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यही है असफलता का कारण - डॉ. दीपक आचार्य

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हर इंसान लौकिक और अलौकिक सुखों की प्राप्ति चाहता है और इसके लिए अपने-अपने हिसाब से पूजा-पाठ और साधना का आश्रय प्राप्त करता है।

हर इंसान की किसी न किसी जड़-चेतन के प्रति आस्था होती ही है और इसका अवलम्बन करता है।  बहुत से लोगों की साधना और पूजा-पाठ दिख जाता है जबकि बहुत से ऎसे भी हैं जो बाहरी दिखावों से दूर रहकर साधना में रमे रहते हैं। पर हर कोई किसी न किसी की सेवा-पूजा, पाठ और साधना करता ही है।

अधिकतर लोगों के लिए साधना अनिष्ट निवारण और कामनाओं की पूर्ति में सहायता करने का उपक्रम मात्र होता है। कइयों के लिए यह भगवान को खुश करते हुए अपनी रोजमर्रा की गृहस्थी को ठीक-ठाक चलाने का साधन है, कई लोग इसे अपनी अतिरिक्त इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम मानकर करते हैं और कुछेक ही हैं जो चाहते हैं कि इससे भगवान की उन पर कृपा बनी रहेगी और मोक्ष की प्राप्ति सुगम रहेगी।

यों देखा जाए तो अधिकांश लोग पीढ़ियों से ऎसा करते रहे हैं। कुछ लोग जिन्दगी भर पूजा-पाठ करते हैं, समय-समय पर खूब साधनाएं करते हैं बावजूद इसके न तो कोई दैवीय ऊर्जा संग्रहित कर पाते हैं न दिव्यता ला पाते हैं।

जो कुछ पूजा-पाठ या साधना हो, उसकी ऊर्जाओं का प्रभाव दिखना चाहिए तभी इसका महत्व है। बरसों तक हम कुछ करते रहें और उसका कोई प्रभाव सामने नहीं आए तो इसका कोई अर्थ नहीं। इस प्रकार की स्थिति का मूल कारण यह है कि हम केवल कर्मकाण्ड को पकड़ कर चलते हैं।

उसे सहारे की लाठी से लेकर वैतरणी पार कराने वाली पूंछ तक मान बैठे हैं। हमारी विधियों, संस्कारों और पूजा-पाठ एवं साधना की पद्धतियों के वैज्ञानिक रहस्यों को जानने-समझने और इन पर शोध करने की मनोवृत्ति को अपना लें और फिर अनुसंधान के साथ यदि कर्मकाण्ड करें, साधनाओं को अमल में लाएं तभी इसका प्रभाव सामने आ सकता है।

साधना मार्ग में असफलता का सबसे बड़ा कारण हमारी अपवित्रता है। जब तक देह, मन और मस्तिष्क में शुद्धता नहीं आएगी, मन, कर्म और वचन से लेकर स्वभाव और व्यवहार में शुचिता नहीं आएगी, तब तक सारी साधना, पूजा-पाठ और अनुष्ठान बेकार हैं।

यह केवल ढकोसला, पाखण्ड और दिखावे के सिवा कुछ नहीं है। हमारे रोजाना के जीवन में जो कुछ घटित होता है वह अपने साथ ऊर्जा ले कर निकलता है। चाहे वह ऊर्जा पूजा-पाठ या साधना से संचित की गई हो अथवा पूर्वजन्म से।

हमारा अच्छा-बुरा हर कर्म हमारे जीवन से पुण्य और संचित ऊर्जा पाकर निकलता है और हम रोजाना रिक्त होते रहते हैं। चौबीस घण्टों में हम साधना के लिए मात्र दस मिनट से लेकर घण्टा-दो घण्टा निकालते हैं लेकिन इसके अलावा के समय में हम जो कुछ करते हैं वह ऎसा होता है कि हमारी साधना प्राप्त ऊर्जा के खाते से बाहर निकल जाता है।

रोजाना हम एक माला जप करते हैं लेकिन हमारी इच्छाओं की संख्या हजार होती है, झूठ बोलते हैं, झूठन खाते हैं, हराम का खान-पान करते हैं। यह सब मन-मस्तिष्क और शरीर को अशुद्ध करता है। और इस अशुद्धि के निवारण के लिए हमें बहुत बड़ी दैवीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

