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पुण्य समाप्ति का संकेत है उत्साहहीनता - डॉ. दीपक आचार्य

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जीवन में उत्साह, उमंग और पहल करने की प्रवृत्ति धर्म, पुण्य और दैवीय गुणों को संकेतित करने वाला मुख्य लक्षण है। जब तक इंसान के भीतर ये सब होते हैं तब तक उसका जीवन आत्म संतुष्टि, आनंद और रुचि से भरा-पूरा रहता है।

पाप और पुण्य बराबर होने की स्थिति में इंसानी जिन्दगी कामचलाऊ बनी रहती है। लेकिन जैसे ही पुण्य का बहुत अधिक मात्रा में क्षय हो जाता है, पापों की अधिकता बढ़ जाती है तब जिन्दगी बोझ सी प्रतीत होती है।

शरीर चाहे कितना सुगठित, बलवान, सुन्दर और पौष्टिक दिखे, लेकिन तन-मन और दिमाग हर क्षण बहुत भारी-भारी लगते हैं और ऎसा प्रतिभासित होता है कि जैसे खुद को कुछ कदम चलने में भी मौत आती हो, शरीर को किसी भारी बोरे या बोरी की तरह घसीट कर आगे ले जाना पड़ रहा हो।

लगता है कि हर क्षण चुपचाप गुमसुम बैठे रहें, कमरे से बाहर निकलने को जी नहीं चाहता, गाड़ी में बैठे हों तो बस बैठे ही रहें। चलना-फिरना भी अच्छा नहीं लगता। यह भी अच्छा नहीं लगता कि अपनी तरह के इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ कर किसी से बात भी करनी पड़े। यानि की इंसान पूरी तरह आत्मकेन्दि्रत और जड़ताग्रस्त  ही हो जाता है।

किसी विवशता से बाहर निकलना भी पड़ता है तब बहुरूपियों या स्वाँगियों की तरह बर्ताव करने की मजबूरी रहती है। समझदारों को आँखें और हाव-भाव देख कर ही पता चल जाता है कि या तो कहीं खोये हुए हैं या शून्य में हैं।

तन-मन और मस्तिष्क का हल्कापन निर्भर करता है आदमी के धर्म, सत्य, पुण्य और शुचिता की ऊर्जा पर। यह जिसमें जितनी अधिक होगी, उतना वह इंसान खुद को फूल या रूई की तरह हल्का महसूस करेगा चाहे वह शरीर से कितना ही स्थूल क्यों न हो।

ऎसे लोगों के शरीर के तमाम चक्रों में ऊर्जा का बल होता है और खुद को हल्का किन्तु ऊर्जा और प्राणशक्ति से भरपूर महसूस करते हैं। ज्यों-ज्यों इस दैवीय और दिव्य ऊर्जा में कमी आती जाती है इंसान अपने आपको भारी से भारी महसूस करने लग जाता है और यही भारीपन हमेशा के लिए तब स्थायी भाव को प्राप्त कर लिया करता है जब पुण्य की पूर्ण समाप्ति हो जाती है, पापों का उदय हो जाता है तथा पुण्य संचय या प्राप्ति की कोई संभावना शेष नहीं रहती।

जिस समय हमें अपना दिल-दिमाग और शरीर बिना किसी कारण के भारी-भारी लगने लगे, किसी अच्छे और सात्ति्वक काम में कोई रुचि नहीं रहे, अपनी ड्यूटी, कारोबार और रोजमर्रा की जिन्दगी के कर्म में अरुचि का आभास होना शुरू हो जाए, तब यह निश्चित मान लें कि हमारे सारे के सारे पुण्यों का क्षय हो चुका है और इस स्थिति में हमारी आकस्मिक मृत्यु हो जाए तो या तो नरक का सौभाग्य प्राप्त होने वाला है अथवा अधोगति की सारी संभावनाएं आकार ले चुकी हैं। कम से कम ऎसे मनुष्य दुबारा इंसानी जिस्म प्राप्त नहीं कर सकते, इस बात की गारंटी है। 

इस तरह के बहुत से पापोदयी लोग कालान्तर में किसी मानसिक या शारीरिक बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं और इनकी सेवा-सुश्रुषा करने वाला भी कोई इनके साथ नहीं रहता। इन लोगों को अपने पापों को भोगने के लिए नितान्त एकाकीपन में समय गुजारने की मजबूरी रहती है।

बहुत से लोग देखे जाते हैं जो चाहे जाने किसी अनजाने एकाध पुण्य की बदौलत कहीं किसी भी उच्च पद, प्रतिष्ठा और वैभव वाले स्थान को पा जाते हैं परन्तु इनमें स्व कर्म के प्रति कोई रुचि शेष नहीं रह जाती है। न इनकी कहीं जाने की इच्छा होती है, न आने की। बल्कि अपनी तरह के चंद पुण्यहीन, व्यभिचारी, संस्कारहीन और पापी लोगों के साथ ही समय गुजारने में इन्हें सर्वाधिक आनंद आता है।

इन्हें अपने निर्धारित कर्म को करने में न कोई रुचि होती है, न आनंद आता है बल्कि ये सब कर्म और फर्ज को भार समझ कर ही करते हैं। इस अवस्था में आने के बाद ये लोग बिना कोई हाथ-पाँव हिलाए बैठे-बैठे खाना और जमा करते रहना चाहते हैं।

ऎसे लोगों की यह दशा इसलिए होती है कि अपवित्रता, झूठ और झूठन के सहारे पलने की आदत, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, पराया खान-पान, बिना मेहनत के कमाई का भूत और अधर्माचरण इनके संगी साथी हो जाते हैं।

और यह स्थिति आने पर इनके शरीर से धर्म और सत्य पलायन कर जाते हैं। यही नहीं ये अपने साथ सारे सदाचारों और संस्कारों को लेकर बाहर निकल जाते हैं और तब शरीर की स्थिति पाप की बहुत बड़ी गठरी से ज्यादा नहीं मानी जा सकती है।

अधिकांश लोगों की उत्साहहीनता का मूल कारण धर्म का अलग हो जाना, पुण्यों की पूर्ण समाप्ति और पापों का उदय होना है। हर उत्साहहीन इंसान पाप का घनीभूत पुंज होकर रह जाता है। यह पाप उसके वर्तमान के ही नहीं होते बल्कि इनमें पूर्व जन्मों से चले आ रहे पापों का भी बहुत बड़ा हिस्सा होता है।

इन उत्साहहीन लोगों का साथ, किसी भी प्रकार का सम्पर्क और संसर्ग, इनके साथ खान-पान और व्यवहार सब कुछ त्याज्य है अन्यथा इनके पापों के कारण से दोष का भागी होना पड़ता है, और इस दोष का कोई प्रायश्चित नहीं है।

इन उत्साहहीनों से दूरी बनाए रखें और इन लोगों को पूरी तरह छोड़ दें अपने पाप कर्मों को भुगतने के लिए। यही इन पर उपकार होगा अन्यथा ये समाज में रहकर प्रदूषण फैलाएंगे। उत्साह हीन लोग कर्महीन होते हैं, हर काम को टालते हैं, हर बात को हवा में उड़ाते हैं और ऎसे लोग न समाज के काम के होते हैं, न देश के। मृत्यु लोक पर सर्वाधिक भार इन्हीं लोगाेंं का है जिसके कारण से धरती माँ  खुद भी दुःखी है।

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