मंगलवार, 7 जून 2016

व्यंग्य-राग (१५) कुत्ता – देशी बनाम विदेशी / डा. सुरेन्द्र वर्मा

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भेडिया, लोमड़ी और गीदड़ की जाति का एक पशु है, कुत्ता. लेकिन कुत्ते की बेवफाई देखिए उसने अपनी जाति के साथ रहना छोड़ दिया है और आदमियों के साथ रहने लगा है. इंसान को भी कुत्तों के साथ रहना बड़ा रास आ गया है. उसके नैसर्गिक गुणों से प्रभावित होकर कुत्ते को पालतू बना लिया गया है. सिर्फ इतना ही नहीं, आदमी ने उसकी अनेक विशेषताओं को अपना भी लिया है और ये विशेषताएं इंसान की मानों अपनी ही दोयम प्रकृति बन गई हैं. लार टपकाना, पूंछ हिलाना, भौंकना आदि, जैसे कुकुर-गुण अब मानवी गुण हो गए हैं. ये गुण आदमी के चरित्र और उसकी संस्कृति की विशेषताएं गिनी जाने लगी हैं.

आदमी कुत्ते को एक बफादार पालतू जानवर के रूप में देखता है और उसे अपना एक भरोसेमंद साथी मानता है. कारण स्पष्ट है. कुत्ते ने आदमी से कभी बेवफाई नहीं की, बल्कि जब भी काम पडा उसने इंसान का साथ दिया भले ही वह जानवरों का - जैसे भेडिया, लोमड़ी. गीदड़ आदि, जो पशु होने और उसकी अपनी जाति के होने के कारण जैविक रूप से उसके अधिक नज़दीक हैं, - साथ न दे पाया हो. जानवरों के शिकार के लिए आदमी कुत्तों को ही साथ ले जाता है. इंसान की बस्ती में गृह-मृग और ग्राम-सिंह की तरह उसने अपनी पहचान बनाई है.

पर दूसरी तरफ, आदमी को देखिए. उसने कुत्ते को हमेशा हिकारत की नज़र से ही देखा. कुत्ता उसके लिए एक गाली है. उसका सोचना है कि जो अपनों का नहीं हो सका ,वह दूसरों का भला क्या होगा? आदमी को जब भी किसी की फजीहत करना होती है, वह उसे “कुत्ता” कहने से बाज़ नहीं आता. कुत्ता आदमी के लिए हमेशा गाली ही रहा. उसका सर-नेम कभी नहीं बन पाया. आपको इंसानों में ‘सिंह’, ‘भेंडिया’, ‘लैम्ब’ जैसे कुल-नाम मिल जाएंगे लेकिन ‘कुत्ता’ सर-नेम कहीं नहीं मिलेगा. नाम में भला क्या रखा है? भले ही आदमी का कुल-नाम कुत्ता न भी हो कुत्ता-कुल की हरकतों से उसे वंचित नहीं किया जा सकता.

क्योंकि आदमी कुत्ता पालता है इसलिए वह सुबह-सबेरे ‘मोर्निंग-वाक’ पर उसे भी ले जाता है. उस समय यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि इनमें से कौन पालक है कौन पालतू. कुत्ते की ज़ंजीर बेशक आदमी के हाथ रहती है लेकिन बस, कहने भर को. वस्तुस्थिति यह है कि कुत्ते के इशारे पर ही आदमी की सैर निर्भर करती है. कुत्ता कहता है तो वह चलते चलते रुक जाता है, कुत्ता कहता है तो वह चलना दुबारा शुरू कर देता है. जब तक फारिग होकर कुत्ता इशारा नहीं कर देता मजाल कि आदमी आगे बढ सके.

