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पिता का प्यार दौलत से नहीं तौला जा सकता / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

जून का तीसरा रविवार पिता दिवस पर विशेष

पिता का प्यार दौलत से नहीं तौला जा सकता

० बच्चों के भविष्य का कुशल मार्गदर्शक होता है पिता

अपने जीवन की कठिन डगर पर चलते हुए अनुभव के ईंट-गारे से तैयार आशियाने को गढऩे वाले पिता का साथ ही बच्चों एवं पत्नी के लिए बड़ा सहारा होता है। पिता का साया अथवा उनका संबल परिजनों को जो ऊर्जा प्रदान करता है, उसकी शक्ति और ताकत के बल पर बच्चे हर कठिनाई पर विजयी पताका फहराने में सफलता प्राप्त कर सकते है। स्पष्ट रूप से यह माना जा सकता है कि सारे रिश्तों में पिता ही वह स्तंभ है, जो न केवल परिवार को संभाले होता है, बल्कि विचलित मन और जीवन में उठने वाली कठिन भंवर में फंसी नैय्या को एक कुशल नाविक की तरह उबारने का आसान काम भी कर दिखाता है। हर विपरीत परिस्थिति में बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाते हुए एक पिता ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर ने उसे बैशाखी के रूप में अपने बच्चों के मजबूत सहारे के लिए धरती पर भेजा हो। जीवन की उन राहों पर जब बच्चा उचित निर्णय न ले पाने की स्थिति में होता है, तो यही पिता उसे भविष्य का लक्ष्य बताते हुए बढ़ चलने का हौसला प्रदान करता है। एक बड़ी शक्ति के रूप में पिता का सहारा बच्चे की हिम्मत बन जाता है और यही मासूम बच्चा एक अच्छे दिशा निर्देश का पालन करते हुए अपनी मंजिल पा लेता है। वर्तमान और भविष्य को अपनी अनुभवी नजरों से बखूबी दृश्यांकित करने वाला कुशल चितेरा वही पिता अपने बच्चों के जीवन की खुशियां गढ़ते हुए एक सुनहरा कल प्रदान कर अपने कर्तव्य का पालन करता है।

अहमियत को पहचाने और स्वीकारे

एक पिता के किन-किन त्याग और बलिदान का वर्णन करूं, मैं स्वयं समझ नहीं पा रहा हूं। मैंने हिंदी शब्द कोष में ऐसा शब्द ढूंढने का असफल प्रयास किया, जो मुझे इस रिश्ते की गंभीरता और गहराई को समझा सके। यकीन मानिये पूरे शब्द कोष में ऐसा कोई शब्द नहीं मिला जो पिता की अहमियत से बढ़क़र हो। यह एक ऐसा रिश्ता है जिसे महसूस करते हुए उसके अंदर छिपी त्याग की भावना को समझना कठिन ही नहीं, वरन असंभव प्रतीत होता है। इस शब्द की ताकत और उसके महत्व को जीवन रूपी समुद्र में समझना हो तो हमें उस बच्चे या परिवार की तस्वीर को निराहना होगा, जहां पिता शब्द या रिश्ता कहीं खो चुका हो। एक पिता विहीन बच्चा किस कदर खुद को असहाय महसूस करता है, उसे देखते हुए हमें ईश्वर का अहसान मानना होगा कि उसने हमें ऊंगली पकडक़र चलाने वाले पिता का सहारा प्रदान किया। जिन नाजुक हाथों को पकड़क़र हमारे पिता ने हमारे विकास की सीढिय़ां चढ़ाई हो, याद रखे उस पिता के कमजोर हाथों को थामकर कभी बुढ़ापे की डगर पर वृद्धाश्रम की ओर कदम न बढ़ाना। जिसने हमें अपने हाथों में थामकर कठिन डगर पर चलना सिखाया हो, उन हाथों के कांपने वाली उम्र पर अपने हाथों से निवाला खिलाना और यह अहसास कराना कि हमारे हाथों में ही उनकी शक्ति है, कहीं न कहीं उन्हें जीवन की रौशनी अवश्य दिखाएगा। बचपन की मीठी यादों के साथ लडख़ड़ाते हुए कदम-कदम चलना सिखाना, पिता की प्यार भरी डांट से भविष्य संवारना और कभी हार की बात भी दिलों पर न लाने जैसी ताकत देने वाले पिता का महत्व हमारे लिए न केवल बचपन में बल्कि युवास्था से लेकर अपने बुढ़ापे तक स्वीकार करना ही जीवन का सार समझना चाहिए।

