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कन्यापूजन / कहानी / यशोधरा वीरोदय “यशु”

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यशोधरा वीरोदय “यशु”

ईमेल: yashuvirodai08@gmail.com

कन्यापूजन

डोरबेल बजते ही प्रतिमा ने टीवी का वाल्यूम कम किया और बालों में जूड़ा बनाते हुए ड्राइंग हॉल की तरफ चल पड़ी ....हॉल का दरवाजा खोला तो देखा कि सामने पड़ोस वाली मिसेज शर्मा, हाथों में दो बड़े थैले लिए खड़ी हैं। प्रतिमा ने झट से एक थैले को सम्भालते हुए कहा “अरे अन्दर आइए ना आंटी..मार्केट गयी थी आप” । मिसेज शर्मा.. “हाँ बेटा .. कल की तैयारी में बड़ी भाग दौड़ हो गई”। “जी कल की तैयारी… नवरात्रि की ”.... प्रतिमा ने पूछा । मिसेज शर्मा अन्दर बढ़ती हुई.. “हाँ कल नवमी है ना... कन्यापूजन भी करना है उसके लिए ही सामान लाने गयी थी” । “अच्छा ! ... प्रतिमा थैले को टेबल पर रखते हुए... आंटी आप बैठिए मैं पानी लाती हूँ” । “रहने दे बेटा अभी जल्दी में हूँ.. तुमसे कुछ बात करनी थी तो चली आई” कहती हुई मिसेज शर्मा सोफे पर बैठ गई । प्रतिमा भी उनकी बगल में बैठ गई “हाँ बताइए” ।

मिसेज शर्मा ने कहना शुरू किया …..अरे वो तुम्हारी खाना बनाने वाली है ना सरोज ....उसे हो सके तो कल थोड़े देर के लिए मेरे यहाँ भेज देना...कल हवन है, कन्यापूजन भी रखा है ...काम ढेर सारा है और तुम्हें तो पता है हमारी कामवाली अपने गाँव जा रखी है, बहू का भी पाँचवां महीना चल रहा है और मैं नहीं चाहती कि इस बार पिछली बार की तरह कोई दिक्कत हो जाए....। “जी ठीक है मैं सरोज को बोल दूंगी वो आ जाएगी आपके वहाँ”... प्रतिमा ने बीच में कहा । “हाँ बेटा उसे बोल देना सुबह ही नहा धो कर आ जाए… कन्यापूजन के लिए प्रसाद तैयार करना है ....अब मुझसे भी इतना खाना पकाना होता नहीं है” मिसेज शर्मा ने अपनी बात पूरी की । “अरे आप बिल्कुल परेशान मत होइए ....बड़े साफ सुथरे तरीके से काम करती है और खाना भी अच्छा बनाती है”…. प्रतिमा ।

