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चीनी कहानी / साबुन की टिकिया / लू सुन

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कहानी लू सुन साबुन की टिकिया अनुवाद  -  शिवदान सिंह चौहान, विजय चौहान   श्रीमती -किंग कमरे की उत्तर वाली खिड़की की ओर पीठ करके, सूरज की...

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कहानी

लू सुन

साबुन की टिकिया

अनुवाद  -  शिवदान सिंह चौहान, विजय चौहान

 

श्रीमती -किंग कमरे की उत्तर वाली खिड़की की ओर पीठ करके, सूरज की अन्तिम किरणों की रोशनी में पितर-पूजा में जलाने के लिए कागज के नोटों की तह कर रही थीं । उसकी आठ वर्ष की लड़की एलिगैंस ( शोभा) भी उसका हाथ बंटा रही थी । इसी समय मोटे कपड़े के तले वाले वृत्तों की फदफद सुनाई दी । और वह जान गई कि सू-मिंग घर आ गया है । वह सर झुकाकर पूर्ववत् काम में जुटी रही ।. उसके पति के भद्दे बूतों की फदफद ऊंची होती गई और वह उसके सिरहाने आ खड़ा हुआ । जब उसने कनखियों से देखा कि वह पीछे की ओर झुका हुआ अपनी काली फतूही के नीचे पहने लम्बे चोरों की जेब में से कुछ निकालने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है, तो उसे विवश होकर अपना सर उठाना पड़ा ।

भरसक कोशिश के बाद कहीं वह सफल हुआ । उसके हाथ में ताजे हरे रंग की एक तिरछी सी चीज थी जो उसने पत्नी को थमा दी । उसे हाथ में लेने की देर थी कि मन्द और मधुर सुगन्ध से कमरा महक उठा । फीके पीले ढक्कन पर एक सुनहरी मोहर थी जिस पर विदेशी. भाषा के अक्षरों में एक सुन्दर नमूना बना हुआ था ।

एलिगैंस फौरन बण्डल की ओर झपटी, लेकिन उसकी माँ ने उसे एक ओर धकेल दिया । ' 'आज बाहर गये थे?'' पार्सल को ध्यान से देखते हुए उसने पति से पूछा ।

''देखो, देखो! पति ने पार्सल पर अपनी आँखें गड़ाते हुए आग्रह किया ।

कोंपल जैसे हरे रंग के काग़ज को ध्यान से खोलने पर भीतर की ओर एक पतला फीका हरा काग़ज दिखाई दिया, जो रोशनी में देखने से फीका पीला लगता था. । इस काग़ज के भीतर वह चीज थी --एक सख्त, नर्म, लचीला, टुकड़ा जिस पर हरे रंग की लकीरें थीं । इसी में से सुगन्धि आ रही थी ।

''सचमुच ही यह अच्छा साबुन है--'' श्रीमती सू-मिंग नें उस कीमती उपहार को बच्चे की तरह उठा कर नाक से लगाते हुए कहा ।

''सचमुच'' पति ने हामी भरी, ''तुम्हारे इस्तमाल के लिये अच्छा है ।'' उसने देखा कि बोलते समय पति की नजरें उसकी गर्दन पर झुकी हुई थीं । शर्म के मारे उसके गाल तमतमा गये । कुछ रोज पहले उसे लगा था कि उसकी गर्दन और कानों के पीछे मैल की पपड़ी जम गई है, लेकिन इस ओर उसने विशेष ध्यान नहीं दिया । पीले सुगन्धित विदेशी साबुन की टिकिया पति की दृष्टि की गवाही दे रही थी । वह बरबस लज्जित हो गई । उसने रात को खाना खाने के बाद उस साबुन की टिकिया से रगड़-रगड़ कर नहाने का फैसला किया ।

''कई स्थान तो रीठे (एक विशेष प्रकार के वृक्ष पर उगने वाली काले रंग की फली, जिसे उबाल कर साबुन बनता है ।-विदेशी साबुन के आने से पहले चीनी लोग इसी का प्रयोग करतें थे - अनुवादक) से बिल्कुल ही साफ नहीं होते ।'' उसने मन ही मन स्वीकार किया ।

