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पर्यावरण बचाएं - डॉ. दीपक आचार्य

 

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आज पर्यावरण दिवस है। पर्यावरण की चर्चा और पर्यावरण को बचाने के लिए चिल्लपों मचाने और आयोजनों का दिन है। साल भर हम भले ही कुछ न कर पाएं, लेकिन इस एक दिन हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम विश्व पर्यावरण दिवस को मनाएं।

यह ठीक उसी तरह है जिस तरह विदेशों में फादर-मदर-फ्रैण्ड्स से लेकर तमाम दिन मनाते हैं। उस दिन को मनाना और विषय वस्तु का जिक्र, चिन्तन, चिन्ता, भाषण और आयोजन हमारी वार्षिक दिनचर्या या कि अंग्रेजी कैलेण्डर का विषय हो गया है।

जिस पर्यावरण को साल भर, हर पल सम्मान और आदर देना, पंचतत्वों और प्रकृति की पूजा करना हमारा परंपरागत, सनातन और शाश्वत धर्म, कर्म और फर्ज रहा है, उसे एक दिन में निपटा देना और अगले साल के लिए उसे भूलाए रखने का काम हम काले-धोरे, खिजाबी, मेहन्दिया माथे के मनुष्यों के सिवा और कोई नहीं कर सकता।

हम जितने साल से पर्यावरण दिवस मना रहे हैं, जितनी भीड़ को इसके लिए जमा करते हैं, जितने लोगों को पुरस्कार बाँटते हैं, अभिनंदन करते हैं, सम्मान देते हैं उतने ही लोगों ने यदि साल भर में एकाध पौधा ही लगाकर उसका सुरक्षित पल्लवन किया होता तो हमारा यह दिवस अब तक सार्थक उपलब्धियों का सुनहरा पैगाम देने वाला हो जाता।

पर्यावरण के प्रति हमारी उपेक्षा और अनादर ही वह कारण है जिसकी वजह से दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से रूबरू होने लगी है। इस बार की गर्मी इसका जीता जागता उदाहरण है। यही नहीं अब तो यहां तक कहा जा रहा है कि आने वाले समय में गर्मी का पारा उत्तरोत्तर चढ़ता ही रहेगा।

न केवल बाहरी गर्मी बल्कि आजकल इंसानों को भी देख लीजिए, बहुत सारे इंसान हैं जो रेडियेटर की तरह गर्म होने लगे हैं, अपनी ऊष्मा से आस-पास वालों को झुलसाने लगे हैं। जब प्रकृति में हरियाली नहीं रही, पानी गायब हो रहा है, खाली भाग नहीं रहे, आबोहवा दूषित हो गई, न आसमां ही स्वस्थ रहा है, न जमीन।

इन हालातों में हर तरफ का पर्यावरण बिगड़ा हुआ है। सभी लोग इन भयावह और भीषण हालातों को महसूस करते जरूर हैं मगर अपनी ओर से कुछ नहीं कर पा रहे। कोई सरकार की ओर देख रहा है, कोई वित्तीय मदद पाने के लिए दूसरों की तरफ।

सब को लगता है कि दूसरे करें, हमसे कुछ नहीं होता। यही बात सभी सोचते हैं। पर्यावरण के नाम पर पंच तत्वों और प्रकृति का ही ह्रास नहीं हुआ है, दुनिया की इंसानी ताकतों का भी क्षरण होता जा रहा है।

हम इतने अधिक खुदगर्ज हो गए हैं कि हमें आस-पास के लोग, पशु-पक्षी, वन्य जीव, पेड़-पौधे आदि कुछ नहीं दिखते।  इनका चाहे जो हश्र हो, हमें एयरकण्डीशण्ड की ठण्डी हवा मिलती रहनी चाहिए। इस एयरकण्डीशण्ड ने बहुत से लोगों की मानवीय संवेदनाएं छीन ली हैं।

बंद कमरों में ठण्डी हवाओं और कृत्रिम रोशनी में रखी पूज्य और श्रद्धा केन्द्र मानी जाने वाली ममियों  की तरह अपनी-अपनी सुरक्षित माँदों में बिराजमान इन लोगों को पता ही नहीं है कि बाहर क्या हो रहा है, लोग कैसे रहते होंगे, पशु-पक्षियों और वन्य जीवों की क्या समस्याएं हैं, उनके लिए दाना-पानी भी मिल रहा है या नहीं। उनका जीवन कितना खतरे में हैं, कितने पशु-पक्षी भूखे मर रहे हैं, पानी और खाने की तलाश में बस्तियों में की ओर रूख कर रहे हैं।

हमने अपनी हवेलियां, फार्म हाउस, होटलें और आरामगाह बनाने के लिए वन्य जीवों की बस्तियों को तबाह कर दिया है, चरागाहों को खाते जा रहे हैं और जहां कोई खाली जमीन दिखी नहीं कि किसी न किसी तरह सीमेंट-कंक्रीट का जंगल उगाने में लग जाते हैंं।

हमारे पूर्वज जो पेड़-पौधे लगा गए, उन्हें भी हम उजाड़ रहे हैं, नए पेड़-पौधे लगाने की बातें तो दूर रहीं। पर्यावरण के नाम पर भाषण झाड़ने वाले, आकाशवाणी और दूरदर्शन केन्द्रों से वार्ताएं देकर धन पाने वाले, पर्यावरण के नाम पर सम्मान, अभिनंदन और पुरस्कार पाने वाले तथा पर्यावरण दिवसों पर भागीदार के रूप में भीड़ में मौजूद कितने चेहरे ऎसे हैं जिन्होंने अपने जीवन में पौधे लगाए हों, पेड़ों की रक्षा की हो, जंगल बचाए हों, वन तस्करों को हतोत्साहित किया हो, कभी पेड़ों पर कुल्हाड़ी नहीं चलायी हो और ऎसा कोई काम किया हो जिससे पर्यावरण रक्षा को संबल प्राप्त हुआ हो।

इस प्रश्न का जवाब हमें ही ढूँढ़ना होगा।  पर्यावरण के हर कार्यक्रम में यह तय कर देना चाहिए कि इसमें अतिथियों से लेकर संभागियों तक केवल वे ही शामिल होने के लिए पात्र हों जिन्होंने साल में एक बार कम से कम कहीं भी कोई एक पेड़ लगाया और बड़ा किया हो।

आज का पर्यावरण कई मायनों में दूषित होता रहा है। पर्यावरण का रिश्ता केवल पेड़-पौधों से ही नहीं है बल्कि पूरी की पूरी प्रकृति और पंच तत्वों से है जिनकी रक्षा हमारा दायित्व है।  जब जगे तक सवेरा। पर्यावरण के नाम पर अब तक जो कुछ हो चुका, उसकी चिन्ता छोड़ें।

अब भी समय है कि हम सभी जगें और पर्यावरण को अनुकूल बनाएं अन्यथा आने वाला समय अपनी कल्पनाओं से भी परे होगा। प्रकृति कुपित है और इसका नज़ारा साल भर कहीं न कहीं देखने को मिल ही रहा है। फिर भी हम सबक नहीं ले रहे हैं। 

ऊपर जाने से पहले कम से कम इस बात का संतोष हम सभी को कर ही लेना चाहिए कि पर्यावरण ऱक्षा में हमारी भूमिका भी रही है। काम ऎसा हो कि धरती का जीव मात्र हमारे कर्म को सराहे, तभी पर्यावरण दिवस मनाने की सार्थकता है अन्यथा जो कुछ हो रहा है वह शब्दों के जंगल उगाने के लिए काफी है।

सभी को विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं .....

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