बुधवार, 15 जून 2016

शबनम शर्मा की कविताएँ

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(ऊपर की कलाकृति - आलोक कुमार, डिप्टी जेलर, कानपुर नगर)

 

रिश्ते

रिश्ते नातों में रखा क्या है,

बेकार की बातों में रखा क्या है,

बंधने को बहुत कुछ है जग में,

रिश्ते बाँधने में रखा क्या है,

बाँट के प्यार, नाम मत दो कोई,

नफ़रत के निशानों में रखा क्या है,

आग बरपा दे जो बात जहाँ में,

ऐसे अफसानों में रखा क्या है,

ग़र पहचान ले इंसा, इंसा को,

फिर खून खराबों में रखा क्या है,

बीज इन्सानियत के बोते चलो तुम,

हैवानियत के दरख्तों में रखा क्या है,

सच्चाई की एक ईंट ही काफ़ी,

झूठ की इमारतों में रखा क्या है,

मंदिर अहिंसा का, बनाओ यारों,

हिंसा के खंजरों में रखा क्या है।

 

ऐ पाक

आज हम जहाँ हैं खड़े जिस मुकाम पे,

पहुँचे हैं हम यहाँ पे कुरबानियों के बाद,

भारत महान सबको पता, हम कहें तो क्या,

लो माफ़ कर दिया तुम्हें, नादानियों के बाद,

अभी वक्त है संभल जा कहीं देर न हो जाये,

न जाने क्यूँ है बक्शा, तेरी खामियों के बाद,

आज़ादी मिल गई पर आज़ाद तू नहीं,

तू क्यूँ बहाता खून नाकामियों के बाद,

कब्रों पे कब बने हैं महल, जीत कब हुई,

हम चैन से जीयेंगे कुर्बानियों के बाद,

कहीं ऐसा न हो, तेरा, नामों निशां न बचे,

पहले कभी नहीं था, अब हो न इसके बाद।

 

वो सीढ़ी दर सीढ़ी उतारता चला गया,

वो ज़िन्दगी से हमको निकालता चला गया,

समझा था जिसको हमने ताज़-ए-ज़िन्दगी,

गैरों को वो हरदम संभालता चला गया,

भिगोए थे जिसकी याद में तकिए कई,

वो अश्कों को अपने संभालता चला गया,

गया वो हमारी बस्ती के बुझा सारे चिराग

चिंगारी को अपनी वो संभालता चला गया,

हिज्र में हम उनकी सो ही गये थे,

टुकड़े कफ़न के वो अब संभालता चला गया।

& शबनम शर्मा ] अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.

मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

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