इसी समय एलिस ने चिल्ला कर उसके विचारों में खलल डाल दिया, माँ मुझे साबुन पर लिपटा कागज चाहिए ।'' अब बीकन (इंगित) जिसका नाम इसलिये चुना गया था कि उसके इशारे पर एक भाई भी उनके घर में आये, भी खेलकूद छोड्‌कर वहाँ आ धमकी । लेकिन माँ ने धक्का देकर उन्हें दूर हटा दिया और साबुन को कागज में. लपेट कर नल के ऊपर की अलमारी के सबसे ऊँचे खाने में रख दिया । यह सोचकर कि अब साबुन बच्चों की पहुंच से परे है, वह बेफिक्री से पुन: अपने काम में जुट गई ।

उसके पति ने अचानक आवाज दी, स्वे-चेंग !'' और वह चौंक गई । वह ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर उसके सामने ही बैठा था ।

उसे समझ में न आया कि इस समय पति को लड़के से क्या' काम हो सकता है । लेकिन आज उसका मन कृतज्ञता से भरा था । उसने भी पति के स्वर में स्वर मिला कर आवाज दी, स्वे-चेंग !''

यहाँ तक कि उसने अपना काम भी पटक दिया और लड़के की आहट की प्रतीक्षा करने लगी । पति की ओर क्षमाप्रार्थी की- तरह देखते हुए उसने चीखना-चिल्लाना जारी रखा ।

चुआन-ऐर !'' आखिर तँग आकर आवाज दी, वह अक्सर गुस्से के मौके पर बेटे को इस नाम से पुकारती थी । उसके तेज गले का फौरन असर हुआ जूतों की तेज चरमराहट सुनाई दी और चुआन-ऐर भागता हुआ पहुँचा । वह एक छोटी वास्कट पहने था और उसका चेहरा पसीने में तर था ।

''क्या कर रहे थे? पिता के आवाज देने पर क्यों नहीं आये ?'' उसने झिड़कते हुए पूछा ।

''मैं कसरत कर रहा था'' उसने सू-मिंग की कुर्सी के पास फुदकते हुए जवाब दिया । फिर सीधे खड़ा होकर वह प्रश्नसूचक दृष्टि से पिता का मुँह ताकने लगा ।

स्वे-चेंग'' पिता ने गम्भीरता से कहा, ''जरा बताओ कि एर-दू-फू' का क्या अर्थ है ?''

एर-दू-फू ?'' अर्थात् ''लड़ाकी औरत ?''

''अक्ल का कोल्हू! बकवादी !'' सू-मिंग का पारा चढ़ गया ''क्या मैं औरत हूँ ?''

स्वे-चेंग चौंक कर कुछ कदम पीछे हट गया, लेकिन फिर बाहों को सीधा तान कर खड़ा हो गया । हालाँकि उसका ख्याल था कि उसके पिता की चाल थियेटर के नटों कीं-सी है, लेकिन वह औरतों से मिलता-जुलता है, इसकी उसने कल्पना भी न की थी । वह अपनी गलती मानने को तैयार था ।

''क्या मुझे यह सीखने की जरूरत है कि एर-दू-फू' का अर्थ 'लड़ाकी औरत' है क्या में अपनी मातृ-भाषा नहीं जानता? लेकिन यह शब्द चीनी भाषा का नहीं-विदेशी शैतानों का है । समझे? अब बताओ इसका अर्थ क्या है मालूम है ?''

