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बुझते दिये / कहानी / लक्ष्मी यादव

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बुझते दिये..... एक सफ़ेद रंग की अम्बेसडर गाडी पंजाब की पक्की सड़कों से होती हुई ... कच्ची सड़क पर आ जाती है। कच्ची सड़क की धूल मिट्टी गाड़ी के श...

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बुझते दिये.....

एक सफ़ेद रंग की अम्बेसडर गाडी पंजाब की पक्की सड़कों से होती हुई ... कच्ची सड़क पर आ जाती है। कच्ची सड़क की धूल मिट्टी गाड़ी के शीशों तक उड़ने लगती हैं। ड्राईवर सीट के पास खुली हुई खिड़की से कुछ धूल गाड़ी के अंदर जाने लगती है जिससे पिछली सीट पर बैठी माँ बेटी और बेटे युवराज को खांसी आ जाती है और आगे की सीट पर बैठे सफ़ेद पैंट शर्ट वाला आदमी ड्राईवर को गाड़ी का शीशा चढाने को कहता है । ड्राईवर गाड़ी का शीशा चढ़ाते हुए शीशे के उस पर से दिख रहे गाँव के लोगों को देखता है जिनमें कुछ बच्चे कुछ बूढ़े कुछ जवान हैं। शीशा चढाने के बाद ड्राईवर गाड़ी की स्पीड बढ़ा देता है।

गाँव के बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लग जाते हैं,गाड़ी गाँव की एक गली में आकर रूकती है। गाड़ी से एक महिला एक लड़का और एक लड़की और सफ़ेद पैंट शर्ट वाला आदमी उतरकर गली में पैदल चलने लगता है। गाँव के कुछ बच्चे उनके पीछे पीछे चल देते हैं कुछ आगे दौड़ जाते हैं।

गगन जो अपने घर के आँगन में लगी चारा काटने की मशीन पर अपने मजदूर से चारा कटवा रहा होता है उसको गाँव के बच्चे बताते हैं कि गगन का बड़ा भाई जसपाल अपने परिवार के साथ आ रहा है ।ये बात सुन टूटी खाट पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते अधेड़ उम्र के बल्ली काका खुश हो जाते हैं कि उनका बेटा शहर से आया है लेकिन कुछ सोच वो अपनी ख़ुशी ज़ाहिर नहीं करते।

रसोई में खाना पकाती गगन की पत्नी कमलिंदर और दो बेटियाँ किरण और काजल तीनों बात करती हैं। कमलिंदर कहती है कि “लो आ गये माँ बाप को देखने के नाम पर अनाज लेने.... कहेंगे माँ की याद आ रही थी तो सोचा गाँव घूम आयें, दो दिन में ही चलते बनेंगे और फिर 6 महीने , साल भर मुंह नहीं दिखायेंगे” कमलिंदर की बात उसकी बूढ़ी सास सुन लेती है और उस पर चिल्लाने लगती है कि उसका बड़ा बेटा बहुत अच्छा है इस बार ज़रूर वो उसको और उसके पति को अपने साथ लेकर जायेगा और उसकी आँखों का इलाज कराएगा पति के पैरों के गठिया का इलाज कराएगा। बूढ़ी अपनी बात जारी रखते हुए अपने कपडे ठीक करती है हाथों से बाल ठीक करती है ... रसोई के पास लगे नल के पास जाकर हाथों से टटोलते हुए बाल्टी से पानी लेकर हाथ मुंह धोती है ...बूढ़ी का बोलना अभी भी जारी रहता है उसे देख माँ बेटियाँ मुंह बिचकाती हैं। तभी जसपाल अपने परिवार के साथ आ जाता है।

गगन जसपाल गले लगते हैं,कमली अपनी जेठानी के गले लगती है बच्चे आपस में मिलते हैं। जसपाल पिता बल्ली के पैर छूता है तो कांपती टांगों का कम्पन और बढ़ जाता है आँखों का पानी चेहरे की झुर्रियों तक बह आता है होंठ जो बहुत कुछ कहने को होड़ में खुले तो थे लेकिन जाने किस सोच में फिर बंद हो जाते हैं जसपाल भी लगभग आँख चुराता सा पिता की ओर बिना देखे झूठी मुस्कान चेहरे पर चिपका लेता है । हाथों से अपने बेटे को हवा में टटोलते हुए बूढ़ी माँ जसपाल के पास आती है और बेटे के गले लगकर फूट फूटकर रोने लगती है। रोने की आवाज़ सुनकर आँगन में लगी भीड़ और बढ़ जाती है लोग अपने घरों से झांकने लगते हैं जिनको देख गगन माँ को भाई की छाती से लगभग खींचते हुए अलग कर झूठी हंसी हँसते हुए खाट पर बिठा देता है । जसपाल माँ के गले लगने से सिकुड़ गयी सफ़ेद शर्ट ठीक करने लगता है । कमली की बेटियां हाथों में शरबत की ट्रे लिए आ जाती हैं। सभी शरबत पीते हैं और बातें करते हैं तभी गगन का बेटा जो गाँव में खेलने गया था वो भी आ जाता है ।बातचीत का सिलसिला जारी रहता है।

