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बदल गए हैं महानता के मानदण्ड - डॉ. दीपक आचार्य

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हमारी सारी जीवनपद्धति अब पराश्रित हो गई है। हमारा प्रत्येक कर्म औरों पर आश्रित हो गया है।  हम खुद क्या हैं,  हमारे लिए क्या बेहतर है, हमारी तरक्की के लिए हमें क्या करना चाहिए, हम क्यों पैदा हुए और कहाँ जाना है ?  इन सबके बारे में हमें खुद को पता नहीं।

लेकिन इतना सब कुछ पता है कि हमें ऎसा क्या करना चाहिए कि औरों को अच्छा लगे, हमारी छवि बेहतर दिखे और हमारे अवगुण, दरिद्रता, बीमारियां, लुच्चापन-टुच्चापन आदि सब ढका रहे और जो हमें देखे वह खूबसूरत कहे, जो हमारे सम्पर्क में आए वह हमें बड़ा आदमी मानें तथा जमाने भर में हम औरों के मुकाबले कुछ अलग ही नहीं वरन उनसे बढ़कर दिखें-दिखाएं। चाहे इसके लिए हमें कुछ भी क्यों न करना पड़े।

आजकल हम सभी की जिन्दगी, स्वभाव और लोक व्यवहार के निर्णायक हम खुद नहीं रहे। चौबीसों घण्टों हम इसी प्रयास में लगे रहते हैं कि दूसरे लोग हमें अच्छा मानें, समझें और  हमें महान होने का हर क्षण अहसास कराते रहें।

कभी महानता, प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हमारे कामों, आदर्श व्यवहार तथा लोक कल्याण की धाराओं से मापी जाती थी। पर आज इसके पैमाने बदल गए हैंं। आज औरों के सामने अपना रौब झाड़ने, अपने प्रभुत्व एवं प्रभाव के सार्वजनीन प्रकटीकरण और अपने आपको सर्वोच्च, श्रेष्ठ एवं अन्यतम जतवाने के लिए तरह-तरह के स्वाँग रचने-रचवाने तक सीमित होकर रह गया है।

हमारा अपना खुद का मौलिक व्यक्तित्व चाहे कुछ न हो, खुद में प्रतिभा और हुनर का ग्राफ जीरो हो लेकिन दूसरों के सामने हम अपने आपको ऎसे पेश करते हैं जैसे कि दुनिया में हमारे मुकाबले और कोई इतना वर्चस्वी या बुद्धिजीवी हो ही नहीं सकता।

और इस महानता को सिद्ध करने के लिए हम जो-जो हथकण्डे अपनाते हैं उन्हीं ने मानवता की बुनियाद को कमजोर कर दिया है। इन हालातों ने इंसान को मूल्यहीनता और सिद्धान्तहीनता की विचित्र स्थिति में ला खड़ा कर दिया है।

आज हम उस चौराहे, सर्कल और दौराहे-तिराहे पर खड़े हैं जहाँ हम केवल खड़े रहने भर के लिए लोगों की दया, कृपा और करुणा के आकांक्षी हैं। हमें इसी में मजा आता है कि हम जहाँ खड़े हुए हैं, जिस किसी के साथ खड़े हुए हैं वहाँ खूब सारे लोगों की भीड़ हमें देखती है, आगे बढ़ जाती है और हम इसे ही लोेकप्रियता मानकर इतने आत्ममुग्ध हो गए हैं कि हम यह तक भूल गए हैं कि हम क्या हैं और हमें क्या करना है, किस तरफ जाना है।

यह हमें तब याद आता है कि जब ऊपर जाने का वक्त आता है और तब तक हमारे लिए बहुत देर हो चुकी होती है। हम इसी नादानी, नासमझी और मूर्खता के पछतावे के साथ बिना इच्छा के देह त्याग देते हैं और अतृप्त आत्माओं की उस असंख्य भीड़ में शामिल हो जाते हैं जो हमारी ही तरह लोकप्रियता के भ्रमों में जीती हुई ही मरकर भूत-पलीतों की श्रेणी में आ गई।

इन्हीं अतृप्त आत्माओं के प्रवेश के कारण अच्छे-अच्छे संजीदा और समझदार लोग भी इन्हीं धाराओं में आकर सब कुछ गँवा बैठे और अपना मौलिक अस्तित्व खो दिया।

हमारी महानता अब छोटे-छोटे कामों में नज़र आने लगी है। मसलन कोई सा काम हो, हममें सिविक सेंस रहा ही नहीं। नियम विरूद्ध वाहन पार्किंग कर देना, चौराहों पर लाल बत्ती के बावजूद गुजर जाना, हेलमेट होते हुए भी बिना पहने दुपहिया वाहन चलाना और रोक-टोक होने पर अपनी ही तरह के किसी न किसी आका का नाम लेकर भाग छूटना, कानून तोड़कर रौब जमाना, पद का दुरुपयोग, टोल टेक्स नाकों पर पैसों से बचने के लिए अवैध रूप से पट्टी या रौबदार पद-नाम का इस्तेमाल, दुकान-घरों की हदों को नाजायज रूप से आगे बढ़ाकर जम जाना, अपनी औकात और मूल हैसियत से ज्यादा संसाधनों और सुविधाओं का उपभोग करने के लिए जद्दोजहद करना, अपने अधिकारों की सीमाओं से आगे जाकर स्वार्थ के काम करना, जगह-जगह मुफ्तखोरी, ठहरने के स्थानों का मुफ्त में इस्तेमाल करना, अपने आपको ऊँचा दिखाने के लिए योग्यतम उच्च लोगों का नीचा दिखाना आदि बहुत से कारनामे हैं जिनसे आज का आदमी अपने आपको महान और प्रभावशाली के रूप में स्थापित करने के लिए ताजिन्दगी प्रयत्नशील रहता है।

सारी इंसानियत छोड़कर दुनिया का सब कुछ मुफ्त में पा जाने और मर्यादाओं-अनुशासन के जानबूझकर उल्लंघन करने का जो शगल आजकल दिखाई दे रहा है उसने मानवता को शर्मसार तो किया ही है, हमारी मलीन मनोवृत्ति और जानवरी व आसुरी स्वभाव को भी अच्छी तरह चरितार्थ किया है।

उन सभी स्वनामधन्य और प्रभावशाली लोगों के इस हुनर को दाद दी जानी चाहिए जिसकी वजह से ज्ञान, बुद्धि, हुनर और किसी भी तरह की प्रतिभाओं से शून्य होने के बावजूद ये लोग कमा खा रहे हैं और अपनी चवन्नियां चला रहे हैं। खोटे सिक्कों का चल निकलना और चला देना भी अपने आप में एक हुनर है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

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