सोमवार, 6 जून 2016

सोशल मीडिया के हत्यारे नकलची, आवारा और सनकी - डॉ. दीपक आचार्य

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आम आदमी को अपने मन की बात कहने, मन में उमड़ने वाली कल्पनाओं की उड़ान से जगत को साक्षात कराने, अपनी प्रतिभाओं के सार्वजनिक प्राकट्य, दिल की हसरतों, दिमाग की सोच  आदि से रूबरू कराने से लेकर भड़ास निकालने तक के लिए सहज, सर्वसुलभ और बिना किसी नियंत्रण का बहुत बड़ा और उदारवादी फ्रीस्टाईल मंच है - सोशल मीडिया।

लेकिन आजकल देखा यह जा रहा है कि यह सोशल कम नज़र आता है। हालांकि सोशल मीडिया पर विद्वत्तापूर्ण सामग्री, व्यक्ति से परिवेश और समग्र जीवन तक के बारे में सर्वांग बहुमूल्य जानकारी, अपने फन में माहिर जानकारों के विचारों और स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक की जानकारी का समावेश भी दिखाई देता है लेकिन अधिकांश मामलों में सोशल मीडिया पर इन दिनों जो कुछ चल रहा है उसे देख न रोया जा सकता है, न हास्य निकल सकता है।

दया, करुणा और क्षमा के भाव अधिक आते हैं क्योंकि जो लोग ऎसा कर रहे हैं वे नहीं जानते कि उनके कारण से सोशल मीडिया और समाज को कितना कुछ प्राप्त हो रहा है। सोशल मीडिया पर एक तो उन लोगों की भी भरमार हो गई है जिन्हें इस मंच के उद्देश्य और उपयोगिता के बारे में जानकारी नहीं है।

लगता यों है कि जैसे सड़कों और गलियों-चौबारों में आवारागर्दी और धींगामस्ती करने वालों की पूरी की पूरी फौज सोशल मीडिया के मैदान में घुसपैठ कर सीटियां बजा-बजा कर दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। 

बेवक्त और बेमकसद पैदा हो गए इन उद्देश्यहीन लोगों द्वारा परोसी जा रही सामग्री को देख कर दया आती है। अधिकांश लोग बस या रेल्वे स्टेशन के कुलियों, बंदरगाह पर लदान करने वालों, डाकियों या कि हवाला कारोबारियों के दलालों की तरह एक जगह से फोटो-सामग्री उठाकर अपनी या दूसरों की टाईम लाईन पर फोरवर्ड या शेयर कर देने का ही काम करते हैं जैसे कि पहले जन्म में ट्रकों और टर्बों, बैलगाड़ियों या ऊँटगाड़ियों से सामान के लदान करने वाले रहे हों। 

बात फेसबुक की हो, व्हाट्सएप की या और किसी भी सोशल साईट की। सब तरह आजकल यही हो रहा है। दो-तीन फीसदी लोग ऎसे होंगे जो अपनी ओर से मौलिक विचार लिखते होंगे अन्यथा 90 फीसदी लोग लाईक, फोरवर्ड या शेयर ही कर रहे हैं। सभी को यह भ्रम है कि सबसे पहले वे ही इस विषय को छू रहे हैं।

और इनमें भी बहुत से उस्ताद हैं जो सामग्री चुरा कर अपने नाम से चस्पा कर देने के गोरखधंधे में रमे हुए हैं जैसे कि बहुत बड़े विद्वान, चिकित्सक या दुनिया के समस्त विषयों के अद्वितीय ज्ञाता ही हों।

अधिकांश लोग इतने धार्मिक हैं कि भगवान के फोटो एक से दूसरी जगहों पर धड़ाधड़ पोस्ट करते रहते हैं। जितनी बड़ी संख्या में भगवान के फोटो, स्तुतियां और मंत्र रोजाना सोशल मीडिया पर आ रहे हैं उन्हें देख कभी-कभी तो यह भ्रम हो जाता है कि हम सत युग में तो नहीं आ गए।

