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बाल कविताएँ / संजीव ठाकुर

आठ बाल गीत

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मुँह तो धो लो

बैंड बजाता आया है
वो देखो बाराती
दूल्हे को लेकर आया है
आगे –आगे हाथी

अब तो माला फेरन होगा
आएंगे सौगाती
खाना –पीना दंगल होगा
मुँह तो धो लो साथी !

पापा क्यों पढ़ते अखबार

रोज –रोज अखबार कहाँ से
लाते रहते पापाजी 
गली –मुहल्ले की खबरें
पढ़ते रहते पापाजी

मार –काट की खबर हमेशा
पढ़ते रहते पापाजी
बेकारों की बात हमेशा
पढ़ते रहते पापाजी

ट्रेन उलटने की खबरें
काहे पढ़ते पापाजी
रहते इसमें किस्से अच्छे
तो पढ़ लेते पापाजी

रंग –बिरंगी बुक्स हैं मेरी
उन्हें न पढ़ते पापाजी 
ये काले अखबार रोज क्यों
पढ़ते रहते पापाजी

तुम कैसे मामा ?

तुमको कैसे कह दूँ चंदा
मैं अपना मामा ?
देहरादून में रहते हैं जो
हैं मेरे मामा !

तुम न तो मम्मी के भाई
न नानी के बेटे
देखा करते हैं हम तुमको
छत पर लेटे-लेटे।

इससे क्या कि सुंदर हो तुम
हँसते रहते खिल –खिल
मेरे मामा भी प्यारे हैं
जैसे तारे झिल –मिल

अगर कभी टॉफी की बारिश
कर दो तो जानूँ ,
बस आकाश में घूमा करते
कैसे पहचानूँ ?

कभी उठाओ गोद में जैसे
लेते हैं मामा ,
तुम तो बिलकुल हाथ न आते
फिर कैसे मामा ?

पापाजी की बुक

पापाजी की आई बुक
कितनी अच्छी इसकी लुक ,
देखो संज्ञा ,देखो स्वप्निल
कविताओं की है यह बुक !

इसमें हैं कविताएँ तीस
पढ़ो ,गुनो और याद करो ,
विद्यालय में काम ये आए
है यह बहुत जरूरी बुक !

तोते ,कौए ,चिड़िए की
इसमें है एक कहानी ,
तुम्हें मिलेगी इस बुक में
पारियों की इक नानी !

मजेदार कविताओं की
इसमें है भरमार ,
आओ संज्ञा ,आओ स्वप्निल
इसे पढ़ो न यार !

सड़क –सड़क ,ओ सड़क –सड़क

सड़क-सड़क, ओ सड़क –सड़क
इतनी जल्दी गईं तड़क ?
अभी –अभी तो मजदूरों ने
मिलकर तुम्हें बनाया था ,
कंकरीट और कोलतार को
तुम पर खूब बिछाया था,
आँधी और पानी से लड़ने
को तैयार कराया था,
बादल की सेना को देख
काहे को तुम गईं भड़क ?

सड़क-सड़क, ओ सड़क –सड़क
इतनी जल्दी गईं तड़क ?
या लगता है भारी ढोना
बस और ट्रक के रेलों को,
जीप, कार, मोटरसाइकल
और मनुष्य के मेलों को ?
बंदर, भालू, हाथी, घोड़ों
के मनचाहे खेलों को,
मजबूरी है चलना तुम पर
कहे को तुम रहीं फड़क ?

सड़क-सड़क, ओ सड़क –सड़क
इतनी जल्दी गईं तड़क ?

चलो घूमने

चलो घूमने अक्षरधाम,
आज नहीं है कोई काम।
बैग, मोबाइल रख बाहर,
चलो, चलें, जल्दी अंदर।

यह मंदिर है बहूत विशाल,
लगे हैं इसमें पत्थर लाल।
तरह-तरह की चीज़ें इसमें,
किसे मैं देखूँ उलझूँ किसमें ?

कितना सुंदर यह फव्वारा,
मंत्र उचारे तारा-रारा।
सोने के ये हैं भगवान,
मम्मी! इनको दो कुछ दान।

हम तो घूम के आ गए,
मस्ती कर के आ गए!
तुम्हें भी जाना हो तो जाओ,
वहाँ की खिचड़ी चखकर आओ!


काहे को चिल्लाई मम्मी

आज समय से आई मम्मी
चिप्स कुरकुरे  लाई मम्मी
झटक लिए भैया ने सारे
उनको डांट पिलाई मम्मी !

पापा भी तो जल्दी आए
लेकिन वो तो कुछ न लाए 
होमवर्क की बात पूछकर
हम दोनों  पर वो गुस्साए !

महरी आज देर से आई
साथ में अपनी बेटी लाई
उसके साथ मैं खेल रही थी
मम्मी काहे को चिल्लाई ?

हो जाओगी अच्छी

सुबू उठो ,थोड़ा सा पी लो दूध और बतियाओ
मन हो तो थोड़ा फल ले लो ,ब्रैड नहीं तो खाओ !

बीमारी में तो होती ही है सबको परेशानी
अच्छा है दो तीन दिनों तक करोगी न शैतानी ।

कड़वी दवा पसंद नहीं है ?बोलो सच्ची –सच्ची
मीठी गोली खाकर ही तुम हो जाओगी अच्छी ।

फिर जाना स्कूल ,पार्क ,जहां हो तेरी मर्जी
मैं लिख दूँगी ,तुम दे आना ,मैडम जी को अर्जी !
बीच –बीच में मन हो तो तुम टीवी कहीं लगाना
कार्टून नेटवर्क वाला चैनल आता कहाँ बताना ?
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