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व्यंग्य राग (13) - गोबर गाथा / व्यंग्य / डा. सुरेन्द्र वर्मा

(हिंदी चेतना में प्रकाशित – जन.-मार्च अंक २०१६)

 

तीज-त्योहारों पर मेरी पत्नी कभी कभी बड़ी परेशान हो जाती है. अपने पूजा-घर की लीप-पोत कर सफाई करना चाहती है. तब गोबर की मांग होती है. लेकिन गोबर मिले कहां से ? महानगरों से गाएं लापता हो गईं हैं. पहले आराम था. मोहल्ले-मोहल्ले में गाएँ मारी-मारी फिरती थीं. गोबराकांक्षी महिलाएं उनपर निगाह रखती थीं. जैसे ही गाय गोबर करती थी वे झट से तसला लेकर नीचे रख देतीं थीं. ताज़ा ताज़ा गोबर उसमें भर कर ले आतीं थीं. लीपो, कितना लीपोगे ! अब वो बात नहीं रही. ज़रा से गोबर के लिए कामवाली से निहुरे करने पड़ते हैं. कहीं से थोड़ा गोबर ले आओ, पूजाघर लीपना है. वो भी कभी ला देती है, कभी नहीं लाती. बड़ी मुश्किल हो गई है. क्या किया जाए?

ऐसे में अमेरिका से एक खबर आई है. उत्साहवर्धक समाचार है. वहां पिछली बार एक्समस के मौके पर जब लोगों में खरीदारी का जुनून होता है, कार्डस अगेंस्ट ह्यूमैनिटी नामक एक कम्पनी ने अपने साईट पर बुलशीट यानी, गोबर, तक बेंच डाला. देखते देखते गोबर के तीस हज़ार पैक बिक गए. कम्पनी ने यह स्पष्ट घोषित कर दिया था कि वह गोबर बेचने जा रही है. फिर भी तीस हज़ार लोगों ने धडाधड ऑर्डर दे डाला. केवल तीस मिनट में प्रोडक्ट आउट ऑफ़ सेल हो गया. मुख्यत: गेम्स की इस कम्पनी ने अपनी साईट पर से सारे गेम्स हटा लिए. केवल गोबर-मंजुषाओं को ही सेल पर रखा. मकसद यह था कि लोग फिजूल-खर्ची न करें और केवल एक ही चीज़ खरीदें !! खरीदारी के मारे खरीद-खोरों ने गोबर-बक्से बिना सोचे-समझे खरीद डाले. कुछ लोगों ने यह सोचकर खरीद डाले कि इनमें शायद कुछ ‘सरप्राइजिंग’ चीज़ मिलने वाली है. लेकिन जब उनके घर सॉलिड-पैकिंग में गोबर पहुंचा तो वे आश्चर्य में पड़ गए. अब उसे वापस भी नहीं किया जा सकता था. आखिर बेचने वाले ने कोई धोका-धडी तो की नहीं थी. उसने तो पहले ही बता दिया था की वह गोबर ही बेंच रहा है. खरीदारों की सारी खरीदारी गुड-गोबर हो गई.

मुझे अपने भारत के व्यापारियों पर बड़ा अफ़सोस होता है. यहाँ गोबर की इतनी मांग है. लेकिन आज तक किसी व्यापारी के दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई कि गोबर की सलीखे से पैकिंग करके उसे वह बेचने वाली अपनी साईट पर रख दे. भारत में तो त्यौहार ही त्यौहार होते हैं. कोई एक ही ‘बड़ा-दिन’ थोडे ही होता है, और हर त्यौहार पर घर लीपने के लिए गोबर चाहिए होता है. अगर कोई व्यापारी ऐसे ‘काऊ-शिट-पैक्स’ को सेल के लिए रख दे तो मुझे लगता है कि उनकी बिक्री भी धडाधड होनी चाहिए. हमारे यहाँ की जनता का एक बड़ा वर्ग पूरी तरह से “मौडर्नाइज़’ हो गया है. कोई पूछेगा कि यह क्या खरीद लिया – गोबर? तो उसका जवाब होगा, नो, नो. इट्स काऊ-शिट-पैक ! और वह इतरा के चलता बनेगा अपनी बीवी को लीपने के लिए गोबर देने !

आजकल भारत में ‘मेक-इन-इंडिया’ का खफ्त सवार है. हम विदेशियों को आमंत्रित कर रहे हैं कि वे अपने उत्पाद भारत में बनाएं, और भारत में जो बने-बनाए उत्पाद पहले से ही मौजूद हैं उनकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं है. जैसे,गोबर. बस, उसे आकर्षक ढंग से पैक भर करना है ! हम वो भी नहीं कर पा रहे हैं.

मैं कल्पना करता हूँ कि कभी बाज़ार जाते वक्त मुझसे कहा जाएगा, सुनते हैं, कल हवन करना है. चौक बनाने के लिए थोड़ा लीपना पडेगा. बुल प्रोडक्ट्स का एक छोटा २०० ग्राम का काऊ-शिट पैकेट लेते आइएगा –प्लीज़.

मुझे पता नहीं यह “गोबर” शब्द कैसे बना. मेरा शब्द वैज्ञानिक परेशान है. गो का अर्थ तो खैर गाय से है ही, लेकिन ‘बर’ ? वैसे ‘बर’ का अर्थ श्रेष्ठ या उत्तम से होता है. गाय तो, इसमें शक नहीं, श्रेष्ठ पशु है ही लेकिन गोबर का अर्थ गाय तो नहीं होता! कभी लगता है, मूलत शब्द, ‘गो-मल’ (गाय का मल) रहा होगा लेकिन मुख-सुख के लिए गोमल ‘गोबर’ हो गया होगा. या यह भी हो सकता है कि क्योंकि सभी पशुओं के मल में गो-मल ‘श्रेष्ठ’ माना गया अत: उसे गोबर कर दिया गया ! जो भी हो. गोबर को उत्तम तो हम मानते ही हैं. सच तो यह है कि हमारे आयुर्वेद में गाय के सभी उत्पाद – दूध, मूत्र और गोबर – श्रेष्ठ ही माने गए हैं. लेकिन गोमांस ? ना, ना. इसका तो नाम लेना भी पाप है. बीफ के शौकीन हमारे एक मित्र कहते हैं, लेकिन क्यों ? इसे भी श्रेष्ठ माना जाना चाहिए. पर समाज तर्क से नहीं चलता. अगर तर्क से चले तो सब गुड-गोबर हो जाएगा. मित्र भी हार मानने वाले नहीं थे. बोले, गुड बेशक गोबर हो सकता है लेकिन गोबर कभी गुड नहीं बन सकता.

लेखक परिचय –

एक बहुआयामी लेखक और जाने-माने व्यंग्य और रोचक निबंधकार. २०-२२ वर्षों से व्यंग्य आलेख प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं. छ: संग्रहों में से एक व्यंग्य-संग्रह, “हंसो लेकिन अपने पर” उ. प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा शरद जोशी सम्मान. एक अन्य समीक्षात्मक निबंध-संग्रह, ‘साहित्य,समाज और रचना’ पर इसी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार. हाइकु और हाइकु-संग्रहों की पुस्तक-समीक्षाएं लिखने में भी विशेष रूचि.

अब तक कुल दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित.

(डा. सुरेन्द्र वर्मा)

मो.- ०९६२१२२२७७८ / १०,एच आई जी, १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद – २११००१

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