बुधवार, 15 जून 2016

खुद क्या हैं ? यह देखें - डॉ. दीपक आचार्य

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अपने मालिक और आकाओं के नाम और दम पर बहुत से लोग उछलकूद करते हैं, जमाने भर में छा जाने की हरचन्द कोशिश करते हैं और सभी को यह दिखाते हैं कि उनके बराबर कोई दूसरा नहीं हो सकता।

एक जमाना था जब इंसान अपने विलक्षण व्यक्तित्व, सद्गुणों और मानवोचित श्रेष्ठ कर्मों से लेकर व्यवहार तक सभी में इतनी महारत हासिल कर लिया करता था कि उसे किसी और के साथ जुड़ने, औरों का नाम इस्तेमाल करने या कि दूसरों के दम पर गुब्बारा बना रहकर आसमान में उड़ने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

हर इंसान अपने हुनर का बादशाह था और उसी हुनर की बदौलत उसे सर्वत्र सम्मान प्राप्त होता था। सच्चा और खरा इंसान उसी को माना जा सकता है जो खुद के दम पर तरक्की करे, अपनी खुद की पहचान बनाए और जमाने भर में अपने स्व हुनर, माधुर्यपूर्ण सर्वस्पर्शी स्वभाव और लोक कल्याण की भावना के साथ इस तरह आगे बढ़े कि उसकी सरजमीं को भी गर्व हो तथा उसकी मातृभूमि की गौरवान्वित हो।

दुनिया में विद्वत्ता और हुनर से लेकर समाज सेवा और  देशभक्ति की तमाम कसौटियों पर खरा उतरने वाले इंसान को किसी भी दूसरे इंसान का अनुचर, अंधानुचर बनने और उसकी दया पर पलने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

इस किस्म के इंसान में कूट-कूट कर स्वाभिमान भरा हुआ होता है और इसी स्वाभिमान की अन्यतम ऊर्जा के सहारे ही ये बिरले लोग  विलक्षण व्यक्तित्व प्राप्त कर लेते हैं।

जिन लोगों में इस तरह की दिव्य प्रतिभा होती है उन लोगों को ईश्वर के सिवा किसी के सहारे, दया या कृपा की जरूरत नहीं होती बल्कि ये आत्म सम्मानित होते हैं और खुद के बूते आगे से आगे बढ़ते रहते हैं।  स्वाभिमान से भरे हुए लोग निरपेक्ष, निःस्पृह और निष्काम होते हैं।

उन्हें न औरों से  किसी सराहना या धन्यवाद की आवश्यकता होती है, न किसी और से कुछ भी प्राप्ति की। और यही कारण है कि इन लोगों पर किसी बाहरी प्रभाव, प्रलोभन या दबाव का कोई फरक नहीं पड़ता बल्कि इनकी अपनी ही मौज मस्ती और फक्कड़ी स्वभाव होता है जिसके आगे किसी का बस नहीं चलता। लेकिन जहां समाज की भलाई और देशभक्ति की बात आती है वहां ये लोग हमेशा अव्वल रहते हैं  और यही इन लोगों की सबसे बड़ी ख़ासियत होती है।

इंसान के रूप में जो पैदा हुए हैं उन सबको चाहिए कि वे अपनी खुद की पहचान बनाएं और ऎसी पहचान बनाएं कि इससे उस परमात्मा को भी गर्व हो जिसने हमें धरती पर भेजा है।  जिस काम से भगवान हमें धरा पर जन्म देता है, अपनी पहचान बनाने और अमर होने के अवसर देता है, उस परमात्मा के कार्यों और मंशा को हम यदि पूर्ण नहीं कर पाते हैं और अपनी पहचान भुला कर औरों के दुमछल्ले, पिछलग्गू  और अंधे अनुचर बन जाते हैं तब भगवान को भी हम पर गुस्सा आता है और वह आने वाले जन्मों में हमारी इंसानी पहचान को खत्म कर देता है और दूसरी किसी ऎसी योनि में जन्म दे डालता है जिसमें हमारी स्थिति खूंटे से बंधे हुए किसी पशु की मानिन्द होती है या फिर भेड़ों की रेवड़ में शामिल किसी ऎसी भेड़ की, जिसे पता ही नहीं है कि कहां जाना है और कहां हमें ले जाया जा रहा है।

आजादी के बाद से आदमी अपनी पहचान भुला कर औरों के नाम से जाना जाने लगा है और यही इंसान की सबसे बड़ी भूल, कायरता और मूर्खता कही जा सकती है। आजकल बहुत से लोग हैं जिनकी अपनी कोई पहचान नहीं है बल्कि ये लोग किसी न किसी के आदमी कहे जाते हैं।

बहुत सारे लोगों के बारे में सुना जाता है कि ये लोग खुद कुछ नहीं हैं किन्तु किसी न किसी के नाम से कमा खा रहे हैं, औरों के नाम पर धींगामस्ती और कमाई का खेल आजकल आम होता जा रहा है। इन लोगों में अपनी मौलिक प्रतिभा कुछ नहीं होती बल्कि ये दूसरों के नाम पर बन्दरों की तरह उछलकूद करते रहे हैं।

इनके बारे में यह भी कहा जाता है कि ये लोग किसी न किसी के खास हैं इसीलिए अपने खोटे सिक्के और अवधिपार जंग लगी चवन्नियां चला रहे हैं। इन सभी लोगों को चाहिए कि वे खुद की पहचान बनाएं, औरों के नाम पर जिन्दगी न चलाएं। वरना जो अपनी खुद की कोई पहचान नहीं बना पाता उसे न इतिहास याद करता है, न उनके वंशज।

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