व्यंग्य-राग (२०) / कम-ज़-कम / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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कमबख्त, क्या वक्त आगया है ! जिसे देखो पीछे पडा है। उस दिन चेक-अप के लिए डाक्टर के पास गया| बोले क्या तकलीफ है ? तकलीफ तो कुछ नहीं डाक्टर, बस चलता हूँ तो थोड़ा हांप सा जाता हूँ। कहने लगे, आप अपना यह वज़न थोड़ा कम करिए। तोंद आपकी बहुत बढ़ गई है।

छुटपन में बड़ा दुबला-पतला था और मेरी यह हसरत थी कि आदमी के थोड़ी सी तोंद तो होना ही चाहिए। बस इतनी भर कि वह उसपर कागज़ रखकर दस्तखत मार सके। ईश्वर ने मेरी सुन ली और मेरी दोनों ही ख्वाहिशें पूरी कर दीं। मोटा-ताज़ा भी हो गया और तोंद भी निकल आई। कागज़ उस पर रखकर खड़े खड़े हस्ताक्षर तो कर ही देता हूँ। बचपन से सुनता आरहा हूँ, कम खाना और गम खाना सेहत के लिए अच्छा होता है। जबतक कम खाया और गम खाया दुबला-पतला ही रहा। अब आप ही बताइये गम खाकर भी क्या कोई तंदुरुस्त रह सकता है? मैं अपनी तंदुरुस्ती का सत्यानाश नहीं करना चाहता। लेकिन लोग पीछे पड़े हैं।

कम खाना और गम खाना तो मुहावरा अपनी जगह है ही; मेरी बेटी जब से “चीनी कम” नाम की पिक्चर क्या देख आई है बराबर मुझसे आग्रह कर रही है कि पापा, आपको चीनी तो कम कर ही देनी चाहिए। अब चीनी कम कर दूँगा तो खाने को बचेगा ही क्या? रसगुल्ले से लेकर रसमलाई तक, सारी मिठाइयां बंद। केलों से लेकर आम तक सभी फलों की मुमानियत – फिर बचा क्या ? डाक्टर कहता है कि आपकी शुगर बोर्डर लाइन पर है। माना, पर पाकिस्तानियों की तरह अभी अन्दर तो नहीं घुस आई है ! भारत दुश्मन से लड़ना अच्छी तरह जानता है। जब मौक़ा आएगा, दिखा दूँगा। अभी तो चैन से रह लेने दो भाई !

थोड़ा तंदुरुस्त क्या हो गया हूँ, जब देखो डाक्टरी जांच शुरू हो जाती है। पिछली बार थोड़ा रक्त चाप बढ़ा हुआ निकला। ज़मीन आसमान एक हो गया। नहीं, ऐसे नहीं चलेगा। आपको अपनी केयर करनी चाहिए। नियम से खाने के लिए दो दवाइयां लिख दी गईं। चलो गनीमत है। लेकिन साथ ही यह परामर्श भी नत्थी कर दिया गया कि नमक कम खाइए। बड़े-बूढों के मुहावरे ने गम खाने की सिफारिश करते हुए “कम खाना” बताया ; बेटी ने पिक्चर देख कर चीनी कम करवा दी और अब ये डाक्टर “स्ट्रोक” का डर बैठाकर नमक कम करने को कहता है। मेरे एक परम मित्र हैं। गांधीवादी हैं। बोले, कम करके तो देखिए। खाने में नमक का ऐसा आतंक है कि उसने हमारे सभी स्वाद ही छीन लिए हैं। नमक थोड़ा कम या ज्यादह पड़ गया तो सब्जी का स्वाद ही गायब हो गया। स्वाद तो जैसे बस नमक का ही है, वही ठीक होना चाहिए। आप नमक छोड़ दें, सब्जी का स्वाद आने लगेगा ! कर के देखिए। मैंने एक बार तीन महीने तक नमक नहीं डाला। खाने में खाने का अपना स्वाद आने लगा था। मैंने अपने मित्र को सलाह देने के लिए शुक्रिया अदा की और धन्य हैं आप, कहकर विदा ले ली।

कहाँ तक लोगों से बहस करता रहूं। मैंने अब बोलना ही कम कर दिया है। वैसे भी बीवी तो मेरी सुनती ही नहीं। शुरू से ‘सुनती हो’ ‘सुनती हो’ कहता चला आ रहा हूँ, आजतक सुनवाई नहीं हुई। कम गो और कम सुखन हो गया हूँ। बड़ा आराम है। लोग कहते रहते हैं और मैं सुनता रहता हूँ। कम नहीं सुनता। सुनता तो बरोबर हूँ। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि अब लोगों को यह भी वहम हो गया है कि मैं सुनता कम हूँ। नहीं भाई, ऐसा नहीं है। सन्ध्या करते समय रोज़ वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करता हूँ – ॐ वाक् वाक् ॐ प्राण: प्राण: ॐ चक्शुश्चक्शु: ॐ शोत्रम श्रोत्रम ... और क्या चाहिए। प्रार्थना में बड़ी शक्ति है। मुझे पूरा विश्वास है मेरे बोलने की, मेरे देखने की, मेरे सुनने की शक्ति कम नहीं होगी। पर मिलने वाले बिना बोले नहीं रहते,कहते हैं- गलतफहमी में मत रहिए। उम्र बढ़ रही है। अभी कम है, फिर कमतर होगी और अंतत: कम्तरीन हो जावेंगीं ये शक्तियां।

माना कम-कस हो गया हूँ। आलसी हूँ ,कामचोर हूँ, लेकिन मुझे ऐसा ही बना रहने दो। कम से कमतर मत करो। पात्र लिखने की पुरानी पद्धति अपना रहा हूँ। कम लिखे को ज्यादह समझना।

-सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

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2 टिप्पणियाँ "व्यंग्य-राग (२०) / कम-ज़-कम / डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत सुन्दर व्यंग है ..डॉक्टर शर्मा जी "कम-ज़-कम"...बड़ी उम्र में सभी अपने पराये मुफ़्त की सलाह देने लगते हैं और यह सिद्ध करना चाहते हैं कि वे आपसे बड़े आपके हितैषी हैं..मैं स्वयं इन्ही परिस्थितियों से गुज़र रहा हूँ अतः समझ सकता हूँ ..कि यह व्यंग नहीं आपबीती है..एक अच्छी रचना के लिये बधाई

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  2. बहुत सुन्दर व्यंग है ..डॉक्टर शर्मा जी "कम-ज़-कम"...बड़ी उम्र में सभी अपने पराये मुफ़्त की सलाह देने लगते हैं और यह सिद्ध करना चाहते हैं कि वे आपसे बड़े आपके हितैषी हैं..मैं स्वयं इन्ही परिस्थितियों से गुज़र रहा अतः समझ सकता हूँ ..कि यह व्यंग नहीं आपबीती है..एक अच्छी रचना के लिये बधाई

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