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व्यंग्य / ‘‘अपनी-अपनी मातहती’’ / अरविन्द कुमार खेड़े

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  जिनको हताहत होना होता है, जिनको हताहत किया जाना होता है, खुदा उनको मातहत बनाकर इस दुनिया में भेज देता है । पता नहीं, इन आत्माओं ने ऐसा क्...

 

जिनको हताहत होना होता है, जिनको हताहत किया जाना होता है, खुदा उनको मातहत बनाकर इस दुनिया में भेज देता है । पता नहीं, इन आत्माओं ने ऐसा क्या गुनाह किया होगा कि, इनको इस रूप में इस दुनिया में आना पड़ता है ।

तो भईये, हम इस तरह के मातहत हैं ।

जब भी नया अफसर आता है, पखवाड़े-महीने तक सारे मातहत उनकी कार्यशैली जानने के लिए उत्सुक रहते हैं । ताकि उनके सुर से सुर मिलाते हुए उनके मुताबिक अपनी शैली ईजाद की जा सके । सब दबी जुबान से आपस में चर्चा करते हुए उनकी टोह लेने की कोशिश में लगे रहते हैं ।

कोई कहता है, ‘‘बेहद सख्त हैं । ’’

दूसरा कहता है, ‘‘बेहद ईमानदार हैं । ’’

तीसरा कहता है, ‘‘बहुत ज्ञानी है, सारे-नियम कायदों का ज्ञान है । ’’

चौथा कहता है, ‘‘बहुत बारीक है । उनको सब पता है कि कहां गड्ढा हो सकता है ? कहां गड्ढे होने की संभावना है ? और कहां गड्ढा किया जा सकता है ?’’

पांचवा कहता है, ‘‘उन्हें सिर्फ काम चाहिए । परिणाम चाहते हैं । ’’

मकसद सिर्फ इतना कि, अब ढील-पोल नहीं चलेगी । अब लेट-लतीफी नहीं चलेगी । दायें-बायें, उपर-नीचे से लेने-देने के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे । मतलब कि उनको बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता ? मतलब सिर्फ इतना कि, अब अपना मतलब नहीं साधा जा सकता ।

जितना मुंह, उतनी बातें । इन बातों के जरिये वे आपस में एक-दूसरे के मन के भाव जानना चाहते हैं । इतना सुनने के बाद उनके उनकी राय क्या बनी है ? क्या अपनी मंशा के अनुरूप काम होगा ? या उनकी मंशा के अनुरूप ढलना होगा ? या अपनी ढपली अपना राग अलापा जायेगा ?

इस प्रकार के आचरण से मुझे बहुत चिढ़ आती है । अरे भाई, यदि हम अपना-अपना कार्य ईमानदारी और लगन से करेंगे तो, हमें कोई दिक्कत नहीं आयेगी । मैं अपनी बात यहीं से प्रारंभ करता हूं और यही पर खत्म करता हूं । लेकिन साथी मातहत तो मेरे मुख से कुछ और सुनना चाहते हैं । मैं उनके इरादों को भांपकर हर बार नेस्तनाबूद कर देता हूं । फिर कभी-कभी तंग आकर मेरा मुंह फट जाता है, मैं उबल पड़ता हूं, ‘‘देखो भईया, हमारा काम है बजाना । जो चले गये, उनका बजाया था । जो आ रहे हैं, उनका बजाना है, और जो आयेंगे, उनका बजायेंगे । आप कहे तो, मैं आपका भी बजा दूं ? ’’

सब चलते बनते हैं । जाते-जाते मैं अपनी बात स्पष्ट करता हूं, ‘‘मैं हुकुम की बात कर रहा हूं । ’’ लेकिन कोई पलट कर नहीं देखता ।

खबर फैल चुकी थी कि आज नए अफसर ज्वाईन करने वाले हैं । सब व्यवस्था स्वतः ही चाक-चैबंद हो गयी । कोई कुर्सी खाली नहीं थी । सब अपनी-अपनी कुर्सी पर अपने-अपने काम में तल्लीन । सारा चतुर वर्ग अपनी अपनी जगह पर । गोया कि अंग्रेजी कहावत का अर्थ जैसे सब यह भली-भांति जानते हैं कि, पहला प्रभाव ही अंतिम होता है ।

यह सब देखकर मेरा दिल भर आया । जैसे सच्चाई किसी को पता नहीं है । यही सब बारह बजे के आसपास आते हैं । इधर-उधर गप्पे हांक कर एक बजे के आसपास गायब हो जाते हैं । लंच बाद चार बजे के आस-पास फिर प्रकट हो जाते हैं, पांच बजे के आस-पास फिर गायब । बेचारे बाहर से आये लोग दिन भर खटते रहते हैं, परेशान होते रहते हैं । घंटी बजाओ तो कोई चतुर वर्ग हाजिर नहीं होता । कभी-कभी तो खीजकर मुंह से निकलने को आ जाता है, फिर जबरन रोकना पड़ता , ‘‘कहां मर गये सब के सब ? ’’

