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व्यंग्य / सम्मान का नशा / गोविन्द सेन

शराब में नशा नहीं होता। यदि शराब में नशा होता तो बोतल जरूर नाचती। एक फिल्मी गीतकार ने पूरे आत्म विश्वास के साथ लिखा है-नशा शराब में होता तो नाचती बोतल। चूंकि बोतल नाचती नहीं, इसलिए यह सिध्द हो जाता है कि शराब में नशा नहीं होता। लोग तो फालतू का हव्वा खड़ा कर देते हैं। सौ बार बोलने से कोई झूठ सच तो नहीं हो जाता। फिर आप पूछेंगे कि आखिर नशा होता किसमें है ? कौनसा नशा सबसे बड़ा होता है, मैं वही बता रहा हूँ। सबसे बड़ा नशा होता है सम्मान का नशा। इसमें जो नशा होता है, वह दुनिया की किसी भी नशीली चीज में नहीं। सम्मानित होकर आदमी नशीला हो जाता है। सम्मान उसके सिर पर चढ़कर बैठ जाता है, फिर उतरता नहीं।

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक सम्मानित और दूसरे असम्मानित। जो लोग सम्मानित हो जाते हैं, उनकी दृष्टि बदल जाती है। वे दृष्टिवान अपने अलावा दूसरों को असम्मानित समझने लगते हैं। मैं अभी.अभी सम्मानित होकर लौटा हूँ और मैंने इस बात को सौ फीसदी सही पाया है।

जो शख्स सम्मानित हो जाता है, वह फिर आदमी नहीं रह जाता है। फुग्गे में बदल जाता है। उसके भीतर सम्मान की हवा कुछ इस तरह भर जाती है कि वह अपने नगर में उड़ा-उड़ा घूमता है। सम्मान की हवा भर जाने के कारण उसके पाँव जमीन पर नहीं टिकते। वह बिचारा विवश होकर गाता है-आजकल पाँव जमीं पर नहीं टिकते क्या करें ! साइकिल पर भी ऐसे चलता है मानो विमान में उड़ रहा हो। वह हवा पर सवार होकर हवा में जीने लगता है। उसका सीना उन्नत हो जाता है। दृष्टि आसमान पर टिकी रहने लगती है। वह भूलोक पर किसी असम्मानित को देखना भी पसंद नहीं करता। दुर्योग से किसी असम्मानित से नजर मिल ही जाए तो नजर फेर लेता है। हाथ भी वह ऊँचे सम्मानितों से ही मिलाना पसंद करता है ।

सम्मानितों के कई प्रकार और स्तर होते हैं। एक तरफ गली, मोहल्ले, गाँव स्तर के सम्मानित तो दूसरी ओर तहसील, जिले, प्रदेश और देश स्तर के सम्मानित। तहसील,जिले, प्रदेश और देश स्तर के सम्मानित गली, मोहल्ले, गाँव स्तर के सम्मानितों को हेय दृष्टि से देखते हैं । दो एक जैसे लगने वाले सम्मानितों में भी भेद होता है जैसे नौकरियों में कनिष्ठ, वरिष्ठ आदि का भेद होता है। कनिष्ठ सम्मानित को वरिष्ठ सम्मानित का सम्मान करना पड़ता है। अन्यथा अलिखित सजा भुगतनी पड़ती है। चूँकि सजा अलिखित है, अतः इसे लिखना संभव नहीं।

सम्मानित होने के लिए किसी खास काबिलियत की जरूरत नहीं होती। बस जेब भरी और मुट्ठी खुली होनी चाहिए। यही पहली और अंतिम शर्त होती है। सम्मानदाताओं ने बाजार में दुकानें खोल रखी हैं। गिव एंड टेक आधार पर बड़े-छोटे सभी सम्मान प्राप्त किए जा सकते हैं। वाजिब दाम पर वाजिब सम्मान। सीधा सिध्दांत, पैसा दो सम्मान लो। अपनी खुजली मिटाओ । ऐसे में जिन्हें वाकई सम्मानित होना चाहिए,वे खाली जेब, कंजूसी, जुगाड़ कला में कमजोर, सम्मान लिप्सा का अभाव आदि अवगुणों के कारण असम्मानित ही रह जाते हैं। उक्त अवगुणों के कारण युवा लोमड़ी सम्मानित हो जाती है और बूढ़ा शेर टापता रह जाता है।

एक बार सम्मानित होने पर सम्मान की लत ही पड़ जाती है। गरदन फूलों की माला के लिए तड़पने लगती है। कन्धे शाल और हाथ श्रीफल और आँखें अपना प्रशस्ति पत्र पढ़ने के लिए तरसने लगती है। अखबारों में अपने सम्मान की खबरें छपने के सपने आने लगते हैं । सम्मान का आक्टोपस जकड़ने लगता है।

हमारे एक सम्मानित साहित्यकार मित्र को जैसे ही किसी सम्मान का आमंत्रण मिलता है, वे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। बाल निखालिस काले करवा लेते हैं। झोले में अपनी काव्य पुस्तकें डाल लेते हैं। आँखों पर काला चश्मा चढ़ा लेते हैं ताकि किसी असम्मानित से नजरें न मिलाना पड़े। एक बगल में समीक्षकनुमा प्रशंसक और दूसरी बगल में एक फोटोग्राफर लेकर सम्मान स्थल पर निकल पड़ते हैं। फोटोग्राफर से अपने सम्मान के ऐतिहासिक क्षणों को कैद करवाते हैं और समीक्षकनुमा प्रशंसक से अपना यशोगान करवाते हैं। यशगान वे खुद उसे लिखकर देते हैं। वे कुछ भी दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ते हैं । अपना काम दूसरे के भरोसे छोड़ना मूर्खता ही तो है ।

-राधारमण कॉलोनी, मनावर, जिला.धार [म.प्र.] 454446 मो. 09893010439

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