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व्यंग्य-राग : काली स्याही सुर्ख़ियों में / डा. सुरेन्द्र वर्मा

ऐसा बहुत कम होता है कि काली स्याही सुर्ख़ियों में हो. लेकिन आजकल है.

काली स्याही का सुर्ख़ियों में होना, बड़ी विरोधाभासी चीज़ है. जो स्याह रंग हो, वही तो स्याही है. एक तो स्याही के लिए काली स्याही कहना अपने आप में ही उसके काले होने को अनावश्यक तूल देना है और फिर स्याह को सुर्ख बना देना और भी अजीब लगता है ! स्याही प्राय: लेखन कार्य के लिए इस्तेमाल की जाती है. अत: धीरे धीरे स्याही शब्द लेखन के सन्दर्भ में ही प्रयोग किया जाने वाला द्रव्य हो गया, भले ही वह लाल या नीला ही क्यों न हो. इस तरह लाल-स्याही, नीली स्याही, नीली-काली स्याही, आदि, पद-बन्ध प्रचलन में आ गए सामान्यत: लिखा काली स्याही से जाता है और मुद्रण के लिए भी काली स्याही का इस्तेमाल होता है.

काला काला है, वह सुर्ख नहीं हो सकता मुश्किल काले के साथ यह है कि वह हमारा ध्यान जल्दी नहीं खींच पाता. लाल रंग अपनी चमक से हमारा ध्यान तुरंत खींच लेता है. लेकिन काली स्याही कुछ ऐसा करतब कर बैठे की हमारा ध्यान उसकी ओर जाए बिना न रहे तभी काली स्याही का सुर्ख हो जाना समझ में आने वाली बात है –जैसे काली स्याही से लिखने की बजाय, किसी का मुंह काला कर दिया जाए !

ऐसा हो सकता है. ऐसा किया जा रहा है. वैसे ‘मुंह काला हो जाना’| लेकिन यह तो प्रतीकात्मक बात हुई; कोई व्यक्ति जब कोई वर्जित काम, जिसकी स्वीकृति समाज नहीं देता, करता है, तो कहा जाता है कि उसने ऐसा करके अपना मुंह काला कर लिया. मुंह वास्तव में काला नहीं होता, जिस रंग का है –गोरा, भूरा. श्यामला- उसी रंग का बना रहता है |

पर लोग हैं कि उन्हें इतने भर से चैन नहीं ! वे मुंह काला होने के केवल प्रतीकात्मक अर्थ से संतुष्ट नहीं होते. वे कभी कभी, भले ही अपने मूल प्रतीकात्मक अर्थ में मुंह काला न हो पाए, काली स्याही पोतकर वास्तव में अपनी झल्लाहट के चलते किन्हीं लोगों के मुंह पर काली स्याही पोत देते हैं. ऐसे में मुंह कितना ही गोरा क्यों न हो काला पड़ जाता है.

गांधी जी ने सत्याग्रह करने के लिए विरोध करने के हमें कई अहिंसात्मक तरीके बताए थे. इन तरीकों में आजकल लगातार इजाफा हो रहा है. काली स्याही सुर्ख़ियों में है. लोगों ने विरोध का यह एक नया अंदाज़ अपना लिया है. कहा जा रहा है कि मुंह पर काली स्याही पोतना भी विरोध करने का एक अहिंसात्मक तरीका है. गोली-बारी से, मार-पीट से, जूतम-पैजार से, यहाँ तक कि गाली-गलौज से भी यह अधिक अहिंसात्मक है ! अधिक प्रजातंत्रात्मक है. यह एक ऐसा तरीका है जिससे व्यक्ति की काली करतूतें उसके चेहरे पर आ जाती हैं. आ जानी चाहिए. लेकिन अगर काली करतूतें हैं ही नहीं तो भला वे चेहरे पर आ ही कैसे सकती है ? सोचने की बात है. ‘‘गांधीगीरी’’ का सोच से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा.

हमारे देश में कुछ इसी प्रकार की गांधीगीरी इन दिनों चल रही है. खूब गालियाँ बको, उलटा-सीधा कहो, एक दूसरे को नीचा दिखाओ, नंगई पर उतर आओ, विरोध के ये सभी अहिंसात्मक तरीके मान लिए गए हैं.

ईसा मसीह का अनुसरण करते हुए गांधी ने कहा था, अपने पड़ोसी से प्रेम करो. लेकिन उसका यदि विरोध करना हो तो? बहिष्कार कर दो उसका. भले ही फिर वह गुलाम अली जैसा गायक ही क्यों न हो. विरोध का यही अहिंसात्मक तरीका है. पाकिस्तानी लेखक की किताब का विमोचन हो. पूरी कोशिश करो कि वह न हो पाए. विमोचन करवाने वाले के मुंह पर कालिक पोत दो. विरोध का विनम्र तरीका है. ताज्जुब है, विरोध के इन तरीकों में विरोधाभास किसी को नज़र ही नहीं आ रहा है

-सुरेन्द्र वर्मा (मो).९६२१२२२७७८

ब्लॉग, हाइकु – surendraverma389.blogspot.in

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