“हाँ वही तो इसीलिए मैंने सोचा की सुबह के लिए उसे बुला लेती हूँ...” एक थैले को खोलते हुए मिसेज शर्मा..... “ये देखो कल कन्यापूजन पर बच्चियों को देने के लिए कपड़े खरीदे हैं....चार चार सौ किए थे पर इकट्ठे इतने लिए तो ढाई सौ के हिसाब से लगाए”..... कॉटन के फ्रॉक दिखाते हुए मिसेज शर्मा बताए जा रही थी ...इसके साथ कुछ नकद रख दूंगी, अब हर साल करते आए हैं तो .....। प्रतिमा ने मुस्कराते हुए बोला… “अच्छा है आंटी , व्रत तो मैंने भी रखा है पर इतना सब नहीं हो पाता” । मिसेज शर्मा अबकी समझाते हुए “करना चाहिए बेटा.. इन सबका ही फल मिलता है इस कलयुग में, पूजा पाठ से मन की शान्ति और घर की सुख समृद्धि सब बनी रहती है.. अब हमें ही देख लो कितने सालों से चैत और शरद, दोनों के ही नवरात्र में घर में कन्यापूजन रख रही हूँ.. ये तो अब मुझे भी याद नहीं पर इसी का फल है कि घर-बार, बेटा-बहू सब पर माता रानी की कृपा बनी हुई है”। थोड़ा गम्भीर होते हुए “अब रजनी का तो तुम्हें पता ही है पिछली बार छठे महीने में ही बच्ची नुकसान हो गई लेकिन सब कुछ दवा-इलाज और पैसो पर ही बिता , रजनी की तबीयत ज्यादा नहीं बिगड़ी । एक बात और है हमारे यहाँ पहली संतान बेटा ही होता है ..वो तो नियति थी कि लड़की आनी नहीं थी घर में और वो हादसा हो गया.......और इस बार तो हमारे पंडित जी ने भी रजनी का चेहरा देख बोला है कि बेटा होगा” । आंटी इत्मीनान से बताए जा रहीं हैं, पर अबकी उन्होंने जो बोला है उसने प्रतिमा को असहज कर दिया , उसे सूझ नहीं रहा कि कैसे उनकी बात का जवाब दे ..और जब मिसेज शर्मा अपनी बात पूरी कर जाने लगी ये कहते हुए कि.. “बेटा सरोज को बोल देना सुबह 9 बजे तक आ जाए, 10 बजे हवन का टाईम रखा है पंडित जी ने.... ग्यारह साढे ग्यारह तक कन्यापूजन हो जाए तो ठीक रहेगा” …… तो इस पर प्रतिमा ने सिर्फ इतना कहा कि “ठीक है मैं सुबह भेजती हूँ सरोज को” ।

उनके जाने के बाद प्रतिमा कुछ देर तक सोचती रही कि कैसी धारणा है ...कन्यापूजन के नाम पर इतना सब कर सकते हैं पर खुद के आंगन में पहली किलकारी पोते की सुननी है जो उनका वंशबेल आगे बढाए। घर बार, पैसे से सम्पन्न है पर सोच वही दकियानूसी है। प्रतिमा का अच्छा व्यवहार है शर्मा परिवार से , कुछ महीने पहले ही वो अपने पति के साथ इस कॉलोनी में किराए के फ्लैट में रहने आई है जहां बगल में शर्मा जी का अपना मकान है। पिछले साल ही वो सरकारी नौकरी से रिटायर हुए हैं और अब शहर के मेन इलाके में एक बड़ा सा जनरल स्टोर खोल लिया है ..बेटा प्राइवेट कम्पनी में अच्छी जॉब कर रहा है। इस नई जगह में, मिलनसार स्वभाव की मिसेज शर्मा से प्रतिमा का मेलजोल काफी हो गया है..त्यौहार उत्सव से लेकर हर सुख-दुख में भागीदारी है। आंटी के रूप में उसे एक बड़े बुजुर्ग का स्नेह मिलता है जो आत्मीयता से सलाह मशवरा देती रहती हैं उसे लेकिन अभी जो बात उन्होंने कही थी, वो प्रतिमा के लिए स्वीकार्य नहीं थी । महिला संस्था से जुड़ी हुई प्रतिमा, कार्यक्रमों और व्याख्यानों में स्त्री सशक्तीकरण ,लैंगिक समानता और बच्चियों के अधिकारों की पैरवी करती आई है पर यहाँ उसे कुछ नहीं सूझा कि वो आंटी को क्या बोले .. ये शायद सामने बैठी आंटी का लिहाज था या कुछ और.. पर वह चुप्पी साध गई और उसका सारा स्त्री विमर्श धरा का धरा रह गया । थोड़े देर में उसने सरोज को फोन कर सुबह के लिए बोल दिया।