''मैं-मुझे नहीं मालूम, स्वे-चेंग ने धबरा कर कहा ।

''वाह! स्कूल जाकर इतना भी नहीं सीखा? मेरा सारा पैसा बर्बाद हुआ । जिस लड़के से मैंने यह शब्द सुना था, वह तुमसे छोटा था, केवल चौदह या पन्द्रह वर्ष का । और तुम हो कि उसका अर्थ तक नहीं जानते । उस पर यह गुस्ताखी कि मेरे सामने कह रहे हो, ''मुझे नहीं मासूम! '' फौरन किताब में से देखकर मुझे बताओ ।''

स्वे-चेंग ने कहा, ''जी अच्छा'' और आदरपूर्वक वहाँ से चला गया ।

''विद्यार्थियों की हालत देखकर दया आती है ।'' सू-मिंग ने सोचा । ''सम्राट् कुआंग सी के जमाने में मैं नये किस्म के स्कूल खोलने के पक्ष में था मुझे क्या पता था कि उसके परिणाम बुरे होंगे? 'मुक्ति' और 'आजादी' आदि शब्दों का क्या अर्थ है? ठोस शिक्षा के स्थान पर केवल विदेशी नकल का बोलबाला है । इस स्वे-चेंग को ही देखो । मैंने व्यर्थ ही इस पर .कितना पैसा बर्बाद किया है? बड़ी आशाओं को लेकर विदेशी स्कूल में पढ़ाया-उसका क्या फल निकला? पूरा साल झख मारने के बाद उसे एर-दू-फू' तक का अर्थ नहीं आता! आखिर यह स्कूल हैं किस मर्ज की दवा? इन्हें फौरन बन्द कर देना चाहिए ।''

''ठीक कहते हो-सब स्कूलों में ताला डाल देना चाहिये ।'' श्रीमती सू-मिंग ने काम जारी रखते हुए धैर्यपूर्वक पति का अनुमोदन किया ।

एलिगैंस और इंगित को भी स्कूल भेजना बेकार है! जब नवें ताऊ कहा करते थे, ''तुम लड़कियों को किसलिए लिखाना-पढ़ाना चाहते हो ?'' तो मैं उनसे इस बात पर झगड़ता था-लेकिन अब ऐसा लगता है कि उनकी बात सही थी । आजकल की छोकरियाँ धूल के बादलों की तरह सड़कों पर मँडराती रहती हैं, कितनी शर्म की बात है? और अब बाल कटवाने की नौबत भी आ गई । मुझे बालकटी पढ़ने वाली लड़कियों से सख्त नफरत है । लोग तो लुटेरों और सैनिकों से नफरत करते हैं, लेकिन ये छोकरियाँ तो उन सब से गयी-बीती हैं । इनका इलाज होना जरूरी है ।''

''ठीक कहते हो ।'' श्रीमती सू-मिंग ने हामी भरी । जब मर्द ही भिक्षुओं की तरह सर मुँडवा कर घूमने लगे, तो औरतों ने भी भिक्षुणियों की तरह बाल कटवा कर रही-सही कसर पूरी कर दी ।''

यकायक पति को उस शब्द का ख्याल आया, जो इतनी देर से उसे सता रहा था । उसने फिर आवाज दी, स्वे-चेंग ।'' स्वर में आदेश भरा था ।

लड़का एक मोटा-सा अंग्रेजी-चीनी शब्दकोश हाथ में लिए जल्दी से कमरे में दाखिल हुआ । उसकी जिल्द की पीठ पर सुनहरी अक्षरों मैं कुछ छपा हुआ था ।

सू-मिंग को दिखाते हुए लड़के ने कहा, ''शायद यही वह शब्द है । मुझे आश्चर्य......।''

सू-मिंग ने किताब हाथ में लेकर नजर दौड़ाई, लेकिन अक्षर बहुत बारीक थे और चीनी ढंग के स्थान पर विदेशी ढंग से बायीं ओर से दायीं ओर को लिखे हुए थे । पहले तो उसके पल्ले कुछ न पड़ा । फिर खिड़की की रोशनी में टकटकी लगाकर देखने से वह चीनी भाषा में दिया हुआ अर्थ पढ़ने में सफल हुआ । ''अट्ठारहवीं शताब्दी में बनायी गयी एक गुप्त संस्था ।''

