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गौरैया लौट आई / बाल कहानी / शालिनी मुखरैया

'' अरी गुड़िया इधर आना जरा । जा दौड़ कर चिडिया की गुल्लक ले आ ''

माँ ने गेहूँ फटकते हुए मुझे आवाज लगायी । अपना खेल छोड़ कर आना मुझे सबसे बुरा काम लगता ।

'' क्या है मां, जब देखो तब खेल के बीच में बुलाती हो '

मैंने बड़े बेमन से चिड़िया की गुल्लक ला कर दी । माँ का यह नियम था कि जब भी वह गेहूं, चावल या दाल फटकती तो किनकी सहेजकर गुल्लक में रख देती है । उनका यह रोज का नियम था चिड़ियों को दाना डालने का । हर रोज गौरैयाएं माँ के डाले गये दानों का बेसब्री से इंतजार करती । जरा भी देर हो जाती तो अपनी '' चीची ' से आसमान सर पर उठा लेती । वर्षों तक उनका यह नियम चलता रहा । माँ जब तक जिंदा रहीं तब तक वो और उनकी गौरैयों उनका यह रिश्ता अनवरत बना रहा । उनके जाने के बाद घर के लोग तो दुखी थे ही मगन उससे कहीं ज्यादा दुख शायद उनकी पाली-पोसी गौरैयाओं को भी था मगर यह उस वक्त कोई नहीं जान पाया था ।

'' मेरी नन्हीं गौरैया आना आकर दाने खाना

खा कर मेरे दानों को अपनी दुआ दे जाना ''

यह गीत सदा मेरे मन में गुँजता रहता । विवाह के पश्चात मैं अपने पति के साथ दिल्ली आ गई । महानगरीय जीवन की भागदौड़ में नन्हीं गौरैया की याद मानो कहीं पीछे छूट गई थी । आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में इन्सान अपने जीवन की सरसता को भुला बैठा है । वह इस चकाचौंध से इतना भ्रमित है कि छोटी छोटी चीजों से प्राप्त खुशियाँ उसके लिए कोई मायने नहीं रखतीं । घर परिवार की व्यवस्था में किसी और चीज का ध्यान ही नहीं रहा था ।

'' माँ यह गौरैया क्या होती है' ' स्कूल से आ कर मेरी नन्हीं बेटी रूही ने मुझसे प्रश्न पूछा ।

मानो वर्षों से धूल पड़ी स्मृतिपटल की यादों को किसी ने कुरेद दिया हो । माँ का वर्षों पुराना गीत याद आ गया । माँ की याद में आखों के कोर भीग गए । रूही असमंजस भरी निगाहों में मुझे देखने लगी । मैंने तुरंत अपनी आंख में आए आँसुओं को पोंछ लिया ।

आज स्कूल में टीचर ने ' विश्व गौरैया दिवस ' के बारे में बताया था '' नन्ही रूही अपनी धुन में ठुनकते हुए बोली ।

माँ ये गौरैया कैसी होती है' ।

मानसपटल पर चहचहाती हुई गौरैयाओं का समूल जीवंत हो उठ । मैं उत्साह से अपनी बिटिया को उसकी नानी एवं गोरैयाओं का किस्सा सुनाने लगी ।

' माँ अब गौरैया नहीं आयेगी क्या '' रूही के इस प्रश्न का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था ।

हमारे आधुनिक जीवनशैली की सबसे बड़ी कीमत इन मूक प्राणियों ने चुकाई है । आज तक इस विषय पर मनुष्य ने कभी गंभीरता से विचार नहीं किया है । वह यह नहीं सोचता है कि अगर प्रकृति की देन ही नष्ट हो गई तो स्वयं कैसे जीवित रह पायेगा ।

' माँ मैं भी नानी की तरह दाने रखा करूँगी ' रूही ने मचलते हुए कहा 1

' मगर बेटा यहाँ आसपास कोई गौरैया नहीं रहती ' ' मैंने उसे प्यार से समझाना चाहा । मगर उसकी बालहठ के आगे मेरी एक न चली ।

अच्छा ठीक है, जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा ' मैंने उसे आश्वासन दिया ।

बाजार से दलिया लाकर बाहर मुंडेर पर फैला दिया । कई दिन गुजर गए कोई गौरैया नहीं आई । रूही उदास मन से गौरैया का इंतजार करती मगर गौरैया के लिए दाना डालना नहीं भूलती । एक विश्वास उसके मनमें था कि गौरैया अवश्य आयेगी

' माँ जरा देखो तो कौन आया है' ' रूही की चहकती हुई आवाज आई ।

मैं रसोई में खाना पका रही थी । रूही मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खींचती हुई ले गई और मुझे शोर न मचाने का इशारा कर रही थी ।n

मैं । कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थी ।

' ' वो देखो '' रूही की खो में अनोखी चमक थी ।

गौरेया का एक जोड़ा मुंडेर पर फैले दानों को खाने में व्यस्त था । रूही का विश्वास रंग लाया था । वह गौरैया का जोड़ा अब रोज आने लगा था । धीरे धीरे अब अन्य जोड़े भी उनके साथ नजर आने लगे थे 1 मुझे लगा कि उन गौरैयाओं के साथ मेरी माँ भी वापस लौट आई है । उनका गीत पुन : मेरे मन में जीवंत हो उठा था.....

' 'मेरी नन्हीं गौरैया आना

आ कर दाने खाना

खा कर मेरे दानों को

अपनी दुआ दे जाना ' '

--

शालिनी मुखरैया, सीटीओ ' बी ' शाखा श्री वार्ष्णेय डिग्री कालेज अलीगढ़

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बहुत अच्छी बालकथा है । बधाई । छोटे बच्चों की अंतर्जाल निशुल्क पत्रिका ' नाना की पिटारी " मे अपनी रचनाओं को भेजिए । email पता है nanakipitari@gmail.com

आपके उत्साहवर्धन के लिये धन्यवाद

प्रेम के भूखे जीव-जंतु हो या इंसान सभी होते हैं
बहुत सुन्दर प्रेरक कथा

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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