे पौधे
वो पौधे बिन नमी के
बढ़ते / देते जन्म / नए पौधों को /
इस सिलसिले में
पाया असीम विस्तार
जीवन के खालीपन ने
इस खालीपन में तुम हो
तुम्हारी आवाज है
संभवतः कानों में गूंजती
वह, तुम्हारी ही आवाज है /
"मैं"... उखड़ी सांसों के साथ
हाँफता-काँपता-बुदबुदाता
आप ढाढस बंधाता
घूमता रहा हूँ आज
पाने को सावन की फुहार
तुम्हारी नादान -अल्हड - जवानी का मौसम
तुम्हारी गर्म सांसो की तपन /
जब मंजिल पास आती प्रतीत होती है
तो देखता हूँ बहुत करीब से
चेहरे पर खामोशी
नयनों का सूनापन
अधरों का कम्पन्न
मैं तोडना चाहता हूँ ....
ये ख़ामोशी ....ये सूनापन ....
चुभन का अहसास कराते जाते
हर पल....
नागफनी के नन्हे कांटे.....

 

१६.

"राज़ कई "
होंगे दफ्न तुझमे भी कई राज़
कितने ही गम कितनी ही आरजू
और वासना के शहर भी
जैसे पतझड़ में हर पत्ता
बिखर जाता है टूटकर
भटकता है जंगल में दर-ब-दर

बिखरे होने सपने तेरे भी
जैसे सावन में पड़ा हो अकाल
और उजड़ी हो बस्ती
या फिर जली हो झोपड़ पट्टी
स्मृतियों के मलबे में
कुचले होंगे तेरे अरमान भी

नहीं समझ पाया होगा स्पंदन
तेरी ही निजी संवेदना का
उकेरी होंगी छवि उजली सी
चांदनी रात में देखा होगा
खुद का ही चेहरा मासूम सा
दफ्न होंगे तुझमें भी कई राज

१७.

"निष्ठाएं "
निष्ठाएं कितनी पाक है
पता करोगे कैसे
मन से
भाव से
या फिर तन से (?)
इसका अंदाजा तो इसी से लगेगा
कितना रास्ता साथ साथ तय किया
कितनी ही गहराई दिलों की
हमने नापी
कितनी शिद्दत से
कसा एक दूसरे को
बाहुपाश में
विरह, उत्पीडन, विच्छेद
सहकर भी जिसने नहीं छोड़ी
मिलन की आश
उसी की निष्ठाएं पाक हैं
उसकी का हृदय
प्रेम से ओत-प्रोत है.
वही प्रेम का हलाहल है....

१८.

"राष्ट्रवाद का चाबुक"

आज कल हवा ने नया रुख पाया है
एक ही चेहरा चहु ओर छाया है
प्रदूषित विचार
हर मस्तिष्क में खोंपे जा रहे है
घृणा के बीच
दिलों में रोपे जा रहे हैं.
फिजा निराले रूप दिखा रही है
जीने के सलीके सिखा रही है
सीधे रस्ते चलना और
अधर पर चुप्पी
देखो गलत तो विरोध न करना
पूर्वाग्रह से ग्रसित करार दे दिए जाओगे
देश निकाले के कगार तक आ जाओगे
जिन्दगी चुप रहना सिखा रही है
अफ़सोस और वेदना से मिला रही है
राष्ट्रवाद का चाबुक
कमर पर पड़ने दो
अपने जज्बात को दिल में
आजीवन सड़ने दो
समाजवाद का नारा लगाने वालों
किस उन्माद में घूमते हो
मौसम का हाल क्यों नहीं समझते
जून में बसंत आया है
फूलों का रस चूसने वालों का
प्रकोप सबको रुलाया है..
बहुत भरे है पाप के घड़े
एक और भर जाने दो
पतझड़ के इस फूल को
और निचुड़ जाने दो
मत करो अफ़सोस ही
राष्ट्रवाद का चाबुक
कमर पर पड़ जाने दो ...

१९.

"स्नेह हस्त तो धरेंगे "

नहीं चाहता हूँ कि
दहेज़ लेकर
कलंक में जी सकूँ
ऐसा कर मैं प्रकृति का
विरोधी ही बन सकूँ
खुद का जमीर
खोना नहीं चाहता
बारात ले जा मैं
परम्परा धोना नहीं चाहता
ये दुष्कर्म कर मैं
किस पर कर्ज का बोझ लादुं
किस सभ्य समाज का
बन जाऊं साधू
इस कर्म में पड
मैं स्वं जन को तो भा जाऊंगा
अगली असंख्य पुस्तों को
कौन मुंह दिखलाऊंगा.
मेरे इन कर्मों से
मेरे अपने तो हंसेंगे
ऊपर जाकर फिर निराला
मेरी पीठ पर स्नेह हस्त तो धरेंगे ...'
स्नेह हस्त तो धरेंगे
स्नेह हस्त तो धरेंगे .....

२०.

"एक अरसे बाद "
एक अरसे बाद मैंने देखा
बाद्लों का प्रकोप घनघोर
किसान की छाती पर लोटते सांप
सिसकते हृदय से निकलती आह
एक अरसे बाद..
कैसे मैं सुन पाया
रामदास के बच्चे की आह
फसल न बिक पाने से
फीस न जमा हो पाने का गम
एक अरसे बाद..
मैंने देखा
कोयल का बेसुरा राग
आम के पेड़ का बिखरा शृंगार
अमेरि का कसेला स्वाद
एक अरसे बाद...
मैंने जी भर कर आंसू बहाए
सरसों के बीज रहित फूल पर
इंद्र की भयंकर भूल पर
एक अरसे बाद...
मैं हुआ उदास
गन्ने की फसल न बो पाने
न गन्ना ही चूस पाने के भय से
एक अरसे बाद...
मैंने जी भर कोसा
सृष्टि बनाने वाले को
हर किसान की बदहाली को..
एक अरसे बाद.....

 

संपर्क: 

 

Email: gangdhari.sandy@gmil.com

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