बुधवार, 1 जून 2016

हरीश कुमार की कविताएँ

1
समय का सबसे बड़ा और जरुरी आकर्षण वर्षा है
मिट्टी की खुशबू से महकते मन और तन
हरे भीगते धुलते हुए पेड़ खिलखिलाती सड़के आँगन
बादलों के स्वच्छ ताजा चेहरे से झरती बारीक बूंदे
जुते हुए खेतों में पानी के दर्पण और उनमें
झांकती हुई किसान की सुकून भरी इच्छाएं
यहाँ वहाँ बन गए छोटे जल स्रोतों में नहाती
पंख संवारती पक्षियों की टोली उन्मुक्त
कागजी कश्ती में उतरता बच्चों का मछली मन
प्रेम की सूखती तपती अभिलाषा की कामना
प्रकृति का यही रूप देखने को लालायित हैं ।
2
दोपहर दो बजे का समय तापमान 44 डिग्री
सड़क पर जैसे तारकोल पिघल ही जायेगी
एक तरफ किसी मंत्री के शहर में आने के बड़े बड़े स्वागत पोस्टर चिपके है
दूसरी तरफ लगभग चार महीने से वेतन न मिलने वाले कर्मचारी,
कर्ज माफ़ करवाने और मजदूरी बढ़ाने की मांग करते हुए
धरना दे रहे गरीब किसान और मजदूर
हालात और तापमान जाने कब ठीक हो
पर बारिश की तलब हर लब पर बनी हुई है ।
3
प्यास और आदमी का रिश्ता पुराना है
और उतनी ही पुरानी है आदमी की कृतघ्नता
पर याद रखना होगा दुहरायी गयी गलतियों पर
उपकार के गीत अक्सर मर्सिया बन जाते हैं
4
बगीचे में रखे पानी के कटोरे से
गिलहरी ,चिड़िया और कोयल ने पानी पिया
जैसे मुझे उऋण किया
एक गिरगिट भी वही चक्कर लगा रहा था
मुझे उस पर भी तरस आ रहा था
अब मुझे प्रतीक्षा है हरे रंग के तोतों की
वहीं पास में रख दिए है कुछ
मिर्च और भिन्डी के टुकड़े
प्रकृति के आतिथ्य में शायद कुछ जीवट तो हैं ।
5
हसीं गीत जैसे दोस्त
न छोड़े जानी वाली आदतों जैसे हैं
पड़ जायें तो जिंदगी आसान लगती हैं
कुछ ऐसी ही ख्वाहिश हर वक्त की है मैनें
कभी तो कहो आमीन आमीन आमीन
6
रस की मीमांसा और सिद्धान्त वादी आचार्यो
आनन्द की अनुभूति पर जितने अनुभव तुम लिख पाये
उन सबमे ही मेरी अनुभूति शामिल थी
कबीर ने तो इसे कुछ आसान करते हुए
गूंगे का गुड़ बताया और पल्ला झाड़ लिया
कि भाई इसमें बताने जैसा कुछ नहीं
मिटटी के कुल्हड़ में जमा दही
गर्मियों के प्रातः काल में हरी घास की आभा
नींद से जगने के बाद भीतर का क्षणिक मौन
कनेर के पीले फूलों का खिला चेहरा
बारिश में धुलकर खिले हुए पेड़ पौधों के रंग
चूल्हे में सिकती फूलती रोटी का आकार
आंवले के पेड़ पर नए चमकदार फल
एकांत के बगीचे में चुपचाप प्रेम
कच्चे आँगन पर छिड़काव से उठती महक
और न जाने कितने रिश्ते नातों की पुरानी कहानी
रस और ब्रह्म की अंततः नेति नेति पर समाप्त सीमायें
घर के बाहर जलाये गए प्लास्टिक कचरे की घुटन में
कुछ अन्तिम उदाहरणें बची हैं ।
7
जब कहने को कुछ न हो
खालीपन की आवाज सुनो
बहुत शोर होगा औ घबराहट
आहिस्ता से कुछ अफ़साने चुनो ।
8
बढ़ती तपिश के बीच
खुली छत पर स्याह आसमान के नीचे
ढलती शाम में हवा के सकून भरे झोंके
झांकता हुआ चाँद और साथ निभाता एक तारा
खुमारी की चढ़ती मद्धिम लहर में
अच्छे दोस्तों की तरह साथ निभाते हुए
मुस्कुराहट सजाते लगते हैं
और भी बहुत कुछ यादों का हाथ पकड़
साथ साथ गुनगुनाया करता है ।
9
आदमी और औरत
बेरोजगार हैं
वे फिर एक बार इंटरव्यू देने
एक कमरे के बाहर प्रतीक्षारत है
उनके साथ आए
कुछ शिशु, बच्चे युवा और बुजुर्ग
भी चिल्लाते,उदास, ऊंघ रहे हैं
कुछ गोद में आढ़े तिरछे सोते
इस लबादे को उतार फेकने के लिए
उत्साहित और हताश उम्मीदों के साथ
समय को सहन कर रहे हैं ।
10
राह चलते कोई फूल दिखे
तो तोडने से पहले कुछ देर
बस देखना जी भर के चुपचाप
झूमना लहराना खिलखिलाना उसका
फिर धीरे धीरे मुस्कुरा देना कि
तुम देख सको
फूल की मुस्कुराहट अपने भीतर
बस फिर चले जाना और
महसूस करना अपने अंदर
खिलती पंखुड़ियों को ।
 

--

हरीश कुमार ,गोबिंद कालोनी ,गली न -२

बरनाला ,पंजाब।- 148101

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