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व्यंग्य-राग (१९) / कल-कल निनादव / डा.सुरेन्द वर्मा

कल-कल

व्यंग्य-राग (१९) कल-कल निनाद

डा.सुरेन्द वर्मा

आज बात मैं ‘कल’ की करना चाह रहा था। अब आप पूंछेंगे, कौन से कल की? जी हाँ, समय से संदर्भित “कल” दो प्रकार के होते हैं। एक कल जो बीत गया और एक कल जो आने वाला है। जब तक पूरी बात न कह दें आप समझ ही नहीं सकते कौन से कल की बात कही जाएगी। पड़े रहिए भ्रम में ! वह जिसकी दूकान से आप रोजमर्रा का सामान खरीदते हैं, आप को नाराज़ नहीं करना चाहता। आप सामान उधार मांग रहे हैं। वह विनम्रता से दूकान पर लगे बोर्ड की तरफ इशारा कर देगा। ‘’आज नहीं कल उधार”। और आप जो जानते ही हैं, यह एक अलग ही किस्म का ‘कल’ है जो आता कभी नहीं और हर बार आने वाले कल की ओर इशारा कर देता है।

शायद यही कारण है कि हिन्दी में आजकल सकारात्मक सोच के बहाने ‘आज’ पर बड़ा जोर है। कल की मत सोचिए। पिछला कल तो काल में समा गया, वह तो कभी लौटकर आ नहीं सकता। (बताते चलें, मराठी में पिछले कल को कल न कहकर ‘काल’ ही कहते हैं) और आने वाला कल जो अभी आया ही नहीं है उसके बारे में भला क्या सोचना ? इसलिए बस, “आज” पर ध्यान दीजिए। “कल” भूल जाइए। जब तक जिएँ, सुख से जिएँ। ज़रूरत पड़े तो उधार लेकर भी घी पिएँ। एक कल तो गुज़र ही चुका है और दूसरा देखा किसने है !

यह जो कल है ‘काल’ बनकर बड़ा सताता है। बीत गया तो क्या, आदमी भूलता नहीं। बीते दिन बुरे दिन रहे हों तो भी नहीं भूलता और सुखद दिनों को तो भला भूलें ही क्यों ? अपनी भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है. वह अपनी “महान परम्परा” को कभी नहीं भूलती। नए से नया वैज्ञानिक आविष्कार हो, हम अपने पुराणों (पुरानों) में उसे ढूँढ़ ही निकालते हैं। और खुश रहते हैं। पुराने दिन, अच्छे दिन। “गुड ओल्ड डेज़।” कल अच्छा था और हमेशा अच्छा रहेगा। यहाँ कल से मतलब, ज़ाहिर है, काफी पुराने कल से है। कल के छोकरे से नहीं है। कल का छोरका यानी नया लड़का। नए के लिए हमेशा हमारे मन में एक संदेह, एक संशय बना रहता है। पता नहीं कैसा,क्या है ? नई चीज़ अपनाने में बड़ा संकोच रहता है। परम्परावादी जो ठहरे !

कल की हम कल पर छोड़ देते हैं। जो भाग्य में बदा है होकर रहेगा। कल के लिए ख्वामखाह चिंता करना है ! कल जब आयेगा, देखा जाएगा। आने वाले का सामना तो करना ही है। अभी से फ़िक्र क्यों करें? उसे पहले उदय तो होने दें। फिर मराठी का एक शब्द याद आगया – ‘उदया’| जीहाँ, मराठी में उदया आने वाले कल को ही कहते हैं। काल और उदया, बीते और आने वाले – दोनों कलों के लिए अलग अलग शब्द। कोई घपला नहीं। अर्थ स्पष्ट है। जो लोग कल से बड़ी बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे है, लगाए रहें। उम्मीद पर दुनिया क़ायम है। सूर्योदय हमारे लिए आशा की किरण लाता है। सोच में क्या जाता है ! ज़िंदगी तो अपनी रफ़्तार से बहती है बहती रहेगी।

कल-कल बहती हुई नदी के प्रवाह की मंद-मंद, मधुर,मीठी, कोमल,कर्ण-प्रिय आवाज़ सुनी है ? और कोयल भी तो कल-कंठ ही है। मीठा गला है उसका। कोयल, कबूतर, हंस- सभी कल कंठ हैं। चिड़ियों का सामूहिक शोर, शोर नहीं होता कल-रव होता है। कभी ध्यान गया, हमारे राष्ट्र-गान में भी ‘कल कल निनाद’ है, कल कल निनाद के लिए आमंत्रण है।

