रविवार, 19 जून 2016

तूने सबकुछ ही दिया है जिन्दगी : ग़ज़ल कविता सप्तक (साझा संग्रह) समीक्षक :एम.एम. चन्द्रा

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नए रचनाकारों को लेकर हमेशा से ही छींटा-कसी , उठा-पटक का दौर चलता रहा है लेकिन सृजन की जमीन से जुड़ा रचनाकार समय के साथ हमेशा अपने  को परिष्कृत करता हुआ आगे बढ़ता है. जिसने अपने समय को नहीं पहचाना वह स्वयं ही विदा हो जाता है  लेकिन जिनके रचनाएं अपने समय का प्रतिनिधित्व करती है. उनको हर युग में गया  याद किया जाता है.नवीन कविता ग़ज़ल सप्तक भी एक ऐसा ही संकलन है जो हमारे समय के  विभिन्न रचनाकारों को पाठक के सामने लाता है

‘पार्वती प्रकाशन’ इंदौर से प्रकाशित सप्तक सिरीज की पुस्तक कविता ग़ज़ल ( सप्तक ) भी मुझे एक प्रयोग से कम नहीं लगी जिसमें सामूहिक रचनाकर्म सामुहिक प्रकाशन. वैसे भी यह प्रयोग कोई नया तो नहीं है. लेकिन प्रकाशक ने भी एक प्रयोग किया है. नव रचनाकारों ने सप्तक में निर्भय  होकर सर्जनात्मक पहल करने का साहस करके, एक अलग पह्चान बनाने की सफल कोशिश की है.

‘ ग़ज़ल-कविता सप्तक’ के प्रथम रचनाकार ‘श्रीश’ अपनी गजलों द्वारा मानवीय संवेदना में आई गिरावट का बारीकी से मुआयना करते हुए  मुकम्मल गजल कहते हैं. इसिलए किसी भी नए रचनाकारों को पढ़कर मुझे उत्साह मिलता है. साथ ही इस बात पर बल मिलता है कि नए रचनाकार बदलते समाज को देख रहे हैं और उन चुनौतियों को पाठक वर्ग के सामने ला रहे हैं.

मासूम बेगुनाहों के सीने पे गोलियां,

सुनकर के उनकी आह कैसे बेअसर हुए.

मृणालिनी घुले की गज़लें पाठकों को उजालों की तरफ इशारा करती हुई धुंध को साफ करके,  घने काले स्याह रंग को अपनी  गजलों से रोशन कर देती है.

जो किया अच्छा किया है जिन्दगी

तूने सबकुछ ही दिया है जिन्दगी ......

रातें तो हमारी भी हो रोशन

गर एक सितारा मिल जाये..............

हो गयी है शाम चरागों को जलालो पहले

गीत बन जायेगा साजो जो मिला लो पहले ....

राम कृष्ण श्रीवास्तव जी की कविताएँ सामाजिक सरोकार के ताने बाने में रची बसी छंद मुक्त कविताएँ हैं जो गैर  बराबरी  पर आधारित व्यवस्था को चुनौती ही नहीं देती बल्कि पाठको को सामाजिक सरोकार तक ले हुए भी  अपने कार्यभार को चिन्हित करती है. इनकी कवितायें वैचारिक दृष्टि से काफी उन्नत है जो पाठक को उद्वेलित करती है-

चलना है मुझे अपनी ही जमीन पर

जैसी भी हो ऊबड़ खाबड़ पथरीली

गड्ढे वाली ...

अकेलापन खुद को खुद से ,

सिखाता है प्यार करना ---------

भीड़ में खड़ा व्यक्ति भले ही भ्रम में रहे

सूरज फिर भी सूरज है

सबको जीवन देते हुए भी

वह कितना अकेला है

नितांत अकेला ......

और हो भी क्यों न

जो दूसरों के लिए जीते हैं

अपने लिए पाते हैं

सदैव अकेलापन .....

उमा गुप्त की कविताएँ परम्परावादी मूल्यों को तोड़ती हुई नई पीढ़ी का आवाहन करती है . अनंत आकाश में  खुली हवा जैसा अहसास कराती है कि  अपने पंख फैलाओ बिना डरे, दिन हो या रात विचरण करो , कठिनाइयों का सामना करो, ये दुनिया तुम्हारी है....

तुम शक्ति को पहचानो अपनी,

जो उचित है आवश्यक है , सत्य है

बस वही है मात्र सहारा

फिर देखो होगा , आज तुम्हारा

और कल भी तुम्हारा

मनोज चौहान पिछले एक वर्ष से  मीडिया में अपनी जगह बनाए में कामयाब हुए है यह भी पिछले कई वर्षों से साहित्य समाज में हो रहे नये परिवर्तन का नतीजा है.जिससे नए रचनाकारों का उद्भव हुआ वरना हम कभी भी मनोज चौहान जैसे रचनाकारों से हमेशा अनजान रहते.

मनोज चौहान की रचनाएं, व्यक्ति के अंतर्मन के द्वंद्व  को पाठक के सामने प्रस्तुत करती है. कविताएँ समय और व्यक्ति के द्वंद्व को उकेरती हुई  अपने से संवाद और संघर्ष करती है. अधिकतर रचनाएं  एक आदमी की आशा, निराशा, चुनौतियाँ, संवेदनाएं , उसका अलगाव, जैसी  तमाम अभिव्यक्तियों को पाठक तक पहुंचती है-

झनझनाहट के साथ

थम जाता है

फिर उफान

में लौट आता हूँ

पुनः

उसी जगह !

एक तरफ वंदना  सहाय के हायकू चुटीलापन, व्यंग्यनुमा और तीखापन लिए हुए तीन लाइना है, जो एक सम्पूर्ण कथन कह जाते हैं जो गागर में सागर भर देने जैसी कहावत को चरितार्थ करती है-

कैसे ये नेता

कुर्सी से करें वफा

देश से जफा.

वहीँ दूसरी तरफ डॉ. सोना सिंह गंभीर से गंभीर राजनीतिक, वैचारिक, सांस्कृतिक समस्या चिह्नित ही नहीं करती  बल्कि उन सब का समाधान भी खोजती है-

टोपी पर क्रांति से लिखने से

नहीं आयेगी क्रांति, उसके लिए

दुनिया बदलो

दुनिया बदलनी है तो खुद

पहले सोच को बदलो

हरिप्रिया की कविताएँ प्रेम की कविताएँ हैं . उन्होंने प्रेम के विभिन्न पक्षों , संबंधों , विसंगतियों, अहसास व्यक्त और अव्यक्त प्रेम की अभिव्यक्तियों का चित्रण बेबाकी से करती हैं. उनकी कविताएँ एक तरफ प्रेम का संदेश देती हैं, तो दूसरी तरफ जो प्रेम नहीं है, वे अभिव्यक्तियां भी पाठक के सामने आती हैं-

उनके नाम थे

प्रेमी... प्रेम आकाश ... प्रेम सिंह.. प्रेमनाथ

प्रीति... स्नेहा... प्रेमा...

लेकिन वे अपने नाम के विपरीत

बाँट रहे थे नफरत

जहाँ ढूंढ़ा प्रेम वह वहाँ नहीं था

जब भीतर ढूंढ़ा उसे

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पुस्तक :गजल कविता सप्तक (साझा संग्रह )

संपादक :जितेन्द्र चौहान

प्रकाशक :पार्वती प्रकाशन, इंदौर

कीमत :100

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