कुत्ते ने आदमी पर अच्छा-खासा दबदबा कायम कर रखा है. वह आदमी पर इतना हावी हो गया है कि अपनी इंसानियत भूल कर आदमी के मन पर कुत्तई सवार हो गयी है. वह अपनी ही बिरादरी के लोगों का दुश्मन बन गया है. इंसान और इंसानियत को ख़त्म करने के उसने तरह तरह के हथियार आविष्कृत कर लिए हैं. वह अपने ही लोगों का खूँख्वार मांस-भक्षी और अस्थि-भोजी बन गया है. उसे सुधारने की, लगता है, अब कोई गुंजाइश ही नहीं रही है. उसकी पूंछ जो ज़ाहिरा तौर पर दिखाई नहीं देती, टेंडी की टेंडी ही है.

कुत्ते का काटा आदमी पानी नहीं मांगता. बल्कि पानी से डरने लगता है. उसका अपना पानी भी सूख जाता है. पागल कुत्ते की तरह अपनी टेंडी पूंछ को सीधी करके दौड़ने लगता है. अपनी इस संवेदनहीनता के चलते दौड़ते-दौड़ते गिर जाता है और कुत्ते की मौत मर जाता है. अपनी भयानक स्थिति के प्रति वह पूरी तरह बेखबर और लापरवाह हो जाता है. कितने ही कुत्ते अपनी ही बनाई इस जेल में सड़ जाते हैं, ता-उम्र सड़ते रहते हैं. कोई क्या कर सकता है.

फिर भी कुत्ते बड़े प्यारे होते हैं. खासतौर पर सजावटी कुत्ते. बड़े-बड़े बालों वाले छोटे-छोटे कुत्ते – सफ़ेद, काले या भूरे कुत्ते, इंसान की गोद में बड़े खूबसूरत लगते हैं. टीवी में ऐसे कुत्तों को शैम्पू कराते, नहलाते, दुलराते, चूमते देखता हूँ तो लगता है इन कुत्तों को पालने वाले इनके सामने टिक नहीं सकते.

इधर राजनीति में भी कुत्तों का हस्तक्षेप होने लगा है. कई वर्ष पहले अमेरिका में सेंट फ्रांसिस्को नाम के एक शहर में वहां के निवासियों ने ‘बॉस’ नामक एक कुत्ते को अपना मेयर चुन लिया था. उनका तर्क था कि कुत्ता राजनीति नहीं कर सकता है. वह आदमी की तरह फालतू के सरकारी झमेलों में भी नहीं पड़ता. आज भी जो लोग राजनीति में आते हैं, उन्हें राजनीति से कोई मतलब नहीं रहता. वे बस सरकारी कोश को लूटने के लिए ही आते हैं. और रईसों के कुत्तों की तरह ठाट से रहते हैं.

कुत्ता तो कुत्ता होता है. कहीं का भी हो. देशी हो विदेशी हो. पर भारत में विदेशी कुत्तों को कुछ ज्यादह ही तवज्जह दी जाती है. एक मर्तबा गांधीजी की समाधि पर विदेश से आए किन्हीं पर्यटकों को अपने कुत्ते के साथ परिक्रमा लगाने की इजाज़त मिल गई. देशी कुत्तों को यह कभी नसीब नहीं होती. कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि भारत में देशी कुत्ता क्या देशी नेता तक कभी पसंद नहीं किया गया. वह विदेशी भले न हो, कम से कम ‘विदेशीवत’ तो होना ही चाहिए. विदेशी हो तो और भी अच्छा ! हर इम्पोर्टेड वस्तु के लिए हमारी ललक देखते ही बनती है.

बहरहाल, इंसान की तहजीब में कुत्ते ने अपनी एक अहम जगह बना ली है. कुत्ता सिर्फ कुत्ता नहीं रह गया है. बंदूक का घोड़ा भी कुत्ता है और किबाड का खटका भी कुत्ता ही है. कुत्ता गाली है, फजीहत है. विश्वस्नीयता का माप है, नीचता का पैमाना है. धर्म और राजनीति में उसकी पैठ है. वह भैरव का वाहन है और राजनेता युधिष्ठिर का नरक तक का साथी है. .....................................................................................................

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