अगली सुबह सरोज, 9 बजे से पहले ही शर्मा जी के यहाँ पहुँच गयी है । चैत नवरात्र के नवमी का दिन है ....घर में हवन की तैयारी चल रही है । मेन गेट खुला हुआ है , सरोज पीछे के रास्ते से सीधे आंगन में आई जहां बीच में हवनकुण्ड, आम की सुखी लकड़ियाँ और दूसरी पूजा सामग्री रखी हुई हैं। आँगन में खड़ी सरोज ने एक धीमी आवाज लगाई ... “अम्मा” जिसे सुन कर मिसेज शर्मा ने कमरे की खिड़की से ही तुरन्त उत्तर दिया ... “आती हूँ” । कमरे से निकलती हुई मिसेज शर्मा ... “अच्छा हुआ तू टाईम पर आ गई ....मैं तो इन्तजार ही कर रही थी ...चप्पल निकाल आ जा” । सरोज ने चप्पल उतार कर एक किनारे रख दी और आंगन में लगे नल को खोल हाथ पैर धो लिए फिर उनके पीछे किचेन की तरफ चल पड़ी । किचेन में पहुँच कर मिसेज शर्मा उसे सामान दिखा कर समझाने लगी ... “ये आटे का पैकेट है ,वो सूजी..रवा ,शक्कर ,घी तेल सब रखा है.... काले चने इस बर्तन में भिगोए रखे हैं बाकी बहू तुम्हें बता देगी,वो अभी नहा कर आ रही है ..तुम तब तक आटा गूँथ लो” । सरोज ने हामी में सिर घुमाते हुए साड़ी का पल्लू कमर में बांध लिया । मिसेज शर्मा ने एक बड़ी थाल निकाल कर उसे थमा दी और वो नीचे बैठ कर आटा निकालने लगी, तभी अन्दर प्रवेश करती रजनी को देख मिसेज शर्मा बोली.. “ये लो बहू भी आ गई अब तुम दोनों देख लो, मैं जरा पंडित जी से बात कर पूजा की तैयारी कर लूँ..वो भी आ कर बैठे हुए हैं” ये कह कर वो चली गईं।

रजनी ने गैस पर कढाई चढाई और सूजी भूनने लगी हलवे के लिए, बगल में बैठी सरोज आटा गूंथ रही है और बीच बीच में उसे देख रही है । उम्र उसी की होगी यही 26... 27, पर फर्क ये है कि रजनी पढी लिखी शहर की युवती है जो दो साल पहले ब्याह कर इस घर में आई है जबकि उसका का ब्याह तो दस साल पहले हो गया था अब तो आठ साल की बच्ची भी है। यूँ तो उसने मिसेज शर्मा की बहू को पहले भी आते जाते देखा था पर आज करीब से देख रही है .. लेटेस्ट डिजायनर शिफॉन की साड़ी पहन रखी है.. हाथ, कान, गले सबमें सोने के जेवर हैं। चेहरे पर हल्का मेकअप है पर प्रेगनेन्सी की वजह से तबीयत नाजुक लग रही है। आटा गूँथने के बाद सरोज, रजनी से पूछ कर दूसरे काम निपटाने लगी..... दोनों किचेन में तेजी से कामों में लगी हुई हैं । इस बीच मिसेज शर्मा भी कई दफे किचेन में आ जा चुकी हैं और अब वो शर्मा जी के साथ पूजा में बैठी हैं। आँगन से पंडित जी के मंत्रोच्चार किचेन में साफ सुनाई पड़ रहे हैं साथ ही छोटी बच्चियों की आवाजें भी... कन्यापूजन के लिए बच्चियाँ घर में आनी शुरू हो गयी हैं, जिनमें कुछ आँगन के एक तरफ पर बैठी खेल रही हैं। कुछ देर बाद मिसेज शर्मा ने रजनी को आरती और पंडित जी का आशीर्वाद लेने के लिए बुलाया।

