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अशोक गौतम / व्यंग्य/ कैपिटलिसियाते भगवान

बाजार में टमाटरों के गुस्से से परेशान हो घर जाने को मन नहीं कर रहा था कि आज फिर घर किस मुंह जाऊं कि तभी दिवालिए दिमाग में एक खतरनाक विचार बिन बादलों के बिजली की तरह कौंधा और मैं बिन एक पल गंवाए अपने शहर के प्रसिद्ध मंदिर में यह सोच जा पहुंचा कि क्यों न भगवान से घर जाने से पहले दो किलो टमाटर ही मांगकर देख लिए जाएं। बात बन गई तो ..... मुझ जैसों को तो टमाटर इन दिनों अपने को हाथ तक नहीं लगाने देते, भगवान को ही अपने को छूने दें तो छूने दें।

अपनी जिंदगी में फिलहाल सब ठीक सा चल रहा था सो बड़े दिनों बाद मंदिर जाने की नौबत नहीं आई थी। जब वहां पहुंचा तो भक्तों की अलग- अलग लाइनें देख कर दुविधा में पड़ गया कि मेरा हक किस लाइन में खड़े हो भगवान से टमाटर मांगने का बनता होगा? पहले तो यहां भगवान के दर्शन को सबकी एक ही लाइन लगती थी। ये अलग- अलग लाइनें? पर यार, कहते तो सब यही हैं कि भगवान की नजरों में राजा-रंक सब बराबर होते हैं। फिर ये लाइनें अलग- अलग कैसीं?

मैं ठहरा पैदाइशी मोटे दिमाग का जीव! इसलिए मैं अधिक सोचने में विश्वास नहीं करता तो नहीं करता। अबके फिर इसी गुण के चलते ज्यादा सोचने से बच उस लाइन में खड़ा होने की सोच ली जिस लाइन में न के बराबर भक्त खड़े थे। यह सोच कि भगवान से जल्दी दो किलो टमाटर मांग घर को टाइम का निकल लूंगा शान से सिर ऊंचा किए।

अभी मैं उन भक्तों की लाइन की ओर हनुमान चालीसा पढ़ता कदम बढ़ा ही रहा था कि सामने से मंदिर का सुरक्षा कर्मचारी गुर्राता आया, गोया मैं किसी मंदिर में न होकर किसी जंगल में आ पहुंचा हूं भटकता हुआ।

'कहां खड़े होने की कुचेष्टा कर रहे हो?

' जहां से भगवान से जल्दी संवाद हो जाएं,' मैंने अपना फटा कालर खड़ा करते कहा।

'क्या मतलब?' उसने मूंछों पर ताव देते पूछा।

'मतलब कुछ नहीं। बाजार से टमाटर खरीदने की हिम्मत हो नहीं रही सो सोचा कि मंदिर जाकर भगवान से किलो- दो किलो टमाटर लेकर टाइम का घर निकलूं। बड़े दिनों से घरवाले बाजार से टमाटर लाने को जबरदस्ती कर रहे हैं। पर टमाटर हैं कि अपने को छुआना तो दूर, अपनी ओर नजर तक नहीं उठाने दे रहे,' मैंने अपने मन की व्यथा उसके सामने यह सोच उड़ेल दी क्योंकि वह मुझे अपनी ही बिरादरी का सा लगा।

' पता है यह लाइन किसी की है?'

' मंदिर है तो भक्तों की ही होगी! आटा लेने वालों की तो होगी नहीं,' मैंने लचरपने में कहा।

'पता है ये कौन से भक्त हैं?'

'भक्त तो भक्त होते हैं।'

' कान हैं तो कान खोलकर सुनो! ये लाइन वीवीआईपी भक्तों की है।'

'वीवीआईपी भक्त बोले तो? हैं तो ये भी मेरी तरह भगवान से मांगने वाले ही ? जब सब भगवान से कुछ न कुछ मांगने के लिए खड़े हों तो वीवीआईपी भी तो भिखारी ही हुआ कि नहीं ? और मेरे हिसाब से भिखारियों की कोई श्रेणी नहीं होती। वह बस मांगने वाला होता है,' कह मैं उसी लाइन में डटने को तैयार हुआ तो मेरी बिरादी का होने के बाद भी वह मुझे डंडा दिखाता बोला,' देखो! ज्यादा बदसलूकी न करो। कितने हैं जेब में भगवान को देने के लिए ?'

'दस हैं, क्यों?'

'तो उस लाइन में खड़े हो जाओ। यह हजार- लाख चढ़ाने वाले भक्तों की लाइन है,' कह उसने मुझे फटे कालर से खींच मील भर लंबी लाइन की ओर जाने का इशारा किया तो मैं चौंका,' मतलब??'

' जिस लाइन में तुम खड़े हो, ये स्पेशल से भी स्पेशल भक्तों की लाइन है। और ये जो दूसरी देख रहे हो , ये वीआईपी भक्तों की। दस रूपए वाले नंगों की लाइन वो रही।'

'पर उसमें खड़ा हो गया तो दो दिन तक भी भगवान से अपनी फरियाद कहने की बारी नहीं आएगी??'

'तो हम क्या करें? जेब में पैसे रख कर आया करो जो भगवान से मिलने आना हो तो।'

'मतलब, अब भगवान भी पूंजीवादियों के शिकार हो गए? ये तो बड़ा कहते फिरते थे कि जिसका कोई नहीं उसका मैं हूं यारो।'

' ज्यादा सवाल जबाव बाद में। पहले उस लाइन में! खुद जाते हो या मैं उठा कर वहां रख दूं?' मैं मूक सामने भगवान की ओर निरीह भाव से देखता रहा, पर उनका मन नहीं पसीजा तो नहीं पसीजा। हद है साहब! जमीन ,हवा- पानी पर तो इनका अधिकार हो ही गया। अब हमसे भगवान का अधिकार भी छीनने निकल पड़े ये?

 

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

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