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गिद्दे की मस्ती नहीं है 'उड़ता पंजाब' / वीणा भाटिया

फिल्मों में हम अब तक अक्सर रंग-बिरंगे पंजाब को ही देखते आए हैं। गिद्दे की मस्ती, सरसों-गेहूं के खेत और पंजाब का लोक-लुभावन संगीत। 'उड़ता पंजाब' में इससे एकदम उलट है। काफी विवाद के बाद आई इस फिल्म में पंजाब की वह हक़ीक़त बयां की गई है, जिससे सिनेमा के दर्शक अब तक अनजान थे। समृद्ध पंजाब, पंचनदियों का प्यारा पंजाब पिछले कुछ समय से नशे के जाल में फंस गया है। पंजाब के घर-घर में ड्रग्स की पैठ हो चुकी है। पंजाब की युवा पीढ़ी पूरी तरह से ड्रग्स के चंगुल में फंस गई है। जैसी रिपोर्टें आई हैं, पंजाब में 8.6 लाख लोग ड्रग्स लेते हैं। 2.3 लाख लोगों को इसकी लत है। 89 फीसदी पढ़े-लिखे युवा नशे की गिरफ्त में हैं। 6000 करोड़ से ज्यादा की ड्रग्स पिछले पांच साल में यहां से पकड़ी गई है। नशे के कारोबार से जुड़े 17 हजार लोगों को 2013-14 में भारी दबाव के बाद गिरफ्तार किया गया था। 338 तस्करों की 80 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी 2014 में ही जब्त की गई थी। गांजे और भुक्का से शुरू हुआ नशा अब सिंथेटिक ड्रग्स तक पहुंच चुका है। कहने की ज़रूरत नहीं कि ड्रग्स का इतने बड़े पैमाने पर कारोबार बिना राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण के नहीं चल सकता है। पंजाब में बड़े पैमाने पर बिहार और यूपी के खेत मज़दूर जाते हैं और वे नशे के आदी हो जाते हैं।

कुल मिलाकर, नशे के जाल में पूरा पंजाब फंस चुका है। इसी पृष्ठभूमि पर चर्चित फिल्मकार अनुराग कश्यप ने 'उड़ता पंजाब' फिल्म बनाई, जिसका निर्देशन अभिषेक चौबे ने किया है। फिल्म पंजाब में नशे को कारोबार के जाल को उधेड़ती है। इसमें सरहद पार से कोकीन-हेरोइन और दूसरे ड्रग्स की तस्करी, इस कारोबार में राजनेताओं और पुलिस की मिलीभगत को दिखाया गया है। साथ ही, युवाओं को इससे मुक्त करने का संदेश भी इस फिल्म में है। फिल्म के मुख्य किरदार हैं रॉकस्टार टॉमी सिंह (शाहिद कपूर), खेतों में काम करने वाली बिहारी मज़दूर पिंकी (आलिया भट्ट), एएसआई सरताज सिंह (दिलजीत दोसांझ) और नशे के खिलाफ अभियान चला रही डॉ. प्रीत साहनी (करीना कपूर)। टॉमी सिंह ड्रग्स के नशे में धुत्त रहता है और अपने गीतों के कारण युवाओं में काफी लोकप्रिय है। युवा उसे अपना आदर्श मानते हैं। इधर, बिहार से आई डिस्ट्रिक्ट लेवल हॉकी चैम्पियन पिंकी अपने हालात के कारण खेतों में मज़दूरी करने को मज़बूर होती है और ड्रग्स की लत का शिकार हो जाती है। सरताज सिंह एएसआई ड्रग्स तस्करों से हफ्तावसूली करता है, लेकिन उसका भाई भी ड्रग्स के चंगुल में फंस जाता है। डॉ. प्रीत पंजाब को नशामुक्त करने के अपने अभियान को चला रही है। फिल्म की कहानी में कई ट्विस्ट्स हैं और अंतत: कहानी अपने अंजाम तक पहुंचती है। कुल मिलाकर, कहानी नशामुक्ति का संदेश दे पाने में सक्षम है।

शाहिद कपूर ने एक ड्रग एडिक्ट रॉकस्टार की भूमिका का निर्वाह बहुत ही सधे ढंग से किया है। सबसे बेहतरीन अभिनय आलिया भट्ट ने किया है। पहली बार लीक से हट कर उनका काम सामने आया है। बिहारी मज़दूर के रोल में वाकई उन्होंने जान फूंक दी है। करीना कपूर का अभिनय भी बेहतरीन है। अन्य कलाकारों का काम भी संतोषजनक है। अभिषेक चौबे लीक से हट कर फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। फिल्म के जरिए सही संदेश देने में वे सफल रहे हैं। फिल्म पंजाब के समाज को आईना दिखाती है। यह यथार्थवादी और डार्क शेड की फिल्म है। कुछ दृश्य अवश्य ठूंसे हुए प्रतीत होते हैं। वहीं, गालियों की भरमार कई जगहों पर अनावश्यक लगती है। गीत-संगीत कहानी के मिजाज के अनुसार है। सिनेमैटोग्राफी भी आकर्षक है। फिल्म दर्शकों को पसंद आ रही है और विदेशों में भी इसे देखा जा रहा है।

बहरहाल, रिलीज के पहले फिल्म चर्चा में इसलिए आ गई कि सेंसर बोर्ड ने जैसा कि कहा गया, राजनीतिक वजहों से इसे रोकने की कोशिश की और मामला कोर्ट में चला गया। सेंसर बोर्ड ने तो फिल्म के 89 दृश्यों को काटने के लिए कहा था, पर बाद में कोर्ट के आदेश पर एक कट और तीन डिस्क्लेमर के साथ फिल्म रिलीज हुई। कहा जा रहा था कि पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह फिल्म बनाई गई है और इससे सत्ताधारी पार्टी को नुकसान पहुंच सकता है, क्योंकि फिल्म में ड्रग्स तस्करों और राजनीतिक नेताओं के नेक्सस को दिखाया गया है। दरअसल, यह एक सतही बात थी। कोई भी पार्टी सत्ता में हो, पंजाब में ड्रग्स पर रोक नहीं लगती और इसके लिए बड़ा अभियान नहीं चलाया जाता तो पंजाब की पंजाबियत नहीं रह सकेगी। पंजाब की पंजाबियत और युवा पीढ़ी को बचाना है तो उसे ड्रग्स के चंगुल से मुक्त कराना होगा। कोई फिल्म यह संदेश देती है तो वह स्वागत के योग्य और सराहनीय है।

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