पता नहीं देश में इतनी विशाल संख्या में आस्तिक धर्मावलम्बी होने के बावजूद भ्रष्टाचार, अनाचार और बेईमानी क्यों है। इतनी ही तादाद में उपदेशों, बोध वाक्यों की भरमार है। सेल्फि वालों की धमाल भी कोई कम नहीं। फिर शेरो-शायरियों और कविताओं की बरसात करने वाले बादलों का कहना ही क्या। कितना अच्छा हो यदि ये लोग अपनी ही लिखी रचनाएं पोस्ट करें। वैसे भी इन्टरनेट की कृपा से इस देश में मौलिक रचनाधर्मियों का अकाल देखा जा रहा है।

फेसबुक के समूह हों या व्हाट्सएप के, बहुत से लोग कई समूहों में साथ-साथ हैं और ऎसे में ये लोग एक ही फोटो/विचार या सामग्री सारे समूहों में एक साथ दाग कर मस्त हो जाते हैं। अब संकट ये हो गया है कि एक आदमी कितना पढ़े, किस-किस मैसेज को पढ़े और क्यों पढ़े। 

किसी समूह  में किसी को भी जोड़ देने का जो मौलिक अधिकार दुनिया के सभी लोगों को दे रखा हुआ है उसका कहर हर अक्सर देखने को मिल ही जाता है। समूह से हट जाओ, तो लोग आँखें लाल कर लेते हैं, संबंधों के सच को परिभाषित करने पर आ जाते हैं।

फिर आजकल हर इंसान को व्हाट्सएप पर समूह बनाने का ऎसा भूत सवार हो गया है कि हर कोई अपना समूह बनाकर खुद की कंपनी या काईन हाउस की तरह इसका इस्तेमाल आरंभ कर देता है। उसे सामने वालों से कोई सरोकार नहीं होता।

कई समूह कूड़ाघर की तरह हो गए हैं। ऎसे में एकाध ढंग की पोस्ट आ भी जाए तो कूड़े में दब जाती है। व्हाट्सअप पर ग्रुप बनाने का अपना खास उद्देश्य और लक्ष्य है मगर आजकल  गुड़गोबर हो गया है। इस डंपिंग यार्ड में दुनिया भर का सारा कचरा इकट्ठा होता रहेगा, सोलिड या लिक्विड़ कोई सा हो। 

भगवान के फोटो, अंधविश्वास, सेहत, शेरों-शायरियों, फालतू की चर्चाओं, टाईमवेस्ट करने वाली अनुत्पादक सामग्री, गुड मॉर्निंग, गुड नाईट, बधाई और शोक संवेदनाओं आदि का अविराम क्रम बना रहता है। फिर एकाध ने कोई पोस्ट शुरू कर दी तो दूसरे लोग भेड़ों की रेवड की तरह इसे अच्छी-बुरी बताते हुए दो दिन गुजार देंगे।

हद तो तब होती है जब व्हाट्सएप पर किसी समूह में एक जना किसी की मृत्यु पर शोक संवेदना या श्रद्धान्जलि जताता है और फिर अचानक कोई बधाई वाली पोस्ट आ जाए। इसके बाद जो पोस्ट्स आती रहती हैं उनसे पता ही नहीं चलता कि बधाई और शोक किस के लिए है।

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हम सभी सामाजिक लोगों को अपने वैचारिक संग्रह से यश पाने का भूत सवार है और हमें एक स्थान ऎसा मिल गया है जहां हम उन्मुक्त होकर कुछ भी डाल सकते हैं, परेशानी हमारे मित्रों को है, हमें क्या लेना-देना।  नए लोगों पर भूत सवार है और अनुभवी लोगों को लगता है कि अब सोशल मीडिया की हत्या के लिए बहुत से ऎसे लोगों का जमघट लगने लगा है जिन्हें बिना मेहनत के प्रतिष्ठा और यश पाने को आतुर, सनकी, आवारा, नासमझ, टाईमपासर, नकलची आदि किसी भी श्रेणी में रखा जा सकता है।

इन लोगों ने सोशल मीडिया का कबाड़ा करके रख दिया है।  अपने जीवन की हर गतिविधि, घटना और विचार को उद्देश्यपरक बनाएं और मिशन भावना  से काम करें। टाईमपास जिन्दगी न खुद जियें, न औरों के वक्त पर डकैती डालें। समाज और देश के लिए समय निकालें और दूसरे लोगों को भी उलझाये न रखें ताकि वे कुछ कर सकें।

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