आवश्यकता के अनुपात में कई गुना खपत के शिकार हैं हम सब। हममें से कई लोग शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए न कोई त्याग कर पाते हैं न तपस्या या दैवीय ऊर्जाओं की प्राप्ति और संचय का कोई जतन। ऎसे में हम पहले से ही रिक्त होते हैं। ऊपर से हमारी कामनाओं का कबाड़खाना रोजाना बढ़ता ही चला जाता है।

झूठ बोलने और मिथ्या आचरण, बिना पुरुषार्थ और मेहनत के खान-पान और दूसरे सारे दोषों के कारण मलीनता आ जाती है सो अलग। इस तरह हम लोग ऊर्जा शून्यता की अवस्था में जीते हैं और ऊपर से पराया ऋण इतना चढ़ जाता है कि उसे उतार पाना कई जन्मों में संभव नहीं हो पाता। हम किसी का बूंद भर पानी पी लें, अन्न का एक दाना भी खा लें उसका भी ऋण चढ़ता है। और इसे उतारे बिना हमारा मोक्ष या आनंद प्राप्ति कभी संभव नहीं। इसका खामियाजा हमें जन्म-जन्मान्तरों तक भुगतना पड़ता है और हमारी अधोगति के सारे रास्ते हर क्षण खुले रहते हैं।

साधना, पूजा-पाठ और अनुष्ठानों से प्राप्त ऊर्जा तभी काम में आ सकती है जबकि इसके संरक्षण के प्रति हम सचेत रहे। हमारी स्थिति यह हो गई है कि किसी क्षण गुस्सा होते हैं तब शाप दे डालने से भी नहीं चूकते, और खुश हो जाएं तो मनचाहा वरदान  दे डालते हैं। और कुछ न हो तब भी रोजमर्रा के कामों को लेकर इच्छाओं के अनन्त महासागर में गोते लगाते रहते हैं।

इन सभी क्रियाओं में हमारी भीतरी ऊर्जा का क्षरण होता है। हमारे जीवन की तमाम असफलताओं का यही एकमात्र रहस्य है। इस स्थिति में सुधार लाए बगैर हमारी साधना व्यर्थ है। जितना हम पा रहे हैं उससे कई गुना अधिक खर्च हो रहा है और इस वजह से हमारा संचित सब कुछ नष्ट हो गया है, उधारी के सहारे जीवन चला रहे हैं।

साधना में सफलता या सिद्धि पाने के लिए स्व पुरुषार्थ से अर्जित खान-पान अपनाने के साथ ही मिथ्या भाषण, झूठ बोलना, पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों से ग्रस्त होकर काम करना, स्वार्थ भाव से कर्म और दुष्टों-पतितों और अपराधियों से संसर्ग-सम्पर्क आदि सब कुछ छोड़ना जरूरी है क्योंकि आत्मा और शरीर दोनों शुद्धता चाहते हैं और इस शुद्धता को कायम रखने के लिए साधना की ऊर्जा इसमें लगती है।

यदि उतनी ऊर्जा हो तो ठीक है अन्यथा ओवर ड्राफ्ट जैसी स्थिति सामने आ जाने पर जीव की दुर्गति ही निश्चित है। एक तरफ साधना भी करते रहें और दूसरी तरफ औरों को पीड़ा भी पहुंचाते रहें, निन्दित कर्म भी करते रहें, तो इसका कोई फायदा नहीं।

साधना में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि जीवन में निन्दित और पाप कर्मों से दूर रहें, झूठ और झूठन का परित्याग करें तथा शुचिता को अपनाएं, तभी ऊर्जा का क्षरण रुकेगा और सफलता पाने या कामनाओं की पूर्ति करने लायक क्षमता अपने भीतर आ पाएगी।

पापी और अपवित्र लोगों को साधना का न कोई अधिकार है, न उनकी साधना फलती है। यही कारण है कि ये लोग हमेशा कभी गुरु बदलते रहते हैं, कभी उपासना पद्धतियां। और जीवन के अंतिम क्षण तक ये समझ नहीं पाते कि वे क्या कर रहे हैं और क्या करना चाहिए। यह तक नहीं मालूम चलता कि क्या खोया-क्या पाया। इसका हिसाब फिर ऊपर वाला ही करता है।

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