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अर्थहीन है बधाई और श्रद्धांजलि - डॉ. दीपक आचार्य

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आजकल सबसे सस्ता, सहज और सुलभ कुछ है तो वह है बधाई और शुभकामनाएं दे डालना या कि श्रद्धान्जलि व्यक्त कर डालना। इसमें हमारा न ज्यादा कुछ परिश्रम होता है, न पैसा-टका खर्च होता है। फिर फेसबुक, व्हाट्सएप पर या अन्य सोशल साईट्स पर ठाले बैठे हों और अचानक ऎसा कोई दिख जाए तो धड़ाधड़ शुरू हो जाते हैं बधाईयां और शुभकामनाएं देने का सिलसिला।

और किसी की मृत्यु या पुण्यतिथि वाली कोई पोस्ट आ जाए तो शुरू होने लगती है बारिश श्रद्धांजलि, आरआईपी और ढेरों तरह की संवेदनाओं की। एक पोस्ट आती है बधाई या शुभकामनाओं की अथवा कि श्रद्धान्जलि की, कि धड़ाधड़ भेड़चालिया इंसान भी जुड़ते चले जाते हैं चाहे वे उन लोगों को जानते तक नहीं हों जिनका जिक्र हो रहा हो। सारे ग्रुप इसी काम में भरे पड़े रहते हैं।

आजकल सभी तरफ  भेड़छापों की जबर्दस्त श्रृंखलाएं बनी रहने लगी हैं। एक ने शुरू किया नहीं कि शाम तक पूँछ लम्बी होती चली जाती है। अधिकांश लोगों के लिए यह उनकी दिनचर्या में ही शामिल हो गया है। दिन-रात इसी में लगते रहते हैं।

जीते जी चाहे किसी को तवज्जों न दी हो मगर मरने के बाद सारी ही भीड़ ऎसे पीछे पड़ जाती है कि जैसे इनके प्रति श्रद्धान्जलि व्यक्त करते रहकर सर्वशक्तिमान से इनके मोक्ष की प्रार्थना के लिए कोई अनुष्ठान ही हो रहा हो।

परिजन और पोस्ट कर्ता खुद भी यह जानकर हैरान हो जाता है कि इतने सारे लोगों की श्रद्धान्जलि कैसे। कई मर्तबा तो श्रद्धान्जलियों की पोस्ट पढ़ने और लम्बी श्रृंखला को देखने के बाद पता चलता है कि मृतात्मा का परिचय क्षेत्र कितना विस्तृत था जिसका जीते जी पता भी नहीं लग सका।

यह तो गनीमत है कि सोशल साईट्स पर मुण्डन और तर्पण का कोई चिह्न नहीं है अन्यथा ढेर सारे लोग श्रद्धान्जलि देने के साथ यह भी कर लें। किसी भी इंसान के जीते जी जितने लोग पसंद नहीं करते, कद्र नहीं करते उनसे दस गुना श्रद्धान्जलि देने वाले मिल जाते हैं। 

असल में श्रद्धान्जलि अनचाहे भी देने की विवशता रहती है कि कहीं परिजन, मित्र या सम्पर्कित बुरा न मान जाएं।  कई बार लोग पड़ोस में रहने वालों और रोज मिलने वालों को दुआ-सलाम करने या बातचीत से हिचकते हैं मगर मर जाने के बाद जाने कैसे-कैसे फोटो और संकेतों के साथ श्रद्धान्जलि देने में सबसे आगे रहते हैं, यह इंसानी मनोविज्ञान रहस्य का विषय है।

इन लोगों को पता नहीं है कि यदि हम जीते जी लोगों की कद्र करना सीख जाएं तो ये लोग शायद और अधिक समय तक जिन्दा रह पाते।

यही स्थिति बधाईयों और शुभकामनाओं की है। जन्मदिन, मैरिज एनिवर्सरी, कोई उपलब्धि, परीक्षा में सफलता, नौकरी, पुरस्कार, अभिनंदन, सम्मान आदि की कोई बात सामने आते ही पूरा का पूरा रेला टूट पड़ता है बधाई और शुभकामनाएं देने में, जैसे कि कोई वैश्विक प्रतिस्पर्धा हो रही हो जिसमें किसी बड़े पुरस्कार का प्रावधान रखा गया हो।

जिनसे न जान-पहचान है, जिनका हमसे कोई संबंध नहीं है, जो हमारे से कोई सरोकार नहीं रखते, उनके लिए भी भेड़ छाप लोगों का समन्दरी ज्वार आ जाता है।  किसी विशेष उपलब्धि पर बधाईयां देने लोग ऎसे टूट पड़ते हैं जैसे कि इन सफलताओं के पीछे इन्हीं का हाथ हो।

बात चाहे श्रद्धान्जलि की हो या फिर बधाई-शुभकामना की। हमने इसे केवल औपचारिक रूप में ले लिया है। लगता है कि जैसे मुफ्त के प्रसाद का कोई भण्डार अपने पास पड़ा है। दिन-रात बांटते रहो। हमारी हर इच्छा या अभिव्यक्ति अपने साथ ऊर्जा लेकर निकलती है और इसका महत्व तभी है कि जब हम पात्र इंसान के प्रति संवेदना व्यक्त करें, श्रद्धान्जलि दें अथवा बधाई और शुभकामना दें।

जिस किसी को यह प्रसाद बाँटते रहने की हमारी औपचारिक प्रक्रिया ने हमारे शब्दों की शक्ति को समाप्त कर दिया है इसलिए इनका न कोई अर्थ रहा है न कोई प्रभाव। इस मामले में हम सब भीतर से खाली और खोखले हो गए हैं।

केवल लोकाचारों में ही न रमे रहें, अपनी शब्द शक्ति को समझें और इसका समुचित सदुपयोग करें। हमारे आशीर्वाद या संवेदना का कोई अर्थ न हो, तब इनकी अभिव्यक्ति व्यर्थ है। पात्र देखें, औपचारिकता मात्र न निभाएं। जो कुछ करें वह दिल से करें। इस लेख को पूरा पढ़ लेने वालों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। जो इस आलेख के प्रकाशन से पहले ही महाप्रयाण कर चुके हैं उन सभी दिवंगतों को हार्दिक श्रद्धान्जलि।

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