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ईश्वर को तलाशें अपनी भीतर - डॉ. दीपक आचार्य

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संसार में तमाम मनुष्यों को दो तरह की कामनाएँ होती हैं। नगण्य संख्या में वे लोग हैं जो खुद ईश्वर को पाना चाहते हैं जबकि अधिसंख्य वे हैं जिन्हें ईश्वर को पाने की कामना होती है और उनके लिए ईश्वर को पाना ही लक्ष्य है। इनके अलावा तीसरी श्रेणी में वे लोग हैं जिनका न ईश्वर से कोई सरोकार है, न धर्म से।

इन्हें अपने धंधों और कमाई से ही फुरसत नहीं है बल्कि ईश्वर के नाम और धर्म का इस्तेमाल वे अपने स्वार्थों को पूरा करने या कि अपनी दागदार छवि को साफ-सुथरा दिखाये रखने के लिए ही करते हैं। बहुसंख्य वे लोग हैं जो किसी न किसी गुप्त या प्रकट आपराधिक कर्म, अनियमितताओं, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, व्यभिचार, अन्याय, अत्याचार, शोषण, जमाखोरी, सूदखोरी, अहंकारजनित मानवीय संवेदनहीनता, आसुरी कर्मों आदि में लिप्त हैं और इन पापों के भार की वजह से उनका चित्त सदैव अशान्त रहता है, उद्विग्नता बनी रहती है, नींद काफूर हो जाती है, अज्ञात भयों के कारण परेशान रहते हैं, नरक का भय भी सताता रहता है और गलत-सलत धंधों के कारण उनके भीतर विद्यमान मौलिक आत्म तत्व का इतना अधिक क्षरण हो जाता है कि हर क्षण इन्हें अपराधबोध बना रहता है।

इस पर अंकुश पाने या अपने चित्त को शांत करने के लिए इन लोगों को लगता है कि भगवान के नाम पर कुछ कर देने से बचा जा सकता है अथवा आत्म शांति पाायी जा सकती है। इसलिए ये लोग धर्म और ईश्वर के नाम पर बाबाओं, मन्दिरों और दूसरे धर्म स्थलों की  ओर भटकते रहते हैं और यह मान लिया करते हैं कि इन्हीं में ईश्वर की प्राप्ति होगी और कृपा भी।  पर ऎसा होता नहीं है। धर्म स्थल केवल आरंभिक स्थल हैं जो प्रेरणा और मार्ग दिखाते हैं। असली ईश्वर की प्राप्ति तभी संभव है कि जब हम हमारे भीतर ईश्वर की खोज करें। ईश्वर हर इंसान की आत्म जागरण की अवस्था के बाद प्राप्त होता है

जो लोग ईश्वर या ईश्वरीय कृपा पाने के आकांक्षी हैं उनमें से अधिकांश लोग धर्म, वंश परंपरा और उपासना पद्धतियों पर दृढ़ नहीं हैं, न उनके कोई सिद्धान्त हैं, जहाँ कुछ लाभ या स्वार्थ पूरा होता दिखता है वहाँ ये लोग मुड़ जाते हैं। जब तक लाभ मिलता रहता है तब तक किसी खूंटे से बंधे रहते हैं, श्रद्धा और आस्था के नाम पर वह सब कुछ करते रहते हैं जो एक सामान्य, भूखा-प्यासा इंसान कर सकता है। फिर कुछ अड़ंगा आ जाए और ऎषणाएं पूरी न हो पाएं तो दूसरे ठिकानों और देवरों की तलाश शुरू हो जाती है और यही क्रम ताजिन्दगी यों ही चलता ही चला जाता है। अन्ततः इंसान जिन्दगी भर भटकाव और कुछ भी उपलब्धि न हो पाने के मलाल के साथ ऊपर लौट जाता है।

ईश्वर या ईश्वरीय कृपा से आनंद की तलाश इन इंसानों को पूरी जिन्दगी इसलिए भटकाए रखती है क्योेंकि ये लोग ईश्वर की तलाश बाहर की ओर करते हैं और यह मानते हैं आसमान से कोई दिव्य रश्मि पुंज या देवस्थानों से  भगवान की दिव्य अमूर्त किरणें आकर उनके भीतर प्रवेश कर जाएंगी  अथवा कि सूक्ष्म दिव्य देह रूप में भगवान हमेशा उनके साथ बना रहेगा ताकि जो ये सोचें वह तत्काल पूरा हो जाए। यही भ्रम इंसान को अंतिम क्षण तक बना रहता है।

जबकि हकीकत में देह, मन और मस्तिष्क की शुचिता का सर्वोच्च स्तर पा जाने के बाद ही अपने भीतर आत्म तत्व के रूप में विद्यमान ईश्वरीय शक्ति का जागरण होता है और वही इंसान के भीतर परमतत्व की प्रतिष्ठा करता है।

यह स्थिति तब ही प्राप्त की जा सकती है जबकि देह को देवालय होने की सम्पूर्ण भावभूमि प्राप्त हो जाए। यह तब ही प्राप्त हो सकती है कि जब हम पूरी तरह पावन हों, हमारे भीतर कोई भी विजातीय द्रव्य न हो, चित्त में कोई विकार शेष न रहे और हमारी आत्मा से लेकर शरीर तक सब कुछ शुचिता की आभा से परिपूर्ण हो।

ईश्वर हमारे भीतर प्रतिष्ठित होने पर तीन परिवर्तनों से जाना जा सकता है। जिसके हृदय में परमात्मा की शक्ति प्रतिष्ठित हो जाती है वह व्यक्ति ईश्वरीय प्रतिनिधि हो जाता है तथा वह निरपेक्ष, निर्भय और मुदित रहता है। 

हमेशा भीतरी आनंद, प्रसन्नता और शाश्वत आत्मतोष के लहराते समन्दर से ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहकर आत्म आनंद का जयगान करती रहती हैं। बाहर की बजाय ईश्वर की तलाश अपने भीतर करें और वह सब कुछ पाएं जो अभीप्सित है।

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श्वास से भगवान के उपर रखते हि विश्वास बन जाता है। इसी विश्वास से मनुष्य मे सदा हिम्मत रहती है। श्वास को पकडे रखना और बरमे रहना जीसे आत्म बल भी कहते है यह कोई आसान नहीं होता। इसके लिए मनुष्य को सदा इसके प्रयत्न कोशिशो मे लगा रहना पडता है। तब भी मनुष्य यत्न करते रहता है और इस यत्न का फल तो ईश्वर कृपा से मिलता है। धन्यवाद। शुभ प्रभात।

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