हवन के बाद मिसेज शर्मा ने कन्यापूजन शुरू की.... बच्चियों के पैर धोए , माथे पर कुमकुम का टिका किया । रजनी भी बड़े स्नेह से प्रसाद लगा रही है ...बच्चियों के सामने रखे थालियों में पूड़ी, हलवा और चने परोस रही है। बगल में खड़ी सरोज ये सब देख रही है, उसके यहाँ तो नवरात्र का मतलब शारदीय नवरात्र से है जब उसके गाँव में पंडाल और मेले लगते हैं । प्रसाद के बाद मिसेज शर्मा बच्चियों को कपड़े देने लगी तो उनके चेहरे खिल पड़े , वे अलग ही उमंग में है ....मासूमियत से कभी एक दूसरे के माथे पर लगे टीके को निहार रही हैं तो कभी हाथ में मिले फ्रॉक को, उनके लिए तो वो उपहार हैं। कुछ देर में जब बच्चियाँ चली गयी तो मिसेज शर्मा ने सरोज को डेढ सौ रूपए थमाए और रजनी से उसे प्रसाद देने के लिए बोला।

रजनी जब उसे प्रसाद देने लगी तो सरोज ने कहा ... “बहू जी इसको एक थैले में रख देती तो अच्छा होता” । ये सुन पास में खड़ी मिसेज शर्मा ने बोला… “क्या हुआ सरोज ! यहीं खा लो आराम से बैठ कर” । जिस पर सरोज तुरन्त बोली “अम्मा मेरी बिटिया है ना पूजा, उसको ये पूड़ी हलवा का प्रसाद बहुत पसन्द है...उसी के लिए रख रही थी”। ये सुन मिसेज शर्मा ने रजनी को उसे अलग से प्रसाद देने के लिए कहा और सरोज से बोला... “बिटिया को यहीं लाती कन्यापूजन में” । सरोज... “हाँ पर वो स्कूल गयी है ना, नहीं तो लाती उसको यहाँ”। मिसेज शर्मा... “अरे आज तो सारे सरकारी स्कूल बन्द है...कहाँ पढ़ती है वो” ? सरोज बताने लगी ... “जी वो चौराहे के सामने स्कूल है ना .. ‘मेर्री एंजेल पब्लिक स्कूल ’ उसी में”। मिसेज शर्मा सवालिया लहजे में... “अच्छा उसकी फीस तो बहुत ज्यादा है, तुम्हें महँगा नहीं पड़ता” । सरोज… “अम्मा, अब क्या ज्यादा क्या महँगा ! एक ही तो औलाद है हमारी...उसी के लिए हम पति पत्नी दोनों जन मेहनत कर रहे हैं...वो फैक्ट्री में लगे रहते हैं और मैं दूसरों के घरों में, अब हम गरीब लोगों के पास दूसरा कोई कर्मकाण्ड तो है नहीं बस वो पढ़ लिख कर कुछ काबिल बन जाए इसी जुगत में लगे हैं”। आगे उत्साह से कहने लगी “पूजा पढ़ने में भी बहुत अच्छी है उसकी टीचर जी ने ही अपनी सिफारिश पर उसका दाखिला कराया है, अब तो हम दोनों जन की एक ही चाह है कि हमारी ‘पूजा’ सफल हो जाए”।

सरोज की बाते सुन मिसेज शर्मा चुप सी हो गईं और उनका चेहरा थोड़ा संजीदा हो चला है । इतनी देर में रजनी एक थैले में प्रसाद पैक कर लाई जिसे लेकर सरोज चली गयी लेकिन आंगन में खड़ी मिसेज शर्मा अभी भी सरोज की बातों में खोई हैं तभी शर्मा जी ने आवाज लगाई “सुनती हैं! कन्यापूजन हो गया हो तो …हमें भी प्रसाद दे दीजिए, दुकान के लिए निकलना है जरा..” । इस पर मिसेज शर्मा का ध्यान टूटा पर उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया । तो शर्मा जी ने फिर से तेज आवाज में पूछा “अरे भई! कन्यापूजन हुआ कि नहीं ?” अबकी उन्होंने सिर्फ इतना सा जवाब दिया है कि “ला रही हूँ प्रसाद” लेकिन ये ना कह पाईं कि “कन्यापूजन हो गया”।

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another good story that reveals the patriarchal mindset that still exists today.. leaves the reader pondering..
good wishes yash!

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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