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बरसाने लाल चतुर्वेदी की हास्य-व्यंग्य कविताएँ

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पदावली

अंग्रेजी- प्रेम

जसोदा हरि अंग्रेजी पढ़ावै ।

'मम्मी-डैडी' कहहु दुलारे, सुनि मोहि आनँद आवै ।
मेरो लाल 'कान्वेन्ट' जात है, 'इंगलिश पोइम' गावै ।
टा-टा' कहि जब विदा होत है, रोम-रोम हरषावै ।
आन्टी' सुनि चाची बलि जावै, 'अंकिल' मूँछ फरकावै ।
डान्स' करत 'कजिन सिस्टर' संग, नन्दबबा मुस्कावै ।
'बरसाने' या छवि कौ निरखत अँगरेजहु शरमावै । ।

 

दलबदलूजी

सखि मेरो बालम पलटत रंग ।

श्वेत वसन अब पीरे ह्वै गये, मैं तो रहि गई दंग ।
छाँडिकें पहिले साथी डोलत, नये यारन के संग ।
जिन लोगन ते मीठे बोलत, ठानत है अब जंग ।
नये साथिन को चाय पिलावत, आ गई मैं तो तंग ।
जिन मुख देखत दुख उपजत है, विनै लगावत अंग ।
नित्य नवीन कला खेलत हैं, नाचन लागे नंग ।
गिरगिट अब शरमावत डोलत, कुआं परी है भंग ।।

 

मंत्री

नहिं ऐसो 'चांस' बारम्बार ।

तैने प्यारे ले लियो अब मंत्री को अवतार ।।
कर विदेश-गमन जल्दी, मत लगावे बार ।
पुत्र, साले औ भतीजे, सबकौ कर उद्धार ।।
भूमि कोऊ हस्तगत कर, नई लै लै कार ।
प्रेम 'परमिट' सरस' कोटा', द्रव्य कर दे पार ।।
पद रहे, चाहे -दल बदल -दे, याही में है सार ।
कुर्सी अपनी पै -चिपक जा, फिकर मत कर यार ।।

 

विनय

प्रभु मेरे अवगुन चित न धरो ।

मैं चुनाव में फेरि खरौ भयौ, अबकी पार करो ।
कितिक बार मोहि हारत ह्वै गई, अब तो दया करो ।
वोटर के घर जाय जाय के, इक पग रह्यौ खरो ।
इक नर हैं इक नारि कहावत, जानत जग सबरो ।
वोट देन को एक बरन भये, वोटर नाम परयो ।
वोटर सबरे पारस जैसे, कंचन मोहि करो ।
अबकी बार मोहि पार उतारो, मूँड़ि पै हाथ धरो ।।

 

मंत्री-चरन

मन रे परस मन्त्री-चरन । -

जिन कृपा सों मिले परमिट, गरीबी कौ हरन ।
जे चरन हैं चतुर परसे, कमेटी में धरन ।
जे चरन बेकार परसे, नौकरी सों भरन ।
जे चरन कलाकार परसे, पदन लीला करन ।
मन रे परस मन्त्री-चरन ।।

 

जनम गँवायौ -

रे मन मूरख, जनम गँवायौ ।

जेल रहौ तू व्यर्थ अरे, यदि मंत्री-पद नहिं पायौ ।।
कहा भयो एम०ए० जो कीन्हों, 'सरविस' यदि नहिं पायौ ।
कहा भयो 'पुस्तक लिखबे ते, पुरस्कार जो न लायौ ।।
'सरविस' कहा 'बॉस' को यदि नहिं, नाक चना बिनवायौ ।
व्यर्थ कियौ व्यापार अगर जमकर ना ब्लैक कमायौ ।।
कहा भयौ सेवा करिबे ते, फोटो जो न छपायौ ।
ब्याह व्यर्थ यदि निज 'मैडम' को क्लब में नाहिं नचायौ । ।
हिन्दी सेवा व्यर्थ अरे यदि, अभिनन्दन न करायौ ।
यह संसार खेल तिकड़म कौ बावरे कहाँ भुलायौ ।।

 

 

फिल्म देखन की प्यासी

 

अंखिया फिल्म देखन की प्यासी ।

कैसे रहें चित्रपट बिन ये ' फीवर' होय या खांसी ।
अपने नगर के सबै देखके जाहु चहत है झांसी । ।
विज्ञापन अखबार देखिके निसदिन रहत उदासी ।
आए बाजे फिर गये गलियन डार गये गल-फांसी । ।
फिल्म-पत्रिका निसदिन बांच्यो, मूर्ख करत हैं हांसी ।
'बरसाने' फिल्मन की गति लखि, करवट लहिहौं कासी । ।

 

मंत्री गति

मन्त्री-गति कछु कहत न आवै ।

मीठी-मीठी बातन तें ये, जनता कूँ बहकावै । ।
गिरगिट सम दल एक छोडिके दूजै में मिलि जावै ।
हरेक विषय पै भाषण देके खूब हंसी उपजावै । ।
हाथ जोड़ि बत्तीसी काढ़ि कें बातें खूब बनावै ।
आश्वासन दिल भरि कें बांटत, शीघ्रहि उन्हें भुलावें ।
सब्जबाग दिन-रात दिखावत, रेत में नाव चलावै ।
भर दे दिल कूँ बाँकी नजरिया नेक शरीर न बुवाई । ।
तुम जब रोओ उत्तर कों वो दक्खिन के गाने गावै ।
कहत कछू औ करत क-छू याकौ भेद समेझ नहिं आवै । ।

 

'ब्लैक की कमाई

मैया, मैं नहिं 'ब्लैक' कमायौ ।

पुलिसमैन मेरे बैर परे है, झूठयौ ही नाम लगायौ ।
सावन में मैं तीर्थ गयौ हौं, कातिक में घर आयौ । ।
इन्हें कहा मालूम अरे मोहि धरती में धन पायौ । ।
याही ते ये कोठी लीनी औ' ये भवन बनायौ । ।
भैया की फिरि दीनि जमानत और वाहि छुड़वाया ।
आगे कूँ समझाय तात कूँ पुनि वाने कण्ठ लगायौ । ।

 

नयी कविता

ऊधो, कविता नयी सुनाओ ।

सूरदास रसखान पुराने, ' 'लारे लप्पा'' गाओ ।
कमल समान सुनी बहु अंखियां, बिल्ली सम बतलाओ ।
दाड़िम अधर भये अब बौड़म, ' 'लिपस्टिक'' लगवाओ ।
मुरली अब तो 'बोर' करत है, ''मैडोलीन'' सुनवाओ ।
शुक सम नाक सुनी बहुतेरी, उल्लू-सी बतलाओ ।
रास भयो अब दकियानूसी, तुम 'बालडांस' करवाओ ।
घन सम केश लगत नहिं नीके, रीछन सम कटवाओ ।
रेशमी-सारी ''बैकवर्ड'' भई,' 'मिनीस्कर्टं' सिलवाओ । ।

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कविता संग्रह आधुनिक सुदामा से साभार

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