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कब तक पालते रहें इन्हें ? - डॉ. दीपक आचार्य

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जाने कब से बोलते और सुनते आए हैं - अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काज, दास मलूका कह गए सबके दाता राम। मलूकदास को इस मामले में त्रिकालज्ञ ही मानना होगा क्योंकि उन्होंने के आज के वर्तमान को अपने समय में ही देख लिया था।

उस समय ऎसे लोग जरूर रहे होंगे लेकिन उनकी संख्या उतनी नहीं होगी जितनी आज है।  उन्होंने तो केवल अजगर और पंछियों के लिए ही यह कहा था लेकिन आज के हालातों को देखें तो यह सूची इतनी लम्बी हो चली है कि कहाँ से आरंभ करें और कहाँ अंत, इसकी सूझ ही किसी को नहीं पड़े।

सूझ पड़ भी जाए तो इसका निर्णय करना किसी के बस में नहीं है कि किसे सम्मानजनक ढंग से क्रम में आगे रखे और किसे पीछे क्योंकि यहाँ हर कोई वीआईपी होकर आगे ही आगे रहना चाहता है चाहे कोई सा मामला हो। किसी को थोड़ा सा पीछे कर दो तो पीछे ही पड़ जाए।

दया, करुणा और कृपा हमारे देश की वह थाती है जिसने युगों-युगों से लोगों को पाला है और इसे धर्म समझ कर पुण्य पाया है।  आज के माहौल में हर तरफ भीड़ का मंजर है जिसमें से कई सारे लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये दूसरों की दया और कृपा पर पल रहे हैं वरना इनमें इतनी औकात ही नहीं है कि खुद के बूते जी सकें।

इसी प्रकार बहुत से लोगों के बारे में यह भी कहा जाता है कि इन्हें हम पाल ही रहें हैं। वैसे पालना शब्द श्रेष्ठ पालक के लिए होता है लेकिन यहां इसका अर्थ है उन लोगों से जो पराश्रित होकर पल रहे हैं और दूसरों की दया, करुणा तथा कृपा पाकर अपने आपको पाल रहे हैं।

पशुओं को पालने वाले भी खूब हैं लेकिन पशुओं से इन पलने-पलवाने वाले लोगों की तुलना करना पशुओं के साथ अन्याय होगा क्योंकि पशु बुद्धिहीन हैं इसलिए उनमें ज्ञान, विवेक और दृष्टि का अभाव है लेकिन जो लोग पल रहे हैं, जिन्हें किसी न किसी के द्वारा पाला जा रहा है वे बुद्धिहीन नहीं हैं, उनमें ज्ञान या विवेक की कोई कमी नहीं है बल्कि ये लोग सब कुछ जानते-बूझते हुए भी कुछ करना नहीं चाहते हैं इसलिए इन्हें पशुओं से श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है।

पशुओं से इनकी तुलना बेमानी भी है क्योंकि पशुओं से मनचाहा काम कराया जा सकता है, हर पशु किसी न किसी रूप में उपयोगी है। यहां तक की पशुओं का शरीर, मल-मूत्र तक काम किसी न किसी उपयोग का होता है लेकिन इन लोगों का कुछ भी काम नहीं आता, न ये किसी काम के हैं। बल्कि हकीकत यह है कि ये लोग समाज और देश से लेकर धरती तक के लिए भारस्वरूप ही हैं।

पलने वालों की भी कोई कमी नहीं है और पालने वालों की भी। हर तरफ दोनों ही किस्मों के लोग हैं। इनमें भी ढेरों ऎसे मिल जाएंगे जिनके बारे में लोग दुःखी होकर यही कहा करते हैं कि पालना पड़ रहा है इनको, न पालें तो कहां जाएं।

इंसानी जीवट और जीवनीशक्ति का इतना अधिक ह्रास हो गया है कि लोग अपने सामथ्र्य, क्षमताओं, हुनर और बौद्धिक कौशल को विस्मृत कर पलने को आतुर हैं। दूसरों की दया पर जिन्दा रहना  अपने आप में इंसान का अपमान है।

पुरुषार्थहीन, दरिद्री और निकम्मे लोग ही औरों की कृपा पर जिन्दा रहा करते हैं अन्यथा जिनमेंं दम-खम होता है, इंसान होने का ज़ज़्बा रहता है वे लोग स्वाभिमान और पुरुषार्थ के साथ जिन्दा रहते हैं। उन्हें न किसी की दया या कृपा चाहिए होती है और न किसी की सिफारिश या अभयदान। 

जो पल रहे हैं वे भी खुश हैं और मजबूरी में जो पाल रहे हैं वे भी किसी से कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं।  भगवान सबका ध्यान रखता है और सबके लिए व्यवस्था करता है। बोलो मलूकदास महाराज की जय।

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