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व्यंग्य-राग (१६) अखाड़े का खटराग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

हिन्दी में जिसे ‘अखाड़ा’ कहते हैं, बड़े ही अक्खड़ किस्म की चीज़ है. यह अखाडियों के जमघट का स्थान है. यहाँ पहलवान कसरत करते हैं और मल्ल-युद्ध के लिए ताल ठोंकते हैं. दांव लगाते हैं, जीतते / हारते हैं. अखाड़ा अखाड़ेबाजों का अड्डा हुआ करता है. हमारे मुल्क के बड़े बड़े पहलवान इन अखाड़ों की ही देन हैं. एक ज़माना था अखाड़ों की बड़ी पूछ थी. लें आजकल बच्चे ‘जिम’ जाना ज्यादह पसंद करते हैं. आधुनिक चीज़ है.

शुक्रिया करना चाहिए किसिम किसिम के सम्प्रदायों के उन तथाकथित साधुओं की मंडलियों का जिन्होंने बसने के लिए अपने ‘मठ’ बना रखे हैं और जिन्हें वे ‘अखाड़ा’ कहते हैं इलाहाबाद में जब माघ मेला होता है, किसिम किसिम के साधु-संत और उनके अखाड़े आ जाते हैं | आज के बाज़ार-युग में जब कि पैसा सबसे बड़ा मूल्य हो गया है, साधुओं के अखाड़ों में भी अब पैसे की ही तूती बोलती है. ज्ञान तपस्या और त्याग आदि अपनी जगह हैं, हुआ करें; लेकिन धर्म के प्रचार के लिए दौलत चाहिए. जिसके पास दौलत है, पैसा है, वही सर्वश्रेष्ठ है. वही इन अखाड़ों, मंडलों का मंडलेश्वर बनने का हकदार है | ज्ञान, त्याग और तपस्या आदि गुण तो पैसे से भी खरीदे जा सकते हैं. ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ - एक ‘सर्वे’ के अनुसार आज भारत में ढाई सौ से ज्यादह महामण्डलेश्वर, सिर्फ करोड़पति ही नहीं, सौ-करोड़ी हैं. करोड़ों रूपए खर्च करने की ताकत रखने वाले और रसूखदार लोगों को तमाम अखाड़ों में दनादन महामंडलेश्वर की पदवी दी जा रही है | रास्ता बड़ा आसान है | आप कोई भी धंधा क्यों न करते हों बस अगर करोड़पति हैं तो अपना मुंडन कराइए, दूसरा जन्म लेने के लिए पिंडदान कीजिए, नाम बदलिए, गेरुए वस्त्र धारण कीजिए ओर आप अखाड़े के बाकायदा समारोह पूर्वक महामंडलेश्वर बनाए जा सकते हैं | धन-धन्य ! सोचिए, कितने ही अन्य महामंडलेश्वर ईर्ष्या से जल-भुन जावेंगे और उन्हें एक दूसरे के खिलाफ मोर्चे खोल देने होंगे. जनता तो हमेशा ही कुश्ती का मज़ा लूटने के लिए तैयार रहती है |

उन्हें भले ही अखाड़ा न कहा जाए, हमारे देश के राजनैतिक दल भी वस्तुत: अखाड़े ही हैं. इन अखाड़ों में नेता और उनके बफादार घोड़े तैयार किए जाते हैं. एक दल दूसरे दल को ललकारता है. प्रजातंत्र है इसलिए हाथा-पायी यहाँ वर्जित है लेकिन संसद-क्षेत्रे कुश्तियां खूब होती हैं. कभी कभी दर्शकों को वहां सर्कस का मज़ा आने लगता है. खूब मनोरंजन होता है. हर अखाड़ा अपने अपने पहलवान को वहां भेजता है जो कम से कम मौखिक रूप से एक से एक बढकर दांव-पेंच लगाता है. असंसदीय भाषा को संसदीय बनाने का पूरा पूरा प्रयत्न होता है. कुर्सी, मेज़, माइक, फाइलें -जो भी मिल जाए उसका उपयोग हथियार के रूप में किया जाता है. किसी को भी देश की ‘अनेकता में एकता’ का अद्भुत नज़ारा वहां देखने को मिल सकता है. मौखिक कुश्ती यहाँ पूरी तरह से ‘फ्री-स्टाइल’ है. नियम बनाने वालों के लिए कोई नियम नहीं होता. वे तो विधायक है,उनका काम बस किसी तरह कानून बनाना भर है, वे खुद कानून से ऊपर होते हैं | वे गालियाँ बकते नहीं, उनके मुखार्बिंदु से वे फूलों की तरह झड़ती हैं.

भारत में अखाड़ेबाजी कालातीत है. ‘इन्दर का अखाड़ा’ जिसे ससम्मान, आदर के साथ, ‘इंद्र-सभा’ भी कहा जाता है, अखाड़े का शायद सर्वाधिक प्राचीन, सनातन, उदाहरण है. इसमें स्वर्ग की अप्सराएं इंद्र के समक्ष अपने मनोहारी नृत्य प्रस्तुत करती रही हैं. आज भी अवश्य करती होंगीं. हमारी वहां तक पहुँच नहीं है, आज हम जो साहित्य और संगीत में अखाड़ेबाजी देखते हैं उसका इतिहास यहीं से आरम्भ हुआ माना जाना चाहिए. आज भी कोई साहित्यकार, कोई संगीतज्ञ, कोई नर्तकी /नर्तक बिना किसी न किसी अखाड़े में शामिल हुए सफलता की कामना कर ही नहीं सकता. यह तय है.

गीत संगीत की दुनिया में गुरु शिष्य का एक अद्वितीय उदाहरण भारत में मिलता है | हर गुरु का एक ‘घराना’ होता है | लोक संगीत में भी घराने होते हैं लेकिन इन्हें यहाँ घराना न कहकर ‘अखाड़ा’ कहा जाता है | लोक-गीत रचने वाले कवि ही इन अखाड़ों के प्रमुख होते है | इन अखाड़ों का उद्देश्य लोक गायक तैयार करना है | इन गायकों और अखाड़ों के बीच प्रतिस्पर्धाएं आयोजित की जाती हैं; और इन्हें ‘दंगल’ कहा जाता है | ये प्रतिस्पर्धाएं कुश्तियां हैं कुश्तियां, कोई हंसी मज़ाक नहीं | लोक-संगीत के तमाम अखाड़े हैं- उदाहरणार्थ, लता रानी का अखाड़ा, बैरागी का अखाड़ा, लल्लन का अखाड़ा, भगेडू का अखाड़ा आदि |

अखाड़ा आपको खडा करने की कवायत है, प्रशिक्षण का केंद्र है. अड्डा है, जमघट है, मंडली है. कसरत और कुश्ती का ठिकाना है. साधुओं का, पहलवानों का, गाने-बजाने वालों का आँगन है. कितने ही आए और गए अखाड़ा आज भी डटा है |

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०,एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१ मो. ९६२१२२२७७८

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