लेकिन हर कोई मातहत अपने जैसा नहीं होता ? जो पक्के मातहत होते हैं, वे वाकई में पके होते हैं । वे भली-भांति जानते हैं कि, ऊंट किस करवट बैठेगा ? ऊंट को किस करवट बैठना चाहिए ? मतलब कि जो पक्के मातहत होते हैं, वे साम, दाम, दंड, और भेद में निपुण होते हैं । और ऐसे लोगों का निरापद उद्देश्य मैदान मारना होता है ।

अफसर का कदम रखना हुआ कि, सारे मातहत अगुवाई में जुट गये । स्वागत सत्कार की स्वस्थ परम्परा के समाप्त होते ही अफसर ने अगले दस मिनिट में सभी को मीटिंग हाल में हाजिर होने के निर्देश प्रसारित कर दिए ।

हुकुम का पालन हुआ । ठीक दस मिनिट बाद सब मीटिंग हाल में । अपने नाम के साथ-साथ अपने द्वारा किये जा रहे दायित्वों का भी जिक्र किया जाकर अपना-अपना परिचय दिया जा रहा था । अब अफसर की बारी थी । पहले दस मिनिट में उन्होंने अपना इतिहास बांचा गया । बीच बीच में कई गौरवशाली क्षण भी आये, जिनमें उनके ऐसे किस्सों का जिक्र था, जिसे सुनकर गर्व महसूस किया जा सकता था । बाद के दस पन्द्रह मिनिट में उन्होंने आने वाले समय में रचे जाने वाले इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की । और उम्मीद जताई कि उनके इस भागीरथी प्रयासों में सारे मातहत उनका साथ देगें ।

उनके उद्बोधन के दौरान मेरी स्मृति में कई ऐसे व्यक्तित्व जीवित हो उठे थे, जिन्होंने अपना कार्य ईमानदारी, लगन और निष्ठापूर्वक किया था । और जिन्होंने इनकी कीमत भी चुकाई थी ।

बंगला अलाट होने तक रेस्ट हाउस में एक कमरा बुक कराया जा चुका था । कल से काम शुरू करने के संदेश के साथ वे तुरंत प्रस्थान कर लिए । उनके जाने के बाद सारे मातहत अपनी आदतों के अनुसार फिर उसी राह चल पड़े । उनके उद्बोधन में छिपे निहित अर्थों की खोज में निकल पड़े ।

थोड़ी देर बाद एक पक्का मातहत अपने हाथ में कुछ कागज लिए जाता दिखा तो मैंने पूछ लिया, ‘‘कहां चल दिए ? ’’

            ‘‘रेस्ट हाउस । ’’ पक्का मातहत कम बोलता है ।

            ‘‘क्यों ? ’’ कच्चा मातहत केवल मूर्खों जैसे सवाल करना जानता है ।

            ‘‘अरे.....कुछ नहीं......साहब ने कहा है कि,.....जरा बजट शीट लेते आना । अब तक कितना खर्च हुआ है ? कितना शेष है ? ’’

थोड़ी देर बाद दूसरा पक्का मातहत बगल में कागज दबाये चलता हुआ दिखा । उससे भी वही प्रश्न और उसके भी वही उत्तर ।

            ‘‘अरे......कुछ नहीं.....साहब ने कहा है कि,.....जरा आदेशों की सूची ले आना । कितने आदेश जारी हुए हैं ? कितना मटेरियल प्राप्त हुआ है ? कितना होने वाला है ? और अभी कितनों के आदेश जारी करना है ? ’’

थोड़ी देर बाद तीसरा पक्का मातहत कुछ कागजों को गोल-गोल लपेटकर (जिस तरह कि विष्वविद्यालय छात्रों को उपाधियां भेजते हैं ) जाता हुआ दिखा । उससे भी वही प्रश्न और उसके भी वही उत्तर ।

            ‘‘अरे....कुछ नहीं....साहब ने कहा है कि.......जरा फंड्स की डिटेल्स ले आना । किन-किन गतिविधियों में कितना-कितना फंड प्राप्त हुआ है ? कितना फंड रिलीज किया जा चुका है ? और कितना करना है ? ’’

अपुन ने राहत की सांस ली थी । नए अफसर के आने से अपुन को कोई दिक्कत नही होगी । मतलब अपुन अपनी जगह पर ही बने रहेंगे । अपुन को वही काम करना है, जो करते आये हैं । मसलन कि लिफाफे तैयार करना, उनका वजन करना और वजन के मुताबिक उन पर टिकिट चिपका कर पोस्ट करना । लिफाफे के भार से अपुन को कोई लेना-देना नहीं है । क्योंकि अपुन जरा दूजे किसिम के मातहत हैं ।

-अरविन्द कुमार खेड़े

मोबाईल-०९९२६५२७६५४

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रचनाकार: व्यंग्य / ‘‘अपनी-अपनी मातहती’’ / अरविन्द कुमार खेड़े
व्यंग्य / ‘‘अपनी-अपनी मातहती’’ / अरविन्द कुमार खेड़े
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http://www.rachanakar.org/2016/06/blog-post_94.html
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