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यह है राज दुष्टों की मौज-मस्ती का - डॉ. दीपक आचार्य

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इंसानों के जीवन के बारे में शंकाओं का दौर हमेशा पसरा हुआ रहता है। कई शंकाएं निराधार होती हैं जबकि कुछेक के पीछे कोई न कोई  मिथक या आधार जरूर रहता है।

अधिकतर लोगों की यह शंका मन के कोनों से लेकर विद्वजनों, संत-महात्माओं और जानकारों के सामने यह आती है कि दुनिया में बहुत से नराधम रोजाना पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं, अनाचार, अन्याय और शोषण करते रहते हैं, बावजूद वे समृद्धिशाली और सुखी रहते हैं।

दूसरी ओर ईमानदारी से कर्तव्य का निर्वहन करने वाले, परिश्रमी, पसीना बहाकर जीवन निर्वाह करने वाले लोगों के सामने दुःख और विषमताओं के पहाड़ आते रहते हैं, परेशानियों के बादल फटते रहते हैं।

इस स्थिति में सज्जनों और कर्तव्यपरायण लोगों को लगता है कि आखिर ईश्वर की यह कैसी माया है जिसमें दुष्ट, नालायक और नुगरे-बदमाश-गुण्डे लोग तो आनंद में जी रहे हैं और सच्चे तथा अच्छे लोगों की परेशानियां ऎसी हैं कि कभी खत्म होने का नाम तक नहीं लेती।

ईश्वर के यहां न कोई देरी है, न अंधेर। सबके कर्मों का पक्का हिसाब है और उसी के अनुरूप न्याय का विधान भी। इसलिए ईश्वरीय विधान में किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। इंसान का भाग्य पूर्व से ही रचित होता है लेकिन उसे अन्य के मुकाबले ज्ञान और विवेक दिया हुआ है जिसके आधार पर वह कर्म से भाग्य और भावी दोनों को बदल सकता है।

यह उस पर निर्भर है कि वह अच्छे कर्म करता हुआ ऊध्र्वगामी बने या बुरे कर्म करता हुआ अधोगामी। जो लोग अच्छे कर्म करते हैं, निष्पाप, निर्मल और निरहंकारी हैं उनके लिए भगवान हमेशा के लिए आनंद और सुख देना चाहता है।

और इसके लिए वह श्रेष्ठ कर्म करने वाले मनुष्य की जिन्दगी से सभी जन्मों के संचित पाप की वजह से निर्मित दुःखमय प्रारब्ध को समाप्त करने के लिए प्रयास करता है। इसके लिए वह सारे पापों को क्रमबद्ध रूप से आगे लाकर इन्हीें सूक्ष्मतम परिमाण में भुगतवा कर इनकी जिन्दगी से पापों को समाप्त करता है।

जब सारे पाप समाप्त हो जाते हैं तब अक्षय सुख और शाश्वत आनंद की प्राप्ति कराता है और अन्त में मोक्ष कर देता है अथवा श्रेष्ठतम योनि प्रदान करता है।

अपने संचित पापों के क्षय होने और इसके क्रम में आगे होने की वजह से सच्चे और अच्छे लोगों को यह भ्रम होता है कि भगवान आखिर उनके साथ ऎसा क्यों कर रहा है। पर भगवान का विधान समझ में आ जाने के बाद पापों से मुक्ति अर्थात दुःखों को भुक्तमान कर अपने जीवन से इनकी समाप्ति की सारी यात्रा में मनुष्य को महा आनंद की अनुभूति होती है और इसी अनुभूति को पाते हुए वह एक समय बाद सारे पापों से मुक्त हो जाता है, उसके सारे दुःखों को भगवान अत्यल्प घनत्व के साथ भुगतवा कर समाप्त कर देता है।

दृढ़ और सच्चे भक्तों को भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा होती है और इस कारण वे विचलित नहीं होते, एक समय बाद महा आनंद की प्राप्ति कर लिया करते हैं। इसके बाद उन्हें भगवान की ओर से कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।

इसलिए श्रेष्ठ, सच्चे और अच्छे कर्म करने वाले लोग हमेशा ईश्वरीय विधान पर भरोसा करते हुए जीवन को सफल बना देते हैं और अक्षय कीर्ति, अपार यश तथा शाश्वत शांति को प्राप्त होते हैं। परमात्मा हमेशा दैवीय गुणों वाले लोगों पर इसी तरह कृपा बनाए रखता है।

दूसरी ओर जो लोग पाप कर्मों में लिप्त हैं, भ्रष्टाचार, अनाचार और व्यभिचार में रमे हुए हैं उन लोगों के जीवन से सारे के सारे संचित पुण्यों को क्रम में एक साथ आगे लाकर भुगतवा देता है और इस तरह इन दुष्टों की जिन्दगी से हमेशा-हमेशा के लिए संचित पुण्यों से सृजित सुख का समापन करवा देता है।

अच्छे लोगों को इसीलिए यह भ्रम होता है कि दुष्ट लोग कितने आराम से मजे करते हैं, भोग-विलास और मस्ती भरी जिन्दगी जीते हैं और इन्हें न कोई पूछने वाला रहता है, न टोकने वाला और न कोई इनके बारे में शिकायत करने वाला।

इन दुष्टों और पापियों के सारे पुण्य समाप्त करवा कर भगवान इन्हें छोड़ देता है भंवर मेंं।  पाप और पुण्य का यही गणित है। यह हम पर निर्भर है कि हम जहां जिस स्थिति में हैं उससे आगे बढ़ना चाहते हैं अथवा इससे नीचे गिरते हुए पशुता  को पाना।

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