''यह गलत है'' उसने शिकायत की । ''मगर इसका सही उच्चारण कैसे करते हैं ?'' उसने विदेशी शब्द को इशारे से दिखाते हुए पूछा ।

बेटे ने नम्रता से उत्तर दिया, औड फैलोस'' ( विचित्र लोग) और चीनी उच्चारण को ठीक एर-दू-फू' जैसा बनाने की कोशिश की ।

नहीं', नहीं-यह गलत है ।'' सू-मिंग ने गुस्से से कहा, में तुम्हें बता रहा हूँ कि इस शब्द का अर्थ बुरा है । यह एक गाली है, जो मेरे जैसे व्यक्ति को निकाली जा सकती है । समझे? जाकर इसका ठीक अर्थ ढूंढो ।

स्वे-चेंग ने परेशान होकर आँखें ऊपर उठाई, लेकिन वहीं पर खड़ा रहा ।

''यह सब क्या हंगामा है ?'' माँ ने इस बार बेटे की तरफदारी की । लड़के को व्यर्थ ही परेशान करते हो । खुद ही सब कुछ बता दो न !'' उसने पति की ओर असन्तोष-भरी दृष्टि से देखा । वह दोनों में किसी तरह सुलह कराना चाहती थी ।

''बात यों हुई,'' सूमिंग कुछ नरमी से पत्नी की ओर झुका, ''कि जब मैं साबुन की टिकिया खरीदने गया तो दुकान पर तीन विद्यार्थी भी खड़े थे । उनके विचार में शायद मैं बहुत मीनमेख निकाल रहा था । मैंने पहले चालीस सिक्कों के दाम वाली आधी दर्जन टिकियां देख डालीं । फिर ग्यारह सिक्कों वाली टिकियों को देखा । वे रद्दी किस्म की थीं । इसलिये मैंने बीच के मेल की टिकिया खरीदने का फैसला किया और चौबीस सिक्कों वाली को पसन्द किया । तुम्हें मासूम है कि बड़ी दुकानों पर काम करने वाले छोकरे कितने अकड़बाज होते है! उनकी आँखें तो आसमान पर चढ़ी रहती हैं-जमीन पर टिकती ही नहीं । जिस छोकरे ने मुझे चीजें दिखाई वह अपनी कुत्ते की सी थूथनी फुला कर अपनी उपेक्षा दिखा रहा था । और वे कमजात विद्यार्थी एक दूसरे की ओर कनखियों से देख कर शैतानी भाषा में मेरी हँसी उड़ा रहे थे । फिर जब मैंने काग़ज खोल कर अन्दर से टिकिया को देखने का आग्रह किया तो दुकान के छोकरे ने बड़ी ऊटपटाँग बातें कीं और उन बन्दर जैसे विद्यार्थियों की खी-खी बन्द ही न होने में आती थी । भला सोचो तो, बिना जाँचे-देखे मैं कैसे मान लेता कि साबुन सचमुच बढ़िया है सबसे छोटे विद्यार्थी ने मेरी ओर देख कर यह शब्द कहा था-और सब के सब दाँत निपोरने लगे । अब अनुमान लगाओ कि वह शब्द कितना बुरा होगा? स्वे-चेंग, तुम इस शब्द को गालियों की सूची में ढूँढो ।''

स्वे-चेंग ''जी अच्छा ।'' कह कर वहाँ से चला गया ।

उसके जाने के बाद सू-मिंग ने पत्नी से अपनी शिकायतें जारी रखी । ''यह नई तहजीब सब ढकोसला है । क्या कहते हैं नई तहजीब के !'' उसने आँखें फाड़ कर छत की ओर देखते हुए कहा । ''विद्यार्थी लोग बिगड़ गए हैं । समाज की धज्जियाँ उड़ गयी हैं । अगर उसका कोई इलाज. न हुआ तो चीन का सत्यानाश हो जायेगा । तबाही आ जाएगी! कितने दुःख की बात है !''