अगले दो दिन जसपाल अपने हिस्से के खेत के अनाज का हिसाब किताब देखकर मजदूर से अनाज बोरियों में पैक करवाता है। माँ बाप के साथ घर में समय बीतता है गगन और जसपाल के बच्चे भी आपस में अच्छा समय बिताते हैं। दो दिन बीतने के बाद जब जसपाल अपने परिवार के साथ वापस शहर जाने लगता है तो बूढ़ी माँ एक पोटली में अपने कपडे बांधे हुए उनके साथ जाने को तैयार हो जाती है जिसको बल्ली बहुत डाटते हैं लेकिन वो नहीं मानती घर की चौखट पर जिद करके बैठ जाती है ।जसपाल धर्मसंकट में पड़ जाता है जसपाल की पत्नी और बच्चों की तो जैसे सांस ही अटक जाती है बड़ी मुश्किल से गगन के समझाने पर बूढ़ी मानती है..गगन भाई के परिवार को गाड़ी तक छोड़ने जाता है... गाडी धूल उड़ाती हुई चल देती है । बूढ़ी आगे बढ़ती गाडी की आवाज़ सुनकर रोते हुए पंजाबी में दुखभरा गीत कांपती आवाज़ में गुनगुनाती है । बल्ली घर के बाहर खड़ा दूर जाती गाडी को देखता रह जाता है गाडी उसकी आँखों से ओझल हो जाती है ।

घर के दोनों बुजुर्ग जिनके दो जवान बेटों के होते हुए भी उन दोनों के बारे में सोचने वाला कोई नहीं... बड़ा बेटा साल में एक बार देखने आता है । बहू छोटी घर की जूठन तक अपने सास ससुर को खिलने लगती है ।घर में किसी को फुर्सत ही नहीं होती कि दोनों की कोई सुध लें सब अपने अपने काम में मगन रहने लगते हैं ।धीरे धीरे दोनों बुजुर्गों का बुढ़ापा और बढ़ने लगता है ...बूढ़े बल्ली का गठिया और बूढ़ी अमरिंदर का मोतियाबिंद और बढ़ने लगता है जिससे घर वाले परेशान रहने लगते हैं और रोज़ ही दोनों के मरने की दुआएं मांगने लगते हैं । दो वक़्त की रोटी देना और उन दोनों का ध्यान रखना भी परिवार को महंगा पड़ने लगता है। उस पर दोनों की दवाइयों का खर्च भी गगन को बोझ लगने लगता है । गगन जब पत्नी की हाय हाय से तंग आ जाता है तो बड़े भाई को फ़ोन करके माँ बाप को ले जाकर कुछ दिन अपने पास रखने को कहता है तो उस दिन के बाद से तो बड़ा भाई गगन का फ़ोन तक उठाना बंद कर देता है । गगन और उसकी पत्नी को जब बूढ़ा बूढ़ी से छुटकारे का कोई साधन नहीं दिखता तो एक दिन गगन और उसकी पत्नी बल्ली को डॉ. के पास ले जाने के नाम पर गाँव के बाहर अपने ही खेत में बनी छोटी सी झोपडी में ले जाते हैं और बल्ली को झोपडी में कड़कड़ाती ठंड में उसके कम्बल के बिना छोड़ बाहर से कुण्डी लगा देते हैं ।गगन और उसकी पत्नी गाँव में बात फैला देते हैं की बल्ली कही चला गया । अगले रोज़ गगन खुद ही झोपडी से बल्ली की लाश निकालकर रोने धोने का नाटक करता है। गाँव के भोले भाले लोगों को को गगन की बात सच लगती है की बल्ली ने खुद को ख़त्म करने के लिए खुद को ही झोपडी में बंद कर लिया होगा ।बल्ली की मौत की खबर से अमरिंदर तो बिलकुल टूट ही जाती है ।

