शनिवार, 25 जून 2016

लालची / बाल कहानी / सार्थक देवांगन

 

एक गांव में रविंद्र नाम का लड़का रहता था । वह बहुत लालची था । उसे लालच दो और वह किसी की भी बात में आ जाता था । एक दिन गाव में दो अजनबी आदमी आये । वे जानते थे कि यहां रविंद्र नाम का लड़का रहता है जो , बहुत लालची है और वह कैसा दिखता है वह भी मालूम था । उनका एक साथी गावं में ही रहता था । उन्होंने रविंद्र को अपने पास बुलाया और कहा - तुम्हें भूख लग रही है क्या ? उसने कहा - हां , मुझे बहुत भूख लग रही है । उन लोगों ने कहा - तुम हमारे साथ चलो , हम तुम्हें अच्छा – अच्छा खाने के लिए देंगे । वह अजनबी लोगों के अड्डे में पहुंच गया । वहां पहुंचते ही , उन्होंने उसे बांध दिया । वह मोनू चिल्लाने लगा , बचाओ – बचाओ । उन्होंने उसका मुंह बंद कर दिया । उन्होंने उसके माता पिता के पास फोन किया और कहा कि - अगर तुम्हें तुम्हारा बच्चा चाहिए तो एक लाख देना पडेगा । उन्होंने कहा लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं है उन्होंने कहा कि जैसे भी लाओ हमें चाहिए और पुलिस को मत बताना । उन्होंने घर के सारे पैसे इकठा किया और अजनबियों को दे दिया , तब उन्हें रविंद्र वापस मिला । घर आते ही ,रविंद्र को बहुत डांट सुननी पड़ी ।

उसके बाद कुछ दिनों तक , उसने लालच नहीं किया । कुछ दिनों बाद फिर , वह भूल गया कि लालच बुरी बला है । उसने एक दिन अपने घर में १०० रुपये का नोट देखा । उसने सोचा कि इसे मैं रख लेता हूं । जब भूख लगेगी तो चुपके से बाहर जाकर खा लूंगा । शाम होते ही पिछले दरवाजे से निकल कर खाने चल दिया । पेट भर कर खा भी लिया । घर में उसके पिताजी वही १०० का नोट ढूंढ़ रहे थे । उन्हें नहीं मिला और उसमें एक आदमी का मोबाइल नम्बर लिखा हुआ था । उस नम्बर में फोन करने पर , जो जो सवाल पूछा जाता , उसका सही जवाब मिलने पर हाथ घड़ी फ्री में दिया जा रहा था । उस नोट के बारे में जानकारी मिलने पर रविंद्र को झटका लगा । डर के मारे वह , सच बता नहीं सका ।

एक दिन की बात है , उसी गाव में , कपडे की दुकान के बाहर एक हजार का नोट पडा हुआ था । उसने सोचा कि इसे मैं , रख लेता हूं । वह जैसे ही उसे पकड़ने गया , वह नोट हवा के कारण उड़ने लगा । उड़ते , खिसकते खिसकते सड़क पर पहुंच गया । वह नोट के पीछे भागते भागते , स्पीड से चलती एक गाडी से टकरा गया । बहुत चोट लगी । अपने लालचीपन के कारण वह परीक्षा से वंचित हो गया ।

घर में रहकर वह दूसरी परीक्षा की तैयारी में लग गया । उसके माता पिता ने उससे कह दिया था कि , अगर तुम इस बार पूरे में पूरे नम्बर लाते हो तो , हम तुम्हें एक साइकिल गिफ्ट कर देंगे । पढ़ते पढ़ते उसे नेट में एक पेपर मिल गया । वह उसी पेपर की तैयारी करके साइकिल पाने का सपना देखने लगा । जब वह परीक्षा देने गया तब उसने देखा कि , यह तो वह पेपर नहीं है दूसरा पेपर है और मैंने तो इन प्रश्नों के उतर को तो पढा ही नहीं । पूरे नम्बर क्या आधे से भी कम नम्बर मिला उसे । वह फिर से अपने लालचीपन का शिकार हो गया । उसके सभी दोस्त उससे दो साल आगे निकल गये । अब उसे समझ आ गया । अपने माता पिता के समक्ष उसने अपनी गलती कबूल कर लालच त्याग दी ।

आज एक बड़ी कम्पनी का मैनेजर बन गया वह । सच ही है भइया , कि लालच बुरी बला है । हमें लालच छोड़ , अपने कार्य में ध्यान देना चाहिए ।

सार्थक देवांगन

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