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अब तो दूर हो शिक्षण के राह की बाधायें / प्रदीप कुमार साह

शिक्षक हैं नहीं, कैसे हो पढ़ाई? इस समाचार-शीर्षक से दैनिक जागरण के चौथे पृष्ट पर भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में शिक्षकों के आभाव में पठन-पाठन बाधित होने से संबंधित एक खबर छपी.जिसमें बताया गया कि उक्त कॉलेज राज्य के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान सूची में शुमार हैं.किंतु सिविल, इलेक्ट्रिकल,मेकेनिकल, कम्प्यूटर इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन शाखाओं को मिलाकर स्थायी शिक्षकों की कुल स्वीकृत 76 पदों के अनुपात में यहाँ प्राचार्य सहित मात्र 20 शिक्षक ही कार्यरत हैं. पुनः इन्हीं 20 शिक्षकों पर उपरोक्त शाखा के कुल 850 छात्र-छात्राओं के भविष्य टिके हैं. जबकि अपने भविष्य को लेकर चिंतित छात्रों ने पूर्व में भी वहाँ दिन-प्रतिदिन होते शिक्षकों की कमी और पठन-पाठन बाधित होने से संबंधित समस्या के समाधान प्राप्ति के उद्देश्य से कई बार धड़ना-प्रदर्शन करते रहे हैं.शायद सामान्यजन को यह एक अदना सा खबर प्रतीत हुये हों,संभवतः तभी इस खबर को एक प्रादेशिक अख़बार में भी चौथे पृष्ठ पर जगह मिलीं.

परंतु क्या अखबारनवीस के नजर में छात्र और उनके भविष्य का कुछ अधिक महत्व नहीं हैं? तब उस खबर को अख़बार द्वारा प्रमुखता नहीं मिलने के पीछे क्या वजह हैं? किंतु वैसा कुछ कहना शायद अनुचित होगा.वास्तव में देश के विभिन्न हिस्से से वैसी खबर आती रहती हैं. कभी इसी तरह बिहार के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी शिक्षकों की कमी से जूझती रही थी,जिसे पिछले कुछ वर्ष में संविदा पर नियुक्ति कर पद रिक्तियाँ भरने और विद्यालय में पठन-पाठन के समुचित प्रबंधन की कोशिश की जाती रही हैं. परंतु उपरोक्त तथ्य के आधार पर यह बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता कि यह स्थिति केवल बिहार राज्य में हैं. बल्कि कमो-बेश यह स्थिति प्रत्येक राज्य की है.जहाँ एक तरफ देश में शिक्षण के राह की सबसे बड़ी बाधा न केवल विद्यालय का अपर्याप्त संख्या में होना हैं अपितु शिक्षण संस्थान में उचित संसाधन की कमी भी हैं.तब उस खबर के साथ भला वैसे व्यवहार क्यों न हो?

जहाँ एक तरफ 12वीं के बाद अक्सर छात्र प्रथमतः तो इस बात को लेकर भी भ्रमित रहते हैं कि वे इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जायें, मेडिकल में जायें, सिविल सर्विसेस की ओर ध्यान दें या फिर माकेटिंग में अपना भविष्य बना सकते हैं.दरअसल यह उलझन हर उस विद्यार्थी की है जो विषयों के विकल्पों के बीच अपना भविष्य तलाश रहे हैं. वास्तव में वह इस बात को लेकर परेशान रहते हैं कि बहुत से रोजगारपरक पाठ्यक्रम में अपेक्षित कौन सा पाठ्यक्रम अपनाकर वे अपना भविष्य किस तरह संवार सके. क्योंकि उसके समक्ष आज इतने विकल्प हैं कि वह भ्रमित हो जाते हैं कि अगर उसने सही तरीके से विषय का चुनाव नहीं किया तो उसका भविष्य ही दाँव पर लग जाने हैं. ऑनलाइन49टेस्ट https://www.49test.com/ के सूत्रानुसार इसके लिये वह (छात्र) अपना प्रोफाइलिंग(मेरिट) टेस्ट तक कराते हैं. पुनः अपने लिये अपेक्षित शिक्षण क्षेत्र चुनने के पश्चात उपरोक्त समस्या से रू-ब-रू होना उन्हें अलग ही एक कुंठा प्रदान करता है. ऐसे में अनेक निजी संस्थान उनके हित के नाम पर सामने आती हैं.

किंतु अपनी गुणवत्ता बनाये रखने वाली अधिकतर शिक्षण संस्थान विकसित राज्य-प्रदेश के गिने-चुने अति-विकसित शहर में होती हैं.जहाँ सीमित पारिवारिक आय वाले अधिकांश छात्र रहकर अपनी पढ़ाई पूरा कर पाने में असमर्थ होते हैं.पुनः यह तथ्य भी किसी से छिपे नहीं हैं कि आज अधिकांश शिक्षण संस्थान पूर्ण रूप से व्यवसायीकरण पर उतर गये हैं,जिन्होंने शिक्षा और मुलभूत सुविधा प्रदान करने के नाम पर लूट मचा रखे हैं.यद्यपि इस समय देश में अपेक्षाकृत कम विकसित राज्य में भी जिस तरह से नए-नए संस्थान खुल रहे हैं, वहां पढ़ने वालों की तादाद बढ़ रही है,किंतु उसके मुताबिक शिक्षा के स्तर में कोई वृद्धि नहीं हुई है. तथापि (http://aishlypublicschool.com) जैसे ईमानदार शिक्षण संस्थान होती भी हैं. किंतु वैसे सुप्रसिद्ध संस्थान के समक्ष वे बौने नजर आते हैं या अन्य शिक्षण संस्थान के मध्य ओझल से प्रतीत होते हैं. फिर इस प्रकार के कई शिक्षण संस्थान वैसे हैं जो पूर्व के शिक्षण प्रदान करने के अपने किसी लंबे अनुभव के बिना ही अधिकाधिक लंबा-चौड़ा वादा करते नजर आते हैं.

