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व्यंग्य-राग (१४) गहरे पानी पैठ / डा. सुरेन्द्र वर्मा

कहावत तो यही है, लेकिन एक बड़ी मुश्किल यह है पानी की गहराई तक पहुंचा कैसे जाए ? गहरे पानी में आदमी डूब सकता है, किसी तेज़ लहर के साथ बह सकता है. उसकी जान को बड़ा खतरा है. कुछ भी हो सकता है. कहने वाले ने तो कह दिया. वह तो भुगतने के लिए अब है नहीं. अब तुम भुगतो. किसी भी चीज़ की, बात की, चाल की, सांस की गहराई समझना क्या कोई हंसी खेल है? चीज़ सतह पर मामूली सी लगती है लेकिन उसे यदि गहराई से देखा जाए तो वह असाधारण हो सकती है; बात जाहिरा तौर पर उथली लगती है लेकिन उसका अर्थ बड़ा गहरा हो सकता है; लोग गहरी सासें भरते हैं – अब कौन जाने कितनी गहरी वे होती है; और हाँ, चाल भी तो गहरी हो सकती है, तेज़ रफ़्तार- चतुराई से भरी. एक दम कौन समझ सकता है इस गहराई को ? ‘गहरे पानी पैठ’ - गहरे पैठ पाना कोई आसान काम नहीं है.

गंगा-जमुनी तहजीब के शहर इलाहाबाद में सावन का महीना वैसे तो शिव की उपासना के लिए मुक़र्रर कर दिया गया है लेकिन यह कौमी एकता का सन्देश भी लाता है. और इस कौमी एकता का दर्शन-दिग्दर्शन इक्कों में जुते घोड़ों की दौड़ की प्रतियोगिता कराती है, जिसे ‘गहरेबाजी’ कहा गया है. सावन के चारों सोमवार गहरेबाजी के लिए मशहूर हैं. एक निर्धारित समय पर इच्छुक घोड़ेवान अपने अपने घोड़ों को इक्के में सजा कर प्रतियोगिता के लिए सड़क पर ले आते हैं. और शुरू हो जाती है उनकी दौड़ की प्रतियोगिता. इस प्रतियोगिता में घोड़ा हिन्दू का है या मुसलमान का, इसपर ध्यान नहीं दिया जाता. गहरेबाजी में हिन्दू और मुसलमान सब एक हो जाते है. कहा जाता है कि भारत में स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों में जब अंगरेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई, उसी दौर में हिन्दू और मुस्लिम का भेदभाव छोड़ कर घोड़ागाडियों के मालिक एक जुट हुए और उन्होंने गहरेबाजी की प्रतियोगिता शुरू की. तब से यह प्रतियोगिता कौमी एकता की मिसाल बनी हुई है. अब तो आप समझ ही गए होंगे की गहरेबाजी कोई साधारण खेल नहीं है, इसके पीछे एक गहरी बात है जो उन दिनों हमारे तब के हुक्मरानों को शायद समझ में ही नहीं आई थी !

गहरेबाज़ी की रवायत बेशक पुरानी है, लेकिन आज भी कायम है और गंगा-जमुनी तहजीब को मज़बूती दे रही है. इस स्पर्धा में जो घोड़े हिस्सा लेते हैं उन्हें महीनों से तंदुरुस्त रखने के लिए अच्छी गिज़ा दी जाती है. उन्हें चना, दूध, मक्खन, बादाम और काजू खिलाए जाते हैं. कई मानुष योनी के लोग हाय हाय करने लगते हैं कि काश हम भी घोड़े होते! अपनी अपनी किस्मत ! बहरहाल घोड़ों के साथ साथ इक्कों और बग्घियों को ही नहीं कोचवान को भी खूब सजाया जाता है. गुणों के हिसाब से घोड़ों का नामकरण किया जाता है -कोई कन्हैया तो कोई सुलतान होता है. कोई आंधी तो कोई तूफ़ान होता है. और तब शुरू होती है सडकों पर गहरेबाजी. सड़क के दोनों तरफ पटरियों पर हर मज़हब के दर्शकों का मजमा लग जाता है. सभी दम साधे खड़े रहते हैं – कभी ‘आह’ और कभी ‘वाह’ के साथ इस शानदार दौड़ का मज़ा लेते हैं, लुत्फ़ उठाते हैं. पूरे जोश और जज्बे से लबरेज़ घोड़ों की तेज़ रफ़्तार चाल की लय-ताल से सभी हैरत में पड़ जाते हैं. जैसे जैसे घोड़ों की रफ़्तार तेज़ होती जाती है दर्शकों का रोमांच भी बढ़ता जाता है. घोड़ों की चाल में हर अदा देखी जा सकती है. घोड़े कभी दुलकी चाल से चलते हैं तो कभी सरपट भागते हैं. बीच बीच में ठुमके लगाते भी देखे जा सकते हैं.

सड़कें तो आप जानते ही हैं, कैसी हैं. जैसी तब थीं वैसी ही अब हैं. बल्कि बढ़ते भ्रष्टाचार के चलते और भी भ्रष्ट हो गईं हैं. ऐसी ही सडकों पर गहरेबाजी संपन्न होती है. सड़क कहीं उखड गयी है तो कहीं उसमे गड्ढे हैं. बहरहाल ऐसी ही सडकों पर घुड़-दौड़ होती है. इससे यह साधारण दौड़ न रहकर बाधा-दौड़ हो जाती है. इसे बाधा दौड करने के लिए सडकों को तो धन्यवाद देना ही चाहिए साथ ही बेतरतीब ट्रेफिक और प्रशासनिक अनदेखी आदि कारकों का भी कम शुक्रगुजार नहीं होना चाहिए. इनके कारण न चाहते हुए भी गहरेबाज़ी बाधा दौड़ बनकर हमारे रोमांचकारी आनंद (?) में और भी इजाफा कर देती है. खेल में यदि रोमांच न हो तो वह खेल ही क्या ? खुदी हुई सड़कें दिल की धड़कनें बढाती हैं, और बेतरतीब यातायात इसमें बढ़त करता है. दर्शक दम साधे तमाशा देखते हैं. कहीं घोड़ा गिर न जाए, बिगड़ न जाए – यह अंदेशा गहरेबाज़ी को और भी गहरा बना जाता है तथा प्रशासनिक उदासीनता अपनी तरफ से हमारे रोमांच को बाकायदा कायम रखती है.

गहरेबाज़ी में बेशक एक गहराई है. तेज़ रफ़्तार की गहराई है, रोमांच की गहराई है. इसके गहरे सोच में कौमी-एकता की गहराई है.

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