''इसमें दुख की क्या बात है ?'' पत्नी ने अन्यमनस्यकता से पूछा । ''जिस ओर नजर डालो, कलेजा फटता है खास तौर पर नयी पीढ़ी के रँग ढँग देख कर । माता-पिता का आज्ञापालन, जो चीनी जाति का महान गुण था, गायब होता जा रहा है । खुशकिस्मती से आज सवेरे मुझे एक आज्ञाकारिणी मालिन दीख पड़ी । सड़क पर दो भिखारिनें जा रहीं थीं । उनमें से एक करीब सत्रह-अट्ठारह वर्ष की होगी । इतनी सयानी लड़की को भीख माँगना उचित नहीं-पर बेचारी अपनी अन्धी दादी की सहायता कर रही थी । दोनों भीख माँगती-माँगती कपड़े की दुकान के नीचे की नाली तक जा पहुँचीं । हर कोई कहता था कि लड़की बड़ी सुशील है । जो भी मिलता, दादी को खिला देती और खुद भूखी रहती । लेकिन क्या इस सड़े-गले समाज में लोग उसकी सुशीलता पर तरस खाते हैं ?'' सू-मिंग ने पत्नी के चेहरे पर नजर गड़ा कर सवाल पूछा, मानो वह उसकी समझदारी की परीक्षा ले रहा हो ।

वह गुमसुम प्रश्नसूचक दृष्टि से पति की ओर देखने लगी मानो कह रही हो ''तुम्हीं बतादो न !''

बित्कुल नहीं ।'' सू-मिंग आखिर अपने सवाल का जवाब देने पर विवश हुआ । '' इतनी देर तक, मेरी आखों के सामने सिर्फ एक आदमी ने उसकी झोली में ताँबे का एक सिक्का फेंका । दर्जनों लोग खड़े तमाशा देखते रहे । दो बेहया छोकरे लड़की के बारे में बातें कह रहे थे । एक ने कहा, 'इसकी मैल देख कर क्यों नाक-भौं सिकोड़ते हो? अगर दो टिकिया साबुन से इसे रगड़ कर नहला दो तो यह बड़ी मजेदार निकल आएगी ।' मैं पूछता हूँ कि यह कैसी बातचीत है ?''

श्रीमती सू-मिंग का सर झुक गया था । काफ़ी देर सुस्ताने. के बाद उसने पूछा, ''क्या तुमने उसे कुछ दिया ?''

. ''मैंने? नहीं । भला किस मुँह से उसे एक या दो सिक्के देता? वह ऐसी-वैसी भिखारिन तो थी नहीं ।''

उसकी बात अधूरी ही थी कि उसकी पत्नी नाक साफ करती हुई उठी और शाम का खाना पकाने के लिये रसोई की ओर चल? दी । अन्धेरा बढ़ गया था और खाने का समय नजदीक आ गया था ।

सू-मिंग भी उठ कर आँगन में आ गया जहाँ कमरे की अपेक्षा अभी अधिक प्रकाश था । स्वे-चेंग दीवार के सहारे कसरत करने. में मग्न था । पिता की आज्ञा थी कि संध्या के समय ही वह अभ्यास करे । बेटे को देख कर सू-मिंग ने तेजी से सर हिलाया और दोनों हाथों को पीछे की ओर कर के इधर-उधर टहलने लगा । शीघ्र ही आंगन में पड़ा एकमात्र सदाबहार के फूलों का गमला भी सांग के झुट-पुटे में अदृष्य हो गया । रुई के फोहों की तरह छितरे बादलों में से तारे झिलमिलाने लगे और निशा का' आगमन हुआ । सू-मिंग परेशानी से उत्तेजित हो उठा । उसे लगा कि जैसे वह कोई बड़ा काम करने जा रहा है । वह भ्रष्ट विद्यार्थियों और समूचे सड़े-गले समाज के विरुद्ध जिहाद करेगा । उसकी आकांक्षा, तमाम वीर तथा संकटग्रस्त आत्माओं को मुक्ति प्रदान करने की -थी ।