इन चीजों से आहत होकर अधिकांश लोग पहले-पहल ही एक शिक्षण संस्थान के पृष्ठभूमि के संबंध में बिना अधिक जाँच-पड़ताल किये ही उसे संदेह की नजर से देखने लगते हैं. जबकि किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उसके बारे में यह पता कर लेना पूर्णतः उचित है कि उस संस्थान को समुचित रेगुलेटरी अथॉरिटी से मान्यता हासिल है भी अथवा नहीं.पुनः यह पता करना कि उसके कला संकाय यानि फैकल्टी या संभाग की गुणवत्ता, प्रोफेसर, लेक्चरर और असिस्टेंट प्रोफेसर का अनुपात, पाठ्यक्रम विविधता और शिक्षण संस्थान द्वारा प्रदत्त मुलभूत सुविधा कैसी हैं.इस तरह छात्र उचित शिक्षण संस्थान तक पहुँच ही नहीं पाते.तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य और केंद्र सरकार की नजर में छात्र और उनके भविष्य की क्या कुछ अहमियत है? क्या एक छात्र किसी राज्य और एक देश का एक युवा नहीं होते?

पुनः एक युवा देश हित में क्या अपने तकनीकी ज्ञान से अथवा अपने वैज्ञानिक सोच से अधिक परिवर्धित अपना श्रम देश को अर्पित न कर सकें? एक चिकत्सक या औषधिवेत्ता के रूप में या अन्यान्य क्षेत्र में विकसित अपनी सेवा भावना और अपना सहयोग कहीं अधिक कुशलता से अपने सुकृत्य के रूप में देश को समर्पित न कर सकें? क्या यह उनका अधिकार नहीं? अथवा एक अकुशल श्रमिक मात्र के रूप में अपने देश को संवारने की मुद्दत मिलना ही आज के युवाओं का नसीब है? यदि वह उनके अधिकार हैं तब उनके विकास का दायित्व क्या सम्बंधित सभी (राज्य और केंद्र) सरकार की नहीं है? अथवा समय के साथ यह मुद्दा भी सभी सरकार के लिये एक चुनावी मुद्दा मात्र बनकर रह गये हैं? यद्यपि केंद्र सरकार डिजिटल साक्षरता अभियान चलाकर वर्ष 2019 तक देश भर में 6.5 करोड़ लोगों को डिजिटल भारत कार्यक्रम की दृष्टि के तहत बुनियादी आईटी साक्षरता प्रदान करने के अपने संकल्प निर्धारित किये हैं और स्किल डेवलपमेंट अभियान चला रहीं हैं. तथापि वह सब कार्यक्रम कितना सफल रहेगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा.

किंतु डिजिटलीकरण ने निश्चय ही एक बहुत बड़ा बदलाव लाया.यदि आज आपके पास इंटरनेट सर्फिंग लायक एक मोबाईल उपकरण भी हैं तो आप अपने वांछित जानकारी,तथ्य,टेक्निकल रिव्यू या ट्यूटोरियल वगैरह गूगल पर सर्च कर सकते हैं.फिर इस क्षेत्र में गूगल जैसे दिग्गज कम्पनियों ने हिंदी सपोर्टेड प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवा कर जैसे हिंदी क्षेत्र में एक क्रांति ही ला दिया. यद्यपि यहाँ अभी हिंदी में वांछित चीजों की उपलब्धता काफी कम संख्या में हैं. किंतु एक मेहनती और जिज्ञासु छात्र अथवा प्रत्येक जागरूक व्यक्ति विभिन्न माध्यम और स्त्रोत से अपने हित में अपने कौशल और योग्यता में वृद्धि करने हेतु वांछित जानकारियाँ हासिल कर सकते हैं.ऑनलाइन49टेस्ट https://www.49test.com/ जैसी सेवा प्रदाता से अपनी योग्यता पहचानने में सहायता प्राप्त कर सकते हैं और अपना कैरियर संवारते हुये राष्ट्र निर्माण में सहयोग कर सकते हैं.बशर्ते सभी यह संकल्पित हों कि मेहनत करने वालों के लिये कुछ भी कभी नामुमकिन नहीं और सभी योग्य व्यक्ति भी अपने प्रति मातृभूमि के ऋण को सहजता से स्वीकारते हुये भावी प्रतिभा निर्माण हेतु निष्पक्षता और सहजता से अपना ज्ञान सहज जन-पहुँच वाले माध्यम से प्रदान कर राष्ट्र का सहयोग कर सकते हैं.

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