यदि नाद में कल है, तो रंग में भी कल गायब नहीं है। हमारे समाज में न जाने कितने कल-मुँहे और कल-जिव्हे लोग निर्भय घूमते हैं। उनके कारनामे भी काले होते हैं और ज़बान भी उनकी काली ही होती है।कलंकित हैं वे लेकिन उन्हें चिह्नित करने वाला कोई नहीं है। कई पक्षियों का रंग काला होता है। लेकिन वे कलमुंहे और कल-जिव्हे नहीं होते। कल-चिडे और कल-चिडी कल-चोंचा और कल-दुमा हो सकते हैं लेकिन उनका चाल-चलन कभी कलुषित नहीं कहा जा सकता।

एक समय था जब काले रंग को बड़ी ही हेय दृष्टि से देखा जाता था। आदमी दाल में हमेशा कुछ न कुछ काला देख ही लेता था। काला हमेशा से ‘odd man out’ रहा। काला बरसों रंग-भेद का शिकार रहा। अपने भारत में ही कृष्ण भले काले रहे हों, लेकिन काली लड़की गवारा नहीं है। इस मामले में कृष्ण ने भी कोई अच्छा उदाहरण पेश नहीं किया। राधा गोरी को ही पसंद किया। सोच में अब थोड़ा फर्क बेशक आने लगा है। black is beautiful का नारा अक्सर सुनाई देने लगा है। लेकिन लगता है यह नाम-मात्र के लिए ही है।

कल -वक्त का एक पहलू है, मंद मंद निनाद है, कल कृष्ण-रंग है। इतना ही नहीं, कल चैन और आराम है, शान्ति और इत्मीनान भी है। आज दुनिया नें किसी को कल नहीं है। सब हैरान, परेशान हैं।

सभी शान्ति की खोज में हैं। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि आदमी की अपनी बेचैनी शांत हुई हो और उसे कल पड़ गई हो। हमने हमेशा ही, तनाव से मुक्ति के लिए, शान्ति के लिए प्रार्थना की है और वह भी केवल अपने ही लिए नहीं पूरे चल-अचल संसार के लिए, समस्त ब्रह्मांड के लिए। हमने शान्ति के प्रतीक कबूतर उडाए हैं। योग साधा है, ध्यान किया है। लेकिन बेकल को आज तक कल न पड़ पाई|

गांधी जी ने कहा था हम हिंसा से अहिंसा की ओर नहीं जा सकते। लेकिन हमारा आचरण तो ठीक ऐसा ही है। हम ‘कल’ पाने के लिए ‘बेकली’ का इंतज़ाम करते हैं। अपनी आवश्यकताएं बढाते जाते हैं। और फिर रोते हैं, हमारी ज़रूरते पूरी ही नहीं होतीं। अंधाधुंद ज़रूरतें पूरी करने के लिए कल-कारखाने लगाते हैं हाथों को आराम देने के लिए कल-पुरजों का इस्तेमाल करते हैं। हाथों को निकम्मा छोड़ देते हैं। मशीनों का उपयोग करते हैं और न जाने कितने हाथों को बेकार कर देते हैं। एक तरफ बेकार हाथों को काम नहीं है और दूसरी तरफ मशीने अमीरों को और अमीर बना रही हैं। ऐसी असमानता के चलते समाज में बेकली तो बढेगी ही हम कल (मशीन) से कल (चैन) प्राप्त करना चाहते हैं। यह असंभव है। कल कारखाने केवल बेकली परोसते हैं| हमारी मुसीबत यह है कि हमने कल को केवल कल-बल के रूप में देखा है। बंदूक के घोड़े के रूप में देखा है। दांव–पेंच के रूप में देखा है। हम जुगाड़ बैठाते हैं। साम दाम दंड भेद –किसी भी तरह अपना काम निकालना चाहते हैं। लेकिन गलत साधनों से सही साध्य प्राप्त नहीं किए जा सकते। इसीलिए तो हम बेचैन हैं। मेरा विनम्र सुझाव है (और सुझाव के अलावा मैं भला दे भी क्या सकता हूँ ) कृपया बेकली से कल पाने की कोशिश न करें।

- डा, सुरेन्द्र वर्मा १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१ *मो. ९६२१२२२७७८

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कल के विभिन्न आयाम और वह भी व्यंग्यात्मक रूप में पहली बार देखे,बहुत ही अच्छालगा।मनीषा।

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