बड़ा बेटा बाप के मरने की खबर सुन अपनी सफ़ेद अम्बेसडर से आता है ।पिता की सजती अर्थी के वक़्त गगन और जसपाल अपने खेत घर के बटवारे को लेकर लड़ पड़ते हैं जिनको गाँव वाले समझाते हैं । जसपाल की पत्नी जसपाल को समझती है कि प्यार से ही भाई को बुद्धू बनाकर घर का बटवारा करा लो वरना कुछ नहीं मिलेगा । बाप की चिता जलने के बाद बड़ा बेटा वापस चला जाता हैं। इस बार अमरिंदर बेटे के साथ जाने की जिद नहीं करती ।

देखते देखते कई साल बीत जाते हैं लेकिन बूढ़ी अमरिंदर नहीं मरती ।बड़ा भाई बार बार गगन से घर के बटवारे को लेकर बात करता है लेकिन गगन बार बार यही कहता है की वो बटवारा नहीं करेगा। समय बीतता है ..गगन अपनी बेटी की शादी बड़ी धूमधाम से करता है बूढ़ी अमरिंदर को धडी ब्याह के गीत गाने का बड़ा शौक होता है वो अपनी पोती की शादी में खूब जी भरकर गाना गाती है ढोल की धुन पर नाचती है उसको बल्ली उसके साथ नाचते नज़र आते हैं । मारे ख़ुशी के बूढ़ी के दिल की धड़कन ही रुक जाती है । सब बूढ़ी को मरा समझ रोने गाने लगते हैं उसकी अर्थी सजाने की तैयारी होती है ।गगन को दुःख होता है की उसकी बेटी की शादी के बीच में बूढ़ी टपक गयी लेकिन कमली खुश होती है एक बोझ उसके सर से उतर गया । अर्थी पर लिटाते ही बूढ़ी उठकर बैठ जाती है । ये देख सभी हैरान हो जाते है ।

मर कर जी चुकी बूढ़ी अमरिंदर किसी कुरीति के कारण मनहूस मान ली जाती है। गाँव में ये मानते हैं कि जो एक बार मरकर जी उठता है वो मनहूस हो जाता है कई जानों को ले लेने के बाद उसकी आत्मा को शरीर से मुक्ति मिलती है । बूढ़ी को अब घरवाले तो क्या गाँव वालों के भी ताने सुनने पड़ते हैं । कोई सुबह उठकर बूढ़ी का मुंह नहीं देखता अंधी बूढ़ी अपनी कोठरी के अँधेरे में कैद हो जाती है । दिन के उजाले में उसे कोई नहीं देखता और रात को तो वो किसी को दिखाई ही नहीं देती । अमरिंदर बल्ली को याद करते हुए अपनी जिंदगी के दिन गिनने लगती है ।

बड़े भाई जसपाल के समझाने और शहर में अच्छा काम दिलाने के लालच में गगन घर बेच भाई के पास शहर चला जाता है सबको अपने साथ लेकर। बहुत समय बाद जसपाल गगन को एक छोटा सा घर दिलाता है और एक फार्म हाउस में ट्रक्टर ड्राईवर की नौकरी दिलाता है । शहर आकर अमरिंदर जसपाल के पास भी रहती है और गगन के पास भी लेकिन कोई उसे नहीं मानता । गगन के नौकरी पर जाने के बाद अक्सर कमली बच्चों के साथ घूमने चली जाती और घर में ताला लगाकर बूढ़ी अंधी अमरिंदर को घर की चौखट के बाहर पड़ी खाट पर पर अकेला छोड़ जाती। बाहरी गेट पर भी ताला रहता है । दिन भर बूढ़ी अकेली रहती । भूख लगने पर रोटी चिल्लाती लेकिन कोई उसकी आवाज़ नहीं सुनता । अमरिंदर किसी तरह गेट तक आती और खाना खाना चिल्लाती तो रास्ते से गुजरता कोई कभी कुछ कभी पकड़ा जाता,जब पड़ोसी अमरिंदर की इन हरकतों के बारे में गगन और कमली को बताने लगे तो कमली बूढ़ी को घर के स्टोररूम में बंद कर देती है जहां दम घुटने से बूढ़ी की मौत हो जाती है । इस तरह एक घर के दो बुजुर्ग जिन्होंने अपने प्यार मेहनत और अरमानों से सजाया था उनको ही उनके बुढ़ापे में अनचाहे रिश्ते की तरह एक बोझ की तरह बना दिया उनके ही बेटों ने खून के रिश्तों ने ..ऐसे ही न जाने कितने ही बल्ली और न जाने कितनी अमरिंदर रोज ही मौत की भट्ठी में गिरती हैं या गिरा दी जाती हैं .... ।

लक्ष्मी यादव

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रचनाकार: बुझते दिये / कहानी / लक्ष्मी यादव
बुझते दिये / कहानी / लक्ष्मी यादव
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