बुधवार, 8 जून 2016

व्यंग्य / भवसागर तरण केन्द्र / वीरेन्द्र 'सरल'

निःसंदेह एक ही स्थान पर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरूद्वारा होना साम्प्रदायिक सदभाव का सर्वोत्तम प्रतीक होता है पर पता नहीं वह स्थान किस भाव को प्रकट कर रहा था जहाँ एक ही स्थान पर क्रमशः सरकारी अस्पताल, नकली दवा की दुकान, चीरघर और मुक्तिधाम बनवाया गया था। यह स्थान किस महान संवेदनहीन व्यक्ति की कल्पना का साकार रूप था यह बिल्कुल भी पता नहीं चल रहा था मगर उस स्थान की प्रसिद्धी प्रान्त की सरहद को पार कर पूरे विश्व में फैल गई थी।

नकली दवा के दुकान के पास एक विशालकाय पेड़ था जिस पर सफेद रंग के बड़े ही आकर्षक फूल खिलते थे पर उसका फल बहुत ही कड़ुआ होता था। उसी पेड़ के नीचे नकली दवा का कारोबार खूब फल फूल रहा था। नकली दवा का कारोबारी रोज सुबह-सुबह स्नान ध्यान कर उस पेड़ की पूजा-अर्चना किया करता था और मोटी कमीशन का पत्रम-पुष्पम चढ़ाया करता था। उस पेड़ से आशीर्वाद लेने के पश्चात ही अपना कारोबार शुरू किया करता था। पेड़ की घनी छाया उस दुकान पर ऐसे पड़ती रहती थी जैसे कह रही हो कि फिक्र मत करो बच्चे 'मैं हूँ न।' अर्थात उस पेड़ का वरदहस्त हमेशा उस दुकान पर था जो हर मुसीबत में उसकी रक्षा किया करता था।

मुक्तिधाम को इतना आकर्षक ढंग से बनाया गया था कि लोग उसका आकर्षण देखकर दाँतो तले उंगलियां दबा लिया करते थे। देखने वाले का जी अविलंब मर जाने को मचल उठता था। वहाँ सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ एक साइनबोर्ड भी टंगा था जिस पर लिखा था कि मुक्तिधाम आपका हार्दिक स्वागत करता है।'

उस स्थान की प्रसिद्धी सुनकर दूर-दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते थे पर दर्शन करना कहाँ से प्रारंभ करें यह समझ नहीं पाते थे। गाइड की मदद लेनी पड़ती थी। गाइड सलाह देता था कि सरकारी अस्पताल से दर्शन करना प्रांरभ करें तो बाकी यात्रा अपने आप पूरी हो जायेगी। कुछ दर्शनार्थियों की नजरें नकली दवा के दुकान के पास के विशालकाय पेड़ पर टिक जाती थी। कुछ विद्वान टाइप के दर्शनार्थी अंदाज लगाते थे कि शायद यह पेड़ भ्रष्ट राजनीति का हो।

घटना उसी परिसर के सरकारी अस्पताल की थी। स्वच्छ भारत अभियान का मुँह चिढ़ाता उस सरकारी अस्पताल का ऑपरेशन थियेटर रामसे ब्रदर्स के भुतहा महल की याद ताजा कर रहा था। शायद उस अस्पताल को स्वच्छता से एलर्जी थी तभी तो वहाँ वर्षों से सफाई नहीं की गई थी। उसे ऑपरेशन थियेटर कहने के बजाय भवसागर तरण केन्द्र कहना ही ज्यादा उचित होगा। इसी ऑपरेशन थियेटर में लगभग आधा दर्जन से अधिक माताओं की आत्मा को स्वर्ग के लिए प्रस्थान कराया गया था। रोते बिलखते बच्चों की आह और परिजनों के करूण क्रंदन से यहाँ का वातावरण एकदम भयावह हो गया था।

इसी अस्पताल में एक महिला अभी-अभी चीखती-चिल्लाती हुई बदहवाश-सी घुसी थी। वार्ड ब्याय ने उसे रोकने का अनथक प्रयास किया पर वह उसका हाथ झटक कर सीधे डॉक्टर के चेम्बर में धमक पड़ी थी।