उसके कदम तेज होते गये और पुराने ढँग के कपड़े के जूतों की कर्कश आवाज से बाड़े में बन्द मुर्गियां और वृक्षों में खलबली मच गई और वे चौंक कर चीखने चिल्लाने लगे ।

खाना खाने का समय आ पहुंचा था । कमरे में जलता लैम्प पूरे परिवार को खाने के लिए आमन्त्रित कर रहा' था । थोड़ी देर वाद ही सब लोग खाने की चौकोर मेज के गिर्द अपनी सलाईयों से कटोरियों को खटखटाने लगे । गर्म करमकल्ले के शोरबे में से भाप निकल रही थी और सू-मिंग मन्दिर की अधिष्ठात्री देवी की तरह सभापति के आसन पर बैठा था ।

खाने के बीच में कोई न कोई दुर्धटना अवश्य हो जाती । आज इंगित ने अपनी कटोरी लुड़का दी. । सारा शोरबा मेज पर फैल गया । सू-मिंग ने उसे कठोर दृष्टि से देखा, लड़की सहम गई और रोने लगी । इस गड़बड़. में गोभी की डण्ठल जो सू-मिंग को बहुत पसन्द थी-कहीं गिर पड़ी थी । उसे ढूँढने के लिए जब उसने तीलियाँ आगे बढ़ाई तो देखा कि स्वे-चिंग उसे अपने मुँह में ठूँस रहा है । जब उसे पुराना पत्ता खाकर ही सन्तोष करना पड़ा तो उसका गुस्सा और भी भड़क उठा ।

' स्वे-चेंग' ' उसने लड़के की ओर कठोर मुद्रा से देखते हुए पूछा, ''क्या तुमने उस शब्द का अर्थ ढूँढ लिया?''

''किस शब्द का?..... .जी, अभी नहीं । ''

''देखा । न तो तुम कुछ सीख पाये, न तुम्हें रत्ती भर शऊर आया । सिर्फ भर-पेट खाना जानते हो । काश तुम उस आज्ञाकारिणी लड़की का आदर्श सामने रख सकते । भिखारिन होते हुए भी वह अपनी दादी की आज्ञा का पालन करती थी-खुद भूखी रह कर भी दादी को खिलाती थी । तुम विद्यार्थी पितृ-भक्ति की महिमा को क्या जानो? बेहया, कमजात. तुम भी उन छोकरों जैसे बनोगे, जिनकी बातें मैंने सुनी थीं । '' इसी समय स्वे-चेंग ने हिचकिचाते हुए पिता की बात काटी, ' 'एक शब्द है-पता नहीं शायद वही हो । मेरे ख्याल में उन्होंने 'ओल्ड फूल'..... .।

?''

''ठीक है । कुछ ऐसा ही शब्द था । इसका अर्थ क्या है”

''मैं-मैं ठीक नहीं जानता ।''

''क्या बकते हो? तुग जानबूझ कर नहीं बता रहे । तुम सब के सब विद्यार्थी हरामी हो ।''

उसकी पत्नी ने आखिर प्रतिरोध- किया । ''तुम्हें आज क्या भूत सवार है? चैन से खाना तो दूर रहा, इस तरह चिल्ला रहे हो जैसे पड़ौसियों के कुत्तों या मुर्गों का पीछा करते हैं । आखिर बच्चे, बच्चे ' ही हैं ।

''क्या ?'' सू-मिंग और बिगड़ता, लेकिन जब उसने देखा कि पत्नी ने रूठ कर मुँह फुला लिया है और उसके माथे की त्यौरियाँ चढ़ी हुई हैं तो उसने- चट अपनी आवाज बदल कर सुलह के स्वर में कहा, मेरे ऊपर कोई भूत सवार नहीं । मैं तो सिर्फ स्वे-चेंग को अक्ल की बातें बता रहा था ।

''बेचारा लड़का क्या जाने कि तुम्हारे दिमाग में क्या भरा है पत्नी में तैश में आ कर कहा । ''अगर वह समझ-दार होता तो कभी का उस आज्ञाकारिणी लड़की को यहाँ ले आता । सीधी-सादी बात है, एक टिकिया साबुन उसे दे आये हो । बस दूसरी टिकिया की कसर बाकी रह गई ।''

