शनिवार, 18 जून 2016

तलाश-ए-आम है गधा-मजूरों की - डॉ. दीपक आचार्य

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आज की सबसे बड़ी समस्या कार्य संस्कृति का अभाव  है। और यह समस्या केवल कार्यस्थलों और कर्म क्षेत्र के विभिन्न परिसरों तक के लिए ही सीमित नहीं बल्कि अब अधिकांश घर-परिवारों के लिए आम बात हो गई है।

लोग बैठे-बैठे खाना चाहते हैं, बिना मेहनत किए पाना और जमा करना चाहते हैं और हमेशा यही तमन्ना रहती है कि बँधी-बँधायी बिना कुछ किए जमा होती रहे, ऊपरी आवक भी बनी रहे।

वर्तमान की इस महा समस्या का खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो कार्य संस्कृति के प्रतीक और नैष्ठिक कर्मयोगी कहे जाते हैं और जिनकी वजह से ही काम हो पा रहे हैं।

तकरीबन हर संस्थान, परिसर और बाड़ों में यही स्थिति है जहाँ बहुत सारे लोगों की भीड़ ऎसी ही नाकारा है जो काम में विश्वास नहीं करती बल्कि किसी न किसी तरह बिना किसी जिम्मेदारी के बैठे रहने की आदी है।

इस भीड़ का न तो काम में विश्वास होता है, न कार्य संस्कृति में। इन तमाम स्थितियों में उन लोगों की जिन्दगी अपने रंग-रस खो देती है जो लोग पूरी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण से काम करते हैं, अपनी पूरी की पूरी उत्पादकता का सुनहरा कैनवास दिखाते हैं, अपने शुभ्र चरित्र और व्यक्तित्व से ओजस्वी छाप छोड़ते हैं और जीवन माधुर्य के पर्याय होकर पूरी मस्ती से जीते हैं।

हर तरह से सामथ्र्यवान होने के बावजूद इन लोगों का भविष्य हमेशा अनिश्चितता के दौर से होकर गुजरता रहता है। कारण साफ है कि ये लोग समझौतों, समीकरणों,चापलुसी, हाथाजोड़ी, चरणस्पर्शी परंपरा, औरों को खुश करने और रखने के तमाम हथकण्डों को अपनाने और उपकरणों की व्यवस्था करने से लेकर उन सभी सम सामयिक तरकीबों से अनभिज्ञ रहते हैं और इन्हें अपनाना इंसानी जिस्म और स्वाभिमान के खिलाफ मानते हैं।

और यही कारण है कि जब भी शोषक, अधीश्वरवादी, अहंकारों से लक-दक, अपने नम्बर बढ़ाने के आदी और संवेदनहीन लोगों को जब किसी कर्मयोग को पूर्णता देने के लिए तलाश होती है, उन लोगों की दृष्टि उन्हीं चंद लोगों पर जाकर टिक जाती है जो कि कर्मयोग के प्रतीक माने जाते हैं।

और यहीं से शुरू हो जाता है कार्य संस्कृति के पहरुओं का किश्तों-किश्तों में कत्ल उत्सव। सच और वास्तविकता यही है कि जो इंसान कार्यसंस्कृति में विश्वास रखता है वह वाकई विनम्र, सहिष्णु, संवेदनशील और सहनशील होता है, इसलिए हर तरह के झाँसे में सहर्ष आ जाता है क्योंकि उसे अपने व्यक्तित्व की गरिमा और कर्मयोग की साख को बनाए रखने की चिन्ता हमेशा सताए रखती है।

इसलिए जो कुछ कहा जाता है उसे चुपचाप सुन लेता है, जो काम दिया जाता है उसे चुपचाप कर लेता है, और जो कुछ सुनाया जाता है उसे चुपचाप सुन भी लेता है। कई-कई मर्तबा बहुत सारी बातों को पचाने की क्षमता हर किसी की नहीं होती, ऎसे में एक कान से सुनकर दूसरे कान का उपयोग करते हुए अवांछित और अनुपयोगी बातों को बाहर निकालने की कला का उपयोग भी जरूरी हो जाता है।

लोक धाराओं में इन कर्मयोगियों को गधामजूर और इनके कर्म को गधामजूरी कहते रहे हैं और यह शब्द सभी कालों, परिस्थतियों और देश से परे हैं,  कालजयी और सार्वजनीन वैश्विक अभिव्यक्ति के पर्याय हो चले हैं।

अब समय यही आ गया है। काम नहीं करने वालों के लिए कहीं कोई वर्जनाएँ नहीं दिखती, उनके लिए कहीं कोई समस्या नहीं है, न कोई उन्हें रोकने-टोकने वाला है, न इन्हें कोई काम बताने वाला।

सब लोग इनकी बजाय उन लोगों का इस्तेमाल करने के आदी होते जा रहे हैं जो काम करने वाले हैं, नैष्ठिक समर्पण के पर्याय हैं, जिनकी वजह से ही जमाने भर में काम हो भी रहा है, दिख भी रहा है।

बेचारे गधे अपनी शालीनता, विनम्रता, अनचाहे कामों, क्षमता से अधिक बोझ, रोज की झिड़कियाँ सुनने, डण्डे खाने और हर तरह की प्रताड़नाओं के बावजूद मूक वफादार बनकर काम करते चले जाते हैं, जब तक कि हड्डियाँ बज नहीं उठें, कमर झुक कर झूला न हो जाए, आँखों से रेटिना पर गहरी काली धुंध न छा जाए, और किसी काम के न रहें, हर समय लगे कि मरणासन्न ही हैं।

गधों की यही नियति हैं लेकिन इससे भी खराब हालत गधा मजूरों की है जो सब कुछ जानते-बूझते और समझते हुए भी विद्रोह नहीं कर पाते क्योंकि उनके खून में गुलाम वंश के कतरे हैं या फिर अपने संस्कारों से नीचे नहीं उतरने के संकल्प।

गधों की तरह गधा-मजूरों को भी इंसान की जैसी दशा है उसमें इन्हें इन्सान नहीं माना जा सकता। ऎसे में ये सारे के सारे गधा-मजूर मानवाधिकारों के दायरों से बाहर आते हैं इसलिए इनके बारे में किसी को कुछ भी बताने, अनुरोध करने का कोई हक नहीं बनता।

फिर कोई सुनने वाला भी नहीं है, न कोई ऎसा धीर-गंभीर और संवेदनशील इस युग में बचा है जो कि सत्यासत्य, धर्म-अधर्म और विवेकवान हो, जिसे अच्छे-बुरे की परख हो, गुणावगुणों की व्याख्या में सक्षम हो और जिसका हर कर्म न्यायपूर्ण एवं दिव्यता लिए हुए हो।

देवी शीतला मैया का आभार मानें कि जिन्होंने गर्दभ को अपना वाहन बनाकर प्रतिष्ठा दी और इतने मान-सम्मान से नवाजा। लेकिन बेचारे गधा-मजूर कहाँ जाएँ, उनका न कोई संरक्षक होता है, न सलाहकार, और न ही ऎसा कोई, जिसके आगे ये अपना रोना रो सकें। 

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