डॉक्टर साहब अभी अपने चेम्बर की कुर्सी पर ध्यान मुद्रा में थे। वह महिला जोर-जोर से मेज थपथपाकर उसका ध्यान भंग करने लगी। डॉक्टर साहब की समाधि टूटी, उन्होंने आँखें मलते हुए जम्हाई ली फिर आराम से अंगड़ाई लेते हुए कहा-''क्या बात है देवी! कौन मर गया? जो आप इस तरह से चिल्लम-पों मचा रही हैं।''

महिला बोली-'' मेरी रक्षा कीजिए महराज! मेरे पति मुझे बात-बात पर नसबंदी शिविर में छोड़ आने की धमकी देते हैं और किसी विशेष फर्म में बने सिप्रोसिन दवा खिला देने की बातें कहते हैं। मैं उनकी धमकी सुनकर तंग आ गई थी आज मैंने उन्हें धमकी दी है कि तुम क्या मुझे सिप्रोसिन खिलाओगे, मैं स्वयं ही सीधे सरकारी अस्पताल चली जाती हूं। अब मैं आपकी शरण में हूँ। मुझ दुखियारी पर दया करके मुझे मुक्ति प्रदान कीजिए।''

डॉक्टर साहब कड़क कर बोले-'' देवी! लगता है तू पागल हो गई है। तुम्हारे पति तुम्हें धमकी देते हैं तो थाने में जाकर रिपोर्ट लिखा। यहाँ क्यों आई है। ये थाना नहीं सरकारी अस्पताल है और हम कोई ऐरे-गैरे प्राइवेट डॉक्टर नहीं बल्कि सरकारी डॉक्टर हैं, समझी?''

महिला हाथ जोड़कर बोली-''नहीं-नहीं प्रभु ऐसा मत कहिए। आपने तो बहुतों को कष्ट से छुटकारा दिलाया है। आप तो न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी की सिद्धान्त को आत्मसात किये हुए है। आप महान हैं, अनेक को भवसागर से पार कराया है तो मुझ पर कृपा कीजिए, जाउं कहां तजि शरण तुम्हारी।''

डॉक्टर का गुस्सा खतरे के निशान से ऊपर चला गया। वे क्रोधित होकर बोले-'' बकवास बंद कर छोकरी, तमीज से बात कर, हम महान नहीं बल्कि भूतपूर्व महान हो गए हैं। मेरी मर्जी से कुछ नहीं हुआ है। ये सब सिप्रोसिन महाराज की कृपा से हुआ है। दूसरी बात मैंने सबको भवसागर पार कराने का कोई ठेका नहीं ले रखा है। मेरी मर्जी, जिसे चाहूँ भवसागर से पार करा दूँ और जिसे चाहूँ अधर में लटका कर रख दूँ। तू कौन होती है मुझे सलाह देने वाली? यदि मुक्त होने की इतनी ही जल्दी है तो किसी कलयुगी बाबा के पास जा कर मुक्त हो ले, समझी?

म्हिला, डॉक्टर की बातें सुनकर फफक-फफक कर रो पड़ी। वह उसके कदमों को पकड़कर कहने लगी-'' ये कलयुगी बाबा मुझे क्या भवसागर पार करायेगें? वे तो खुद भव बंधनों में जकड़े हुए है। मैं तो आपके हाथों मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करना चाहती हूँ। आज दुनिया के बच्चे-बच्चे के जुबान पर आपका नाम है। विवाहित महिलाएं डर के मारे बस यही भजन गाने लगी है कि ''कलयुग तरण उपाय न कोई, नसबंदी सिप्रोसिन दोई''। आप बिल्कुल चिन्ता मत कीजिए। मैं अपने अबोध बच्चों और परिजनों को समझा कर आई हूँ कि कमीशन खाने वाले हृदय में इतनी संवेदना नहीं होती कि किसी गरीब के दर्द को महसूस कर उसे न्याय दिला सके। अब तो मुझ पर दया कीजिए। वह महिला बस इसी तरह बार-बार गिड़गिड़ाए जा रही थी। मगर डॉक्टर के कानों पर जूँ नहीं रेंग रही थी।

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