''यह तुम क्या कह रही हो ?'' उसने हैरानी से कहा ।. ''वे तो उन छोकरों के शब्द थे ।''

''मुझे इसमें शक है । बस झटपट दूसरी टिकिया खरीदकर उसे रगड़-रगड़ कर नहलवा दो । फिर वेदी पर सजाकर पूजा करना-चारों ओर सुख-शान्ति की वर्षा होने लगेगी ।''

''आखिर तुम्हारी मंशा क्या है इस बात से साबुन का क्या सम्बन्ध? मुझे याद आया कि तुम्हें साबुन की जरूरत है और. ..... ।''

''वाह! साबुन का बड़ा गहरा सम्बन्ध है । तुमने यह टिकिया उस आज्ञाकारिणी लड़की के लिये खरीदी थी । जाकर उसे नहलाओ-घुलाओ मुझे इसकी जरूरत नहीं । न मैं इस काबिल ही हूँ । इसके अलावा, मैं उस लड़की की एहसाननन्द नहीं होना चाहती ।''

''हाय री औरत-जात !'' सू-मिंग नें गुस्से में तंग आकर कहा । फिर वह चुप हो गया । उसकी समझ में न आया कि आगे क्या कहे । उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रहीं थीं, जैसी स्वे-चेंग के माथे पर कसरत के बाद चमका करती थी ।

''अभी औरतों के बारे में क्या कह रहे थे? हम औरतें, तुम जैसे मर्दों से लाख दर्जे अच्छी हैं । तुम लोग जब पढ़ने वाली छोकरियों की निन्दा करते हो, तो अट्टारह-बीस वर्ष की जवान भिखारिनों की तारीफ करते समय तुम्हारी नीयत कभी साफ नहीं होती । मेरी तरफ से जा कर उसे रगड़-रगड़ कर नहलाओ । लानत है मर्दों की बात पर ।''

यह बताना मुश्किल है कि श्रीमती सू-मिंगका यह प्रलाप और कितनी देर तक जारी रहता। सौभाग्य से इसी समय एक मेहमान आ टपका और पतिदेव उससे मिलने के लिए दूसरे कमरे में चले गये ।

लौटने पर सू-मिंग ने देखा कि एलिस और इंगित खाने की मेज के नीचे फर्श पर बैठी खेल रही थीं । स्वे-चेंग मेज पर बैठा शब्दकोश से माथापच्ची कर रहा था; उसकी पत्नी लैम्प से दूर एक कोने में' ऊँची कुर्सी पर बैठी अनमने भाव से कुछ देख रही थी ।

उसके रंग-ढंग को देख कर सू-मिंग को कुछ बोलने- का साहस न हुआ ।

बहुत आनाकानी करने बन बाद भी दूसरे दिन तड़के-तड़के ही श्रीमती सू-मिंग ने साबुन का सदुपयोग किया । आँखें खोलते__ही सू-मिंग को पत्नी के दर्शन हुए । वह नल के आगे झुकी हुई थी, और रगड़-रगड़ कर अपनी गर्दन धो रही थी । उसके कानों पर साबुन की झाग जमी थी । और असंख्य कंकड़ों जैसे बुदबुदे उठ रहे थे ।

उस दिन से श्रीमती सू-मिंग खुशबूदार साबुन की एक टिकिया हमेशा अपने पास रखतीं । साबुन ने अपना चमत्कार दिखा दिया था । काश! सू-मिंग के मन में लगे कन्फूशियस के नीति-दर्शन के जाल भी साबुन से साफ हो सकते!

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(साभार - डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया)

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3864,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2811,कहानी,2136,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,489,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,862,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: चीनी कहानी / साबुन की टिकिया / लू सुन
चीनी कहानी / साबुन की टिकिया / लू सुन
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रचनाकार
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