पिता का प्यार दिखाई नहीं पड़ता

बचपन से अपने बच्चे को दुलारते और सहलाते हुए बड़ा करने वाली मां का प्यार जगजाहिर हो जाता है। इसके ठीक विपरीत पिता का प्यार आंखों से दिखाई नहीं पड़ता। उसे दिल के अंदर अहसास ही करना पड़ता है। एक पिता की विवशता जब बच्चे की इच्छा पूरी नहीं कर पाती है, तब उसका दिल और आत्मा किस प्रकार तड़पती और आंसू बहाती है, उसे केवल वही बयां कर सकता है। बंद कमरे की दीवारें पिता के दुख की सबसे बड़ी गवाह होती है। वह परिजनों के सामने अपनी विवशता को बयां नहीं करता। कारण यह कि बच्चों की इच्छा कहीं अपने दम न तोड़ दें, वह उसे पूरा करने जतन करने लगता है। अपने बच्चों सहित पत्नी की इच्छा को पूरा करने पर उसे जो आनंद मिलता है, वह उसे भी बाहर नहीं आने देता। एक पिता का इस तरह का प्रबंधन पूरे असीम खुशियां प्रदान करने में सफल हो ही जाता है, भले ही देर से। एक पिता के स्नेह में इतनी ताकत और सामर्थ्य होता है कि वह अपने बच्चों की ओर देखकर ही समझ सकता है कि उसे किस चीज की जरूरत है। खुद एक पिता का अतीत कितना ही काला क्यों न रहा हो, वह हर परिस्थिति में अपने बच्चों को जीवन की उज्ज्वल राहें प्रदान करना चाहता है। एक बात तो पूरी दुनिया को माननी पड़ेगी कि पिता के प्यार को दौलत और ऐशो-आराम की दुनिया से नहीं तौला जा सकता। दुनिया की शुमार दौलतें तराजू के एक पल्ले में भर दी जाएं तब भी तब भी वह पिता के प्यार से भारी नहीं हो सकता। अपने बच्चे को खुशियां देने के लिए एक पिता दिन-रात खटता रहता है। इसके बाद भी उसे थकान का अनुभव न होना उसकी जीवटता का उदाहरण ही हो सकता है। अपने बच्चों के चेहरों पर खुशी की झलक देख पिता की सारी थकान फुर्र हो जाती है।

बच्चों के आदर्श होते है पिता

प्रत्येक परिवार में पिता ही वह शख्स होता है, जो अपने बच्चों का आदर्श बनकर उभरता है। हर बच्चा सबसे पहले आदर्श के रूप में अपने पिता को ही देखता है। यह माना जा सकता है कि मां यदि बच्चे की पहली पाठशाला होती है, तो जीवन के उतार चढ़ाव पर प्रथम आदर्श पिता ही होता है। जीवन जीने की सही कला एक बच्चा अपने पिता से ही सीख पाता है। बच्चों के जीवन में आत्म विश्वास की संचार ही पिता से ही हो पाता है। सुरक्षा की भावना से लेकर बच्चों के मन में व्याप्त भय भी पिता का साया ही खत्म कर पाता है। हमनें उस दौर को भी देखा है, जब पिता की भूमिका एक खलनायक की तरह होती थी। पिता की डांट मार के आगे बच्चे सहम जाया करते थे। यही कारण है कि उस दौर के पिता बड़े कठोर हृदय के माने जाते थे। अब वह दौर बीत चुका है। अब बदली परिस्थितियों में पिता का दुलार और बच्चों के प्रति चिंता ने उसे एक अलग मुकाम दिलाया है। पिता के सामाजिक और पारिवारिक व्यवहार का असर बच्चों पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता रहा है। एक पिता जो अपने माता-पिता और बड़े भाई-बहनों की मान-मर्यादा का ख्याल रखता है, वही उसके आदर्श के रूप में बच्चे भी अपना लेते है। जिंदगी की कठिन से कठिन डगर पर एक पिता का धैर्य न खोना बच्चों को भी प्रोत्साहन प्रदान करने वाला होता है। अपने बच्चे की हर तकलीफ को कठोर चट्टान की तरह आगे खड़ें होकर उसे हार मानने पर पिता ही विवश कर सकता है। मां तो हर तकलीफ पर कोमल हृदयी होने से रो देती है, किंतु एक पिता मुश्किल हालातों में भी उससे जुझने की अपार शक्ति का प्रदर्शन कर एक आदर्श के रूप में उभर